राजा भोज से हाई कोर्ट तक… जानिए भोजशाला विवाद की अनसुनी कहानी
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राजा भोज से हाई कोर्ट तक… जानिए भोजशाला विवाद की अनसुनी कहानी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर माना है।

Written byMahak SinghMahak Singh
May 15, 2026, 04:00 pm IST
inमध्य प्रदेश
धार भोजशाला

धार भोजशाला

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर एक बार फिर देशभर में चर्चा का केंद्र बन गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर माना है। फैसले के बाद पूरे धार जिले में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और प्रशासन पूरी तरह सतर्क है, क्योंकि यह मामला लंबे समय से धार्मिक और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा रहा है।

भोजशाला को लेकर हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्ष अपने-अपने दावे करते रहे हैं। हिंदू समाज इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का बड़ा केंद्र मानता है। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह कमाल मौला मस्जिद है और यहां मुस्लिम समुदाय को नमाज पढ़ने का अधिकार है। यही विवाद कई दशकों से अदालतों और प्रशासन के सामने चुनौती बना हुआ था।

क्या है भोजशाला का इतिहास?

इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज से माना जाता है। राजा भोज का शासनकाल लगभग 1010 से 1055 के बीच था। कहा जाता है कि उन्होंने शिक्षा, साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए इस स्थान का निर्माण करवाया था। यहां संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी और मां सरस्वती की पूजा होती थी। कई ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस जगह को “सरस्वती सदन” कहा गया है। माना जाता है कि यहां विद्वानों की सभाएं होती थीं और छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। धीरे-धीरे समय बदला, आक्रमण हुए और इस परिसर की संरचना में भी बदलाव आते गए। इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि मालवा क्षेत्र पर हुए आक्रमणों के दौरान यहां की मूल संरचना को नुकसान पहुंचा। बाद में यहां कमाल मौला से जुड़ी संरचना बनने का दावा सामने आया। यहीं से मंदिर और मस्जिद को लेकर विवाद शुरू हुआ।

विवाद की जड़ क्या है?

भोजशाला को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि यह मूल रूप से मंदिर था या मस्जिद। हिंदू पक्ष का कहना है कि यहां मां वाग्देवी यानी सरस्वती की पूजा होती थी और यह संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह कमाल मौला मस्जिद है और वर्षों से यहां नमाज अदा की जाती रही है। वर्तमान में यह परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के नियंत्रण में संरक्षित स्मारक के रूप में मौजूद है। 2003 में प्रशासन ने व्यवस्था बनाई थी कि मंगलवार को हिंदू पक्ष पूजा करेगा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष नमाज अदा करेगा। हालांकि जब वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते थे, तब विवाद और तनाव की स्थिति बन जाती थी।

हाई कोर्ट में मामला कैसे पहुंचा?

साल 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और भोज उत्सव समिति से जुड़े लोगों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें मांग की गई कि भोजशाला परिसर की वैज्ञानिक जांच कराई जाए ताकि यह पता चल सके कि इस स्थल का मूल स्वरूप क्या था। याचिका में एएसआई सर्वे, खुदाई और धार्मिक अधिकार तय करने की मांग की गई। इसके बाद हाई कोर्ट ने वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया। अदालत का मानना था कि ऐतिहासिक तथ्यों और पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर सच्चाई सामने आनी चाहिए।

एएसआई सर्वे में क्या मिला?

हाई कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने लगभग 98 दिनों तक विस्तृत वैज्ञानिक सर्वे किया। इस सर्वे में पुरातत्वविद, तकनीकी विशेषज्ञ और संरचना विशेषज्ञ शामिल थे। सर्वे टीम का नेतृत्व एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक आलोक त्रिपाठी ने किया। करीब 2000 पन्नों की रिपोर्ट अदालत में पेश की गई। रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। एएसआई ने बताया कि परिसर में मंदिर शैली के अवशेष मिले हैं। यहां बड़ी संख्या में स्तंभ, मूर्तियां, शिलालेख और स्थापत्य सामग्री मिली, जिनका संबंध प्राचीन मंदिर संरचना से बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार यहां 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर ऐसे मिले जो मंदिर स्थापत्य से जुड़े दिखाई देते हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख अरबी-फारसी अभिलेखों से पुराने हैं। कई अभिलेख नागरी लिपि में पाए गए जिनका संबंध परमार शासकों से जोड़ा गया। सर्वे के दौरान ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। खुदाई में कई मूर्तियां और कलात्मक आकृतियां क्षतिग्रस्त अवस्था में मिलीं। एएसआई ने यह भी कहा कि वर्तमान ढांचे में पहले की संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग किया गया है।

मां वाग्देवी की प्रतिमा का मुद्दा

भोजशाला विवाद में मां वाग्देवी की प्रतिमा का मुद्दा भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है। रिकॉर्ड के अनुसार 1875 में खुदाई के दौरान मां सरस्वती की प्रतिमा मिलने का उल्लेख किया गया था। बाद में ब्रिटिश अधिकारी इस प्रतिमा को इंग्लैंड ले गए। हिंदू संगठनों ने कई बार इस प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग उठाई। उनका कहना है कि यह भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर है और इसे देश में वापस लाया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में भोजशाला परिसर को मां वाग्देवी का मंदिर माना है। अदालत ने एएसआई रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुरातात्विक प्रमाणों को महत्वपूर्ण आधार माना।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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