अल्मोड़ा: अल्मोड़ा के करबला क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण और 450 नाली भूमि के उपयोग को लेकर विवाद अब जन-आंदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक ओर प्रशासन ने अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई का दावा किया है, वहीं दूसरी ओर हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों ने प्रशासन पर मामले को गंभीरता से न लेने का आरोप लगाया है।
डीएम अंशुल सिंह ने बताया कि करबला क्षेत्र स्थित कब्रिस्तान के पास अवैध निर्माण की सूचना प्रशासन को प्राप्त हुई थी। सूचना मिलते ही प्रशासन ने तत्काल जांच कराई। एसडीएम संजय कुमार ने जांच में निर्माण अवैध पाए जाने पर संबंधित निर्माणकर्ता को सात दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने का नोटिस जारी किया गया था। एसडीएम के अनुसार, प्रशासनिक नोटिस के बाद निर्माणकर्ता ने स्वयं ही अवैध निर्माण को ध्वस्त कर दिया, जिससे क्षेत्र में किसी प्रकार की तनावपूर्ण या विधि-विरुद्ध स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रशासन अवैध निर्माणों को लेकर पूरी तरह सतर्क है तथा भविष्य में भी ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही आमजन से अपील की गई कि बिना अनुमति किसी भी प्रकार का निर्माण न करें।
हिन्दू संगठनों ने किया था जनांदोलन
हालांकि, प्रशासन की इस कार्रवाई के बाद मामला नया मोड़ लेता दिखाई दिया। करबला स्थित 450 नाली भूमि पर अंतरराज्यीय बस अड्डा (ISBT) बनाए जाने और कथित अवैध कब्जों के विरोध में हिंदू संगठनों ने अल्मोड़ा में जन-आंदोलन का आह्वान किया था। संगठन के सैकड़ों कार्यकर्ता शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए स्वामी विवेकानंद स्थल की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें रास्ते में ही रोक दिया। संगठन के अनुसार, प्रदर्शन स्थल से लगभग 10 किलोमीटर पहले क्वारब पुल के पास भारी पुलिस बल तैनात किया गया था और हिंदूवादी नेताओं को हिरासत में ले लिया बाद में उन्हें रिहा कर दिया।
घटनास्थल पर संगठन पदाधिकारियों की एसडीएम संजय कुमार और सीओ बलवंत रावत के साथ वार्ता भी हुई। संगठन ने प्रशासनिक कार्रवाई को लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की। हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों का दावा है कि उसने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत करबला स्थित 450 नाली भूमि का विवरण मांगा था। प्राप्त जानकारी में केवल “नमाज चबूतरा” और “कब्रिस्तान” का उल्लेख था, जबकि किसी पक्की मस्जिद के निर्माण का वैध रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया।
अवैध निर्माण हटाने की हुई थी मांग
इसी आधार पर संगठन ने लगभग दो माह पूर्व जिलाधिकारी अंशुल सिंह को ज्ञापन सौंपकर कथित अवैध निर्माण हटाने की मांग की थी। संगठन का आरोप है कि प्रशासन ने उस समय कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। लेकिन जैसे ही जन-आंदोलन की घोषणा हुई, प्रशासन ने अचानक अवैध निर्माण हटाने का दावा कर दिया। राष्ट्रीय सेवा संघ ने इसे प्रशासन की “ढिलाई और आंदोलन को दबाने की नीति” करार दिया है। संगठन का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने मामले पर पारदर्शी कार्रवाई की होती, तो कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
संगठन ने यह भी स्पष्ट किया कि करबला की 450 नाली भूमि का उपयोग जनहित में ISBT निर्माण के लिए किया जाना चाहिए, जिससे अल्मोड़ा सहित पूरे कुमाऊं क्षेत्र को यातायात सुविधा का लाभ मिल सके। संगठन का आरोप है कि भूमि के वास्तविक उपयोग और स्वामित्व को लेकर अब तक स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है। वहीं प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। किसी भी प्रकार की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए एहतियाती कदम उठाए गए। प्रशासन का कहना है कि किसी भी व्यक्ति या संगठन को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
राजनीतिक हल्कों में मची हलचल
घटना के बाद अल्मोड़ा में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। एक पक्ष प्रशासन की कार्रवाई को आवश्यक बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे जनभावनाओं को दबाने का प्रयास मान रहा है।
फिलहाल करबला भूमि विवाद केवल अवैध निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भूमि उपयोग, प्रशासनिक पारदर्शिता और जन-आंदोलन के अधिकार जैसे बड़े सवालों से भी जुड़ता जा रहा है। राष्ट्रीय सेवा संघ ने संकेत दिए हैं कि जब तक भूमि के उपयोग और कथित अतिक्रमण को लेकर स्पष्ट एवं निष्पक्ष जांच नहीं होती, तब तक उनका लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस पूरे मामले में आगे क्या कदम उठाता है और क्या करबला भूमि विवाद आने वाले समय में अल्मोड़ा की राजनीति और सामाजिक वातावरण पर और अधिक प्रभाव डालता है।











