गुरुदेव टैगोर का अटूट राष्ट्रप्रेम: वंदे मातरम को दिया स्वर, बंकिम चंद्र चटर्जी को माना 'बांग्ला साहित्य के राजा'
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गुरुदेव टैगोर का अटूट राष्ट्रप्रेम: वंदे मातरम को दिया स्वर, बंकिम चंद्र चटर्जी को माना ‘बांग्ला साहित्य के राजा’

बंकिम चंद्र चटर्जी की "बंगदर्शन" मासिक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की प्रिय पत्रिका थी

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी
May 9, 2026, 09:07 am IST
inभारत
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर अप्रतिम विश्व कवि होने के साथ ही एक गहन दार्शनिक, चित्रकार, संगीतकार, नाटककार और शिक्षाविद के रूप में विश्वविख्यात हैं। वर्ष 1913 में काव्य रचना ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। यह सम्मान पाने वाले वे पहले गैर-यूरोपीय और पहले भारतीय एशियाई व्यक्ति थे। यही नहीं; स्वामी विवेकानंद के बाद रवींद्रनाथ टैगोर विश्व धर्म संसद को संबोधित करने वाले पश्चिम बंगाल के दूसरे प्रमुख भारतीय व्यक्ति थे।

टैगोर का हृदय जितना कोमल था, उनका स्वाभिमान उतना ही अडिग। 1919 में हुए भीषण जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी गई ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि वापस लौटा दी थी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मानवता और देशप्रेम से बढ़कर कोई सम्मान नहीं है। जानना रोचक हो कि महात्मा गांधी ने उन्हें ‘गुरुदेव’ की उपाधि दी थी और उन्होंने गांधी जी को ‘महात्मा’ कहकर पुकारा था। इसी तरह अधिकांश लोग यह तो जानते हैं कि रवींद्रनाथ ने दो भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और ‘आमार सोनार बांग्ला’ की रचना की । आमार सोनार बांग्ला बाद में बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना। लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि श्रीलंका के राष्ट्रगान ‘श्रीलंका माथा’ का एक हिस्सा टैगोर की शैली से गहराई से प्रेरित है। श्रीलंका का राष्ट्रगान आनंद समरकून द्वारा लिखा गया था, जो रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन (विश्व भारती विश्वविद्यालय) में छात्र रहे थे।

9 मई को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 165 वीं जयंती

इस वर्ष गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जन्म जयंती मनायी जा रही है। यद्यपि टैगोर का जन्म अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी मोहल्ले के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। लेकिन पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में इसे बंगाली पंचांग के अनुसार 25 बोइशाख को ही मनाया जाता है जो इस वर्ष 9 मई को पड़ है। रवीन्द्रनाथ टैगोर का परिवार धन, मान, विद्या व पदवी सभी दृष्टि से बंगाल के सर्वोच्च घरानों में गिना जाता था। पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर क्षेत्र के जाने-माने सुप्रतिष्ठित बैरिस्टर(वकील) थे जबकि माता शारदा देवी आध्यात्मिक विचारों वाली गृहणी थीं। वे 14 भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी आरंभि‍क शि‍क्षा कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से हुई थी। उनके घर का वातावरण कला, साहित्य और संस्कृति से भरपूर था। जिसका उनके बाल मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और वे बचपन से ही कविताएं लिखने लगे थे।

हिमालय से मिली काव्य सृजन की प्रेरणा

कहते हैं कि सन 1973 में उपनयन संस्कार के बाद एक बार जब वे पिता के साथ हिमालय भ्रमण पर गये, वहां के सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में इनकी काव्य रचना का प्रवाह और अधिक बढ़ गया तथा हिमालय से लौट कर वे काव्य सृजन में पूरी तन्मयता से जुट गये। बालक रवीन्द्र की पहली कविता मात्र 8 वर्ष की आयु में और पहली लघुकथा 16 वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी। पढ़ाई में मन न लगता देख पिता ने साल 1878 में उनको इंग्लैंड के ब्रिजस्टोन पब्लिक स्कूल में पढ़ने भेज दिया। इसके बाद उन्होंने लंदन यूनिवर्स‍िटी से लॉ की पढ़ाई की, लेकिन वहां उनका अधिकांश समय मिल्टन, बायरन, टेनिसन, शैली, कीट्स आदि कवियों की रचनाओं के अध्ययन में ही बीता। विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने यूरोप के सामाजिक व सार्वजनिक जीवन का गहन अध्ययन किया। वर्ष 1880 में वे कानून की डिग्री लिए बिना ही स्वदेश लौट आए फिर से साहित्य सृजन शुरू कर दिया।

रवीन्द्रनाथ का रचना संसार और रवीन्द्र संगीत

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को विश्व साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। उनका कवि कर्म उपन्यास, लघुकथा, नाटक, प्रबन्ध, चित्रकला और संगीत आदि अनेकानेक क्षेत्रों में फैला हुआ है। उनका साहित्य केवल भारतीय नहीं, बल्कि वैश्विक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने लगभग 2,230 गीतों की रचना की थी, जिन्हें आज ‘रवींद्र संगीत’ के नाम से जाना जाता है। बंगाल के हर घर में और दुनिया भर के बंगाली समुदाय के लिए ये गीत उनकी संस्कृति की धड़कन हैं। बताते चलें कि रवींद्र संगीत रवींद्रनाथ टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा से उत्पन्न एक अनूठी संगीत शैली है, जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पश्चिमी संगीत और बंगाली लोक परंपराओं के तत्व शामिल हैं। कहा जाता है कि उन्होंने 60 वर्ष की उम्र के बाद पेंटिंग शुरू की थी और करीब 3,000 चित्र बनाए थे।

“बंगदर्शन” के द्वारा राजनीतिक अन्याय का विरोध

बंकिम चंद्र चटर्जी की “बंगदर्शन” मासिक आपकी प्रिय पत्रिका थी। रवीन्द्रनाथ का कहना था, “बंकिमबाबू के बाद बांग्ला भाषा में कोई अच्छा समालोचक पैदा ही नहीं हुआ। बंकिम बांग्ला साहित्य के राजा थे।” बंकिम चंद्र चटर्जी के राष्ट्रमंत्र वंदे मातरम को उन्होंने पहली बार सार्वजनिक मंच पर स्वर दिया। बंकिमचन्द्र द्वारा प्रकाशित “बंगदर्शन” मासिक पत्रिका जो उनके देहांत के बाद बंद हो गई थी, रवीन्द्रनाथ ने 1901 में पुन: शुरू कराया था। यह सामाजिक प्रगति का एक प्रधान साधन तो था ही, रवीन्द्र बाबू इसके द्वारा राजनीतिक अन्याय के विरुद्ध भी आवाज उठाया करते थे।

विश्वकवि का क्रन्तिकारी स्वरूप

19 अक्टूबर 1905 में तत्कालीन विदेशी शासक लार्ड कर्जन ने जब बंगाल को दो भागों में बांटने का फरमान जारी किया तो इसके विरोध में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने स्वदेशी समाज की स्थापना की। उनके नेतृत्व में लाखों लोगों का जुलूस “बिधिर बंधन काटिवे तुम एमनि शक्तिमान” (क्या तुम ऐसे शक्तिशाली हो कि विधाता द्वारा निर्मित संबंध का भी विच्छेद कर दोगे) गीत गाते हुए पूरे कोलकाता में घूमा और गंगा स्नान कर परस्पर राखी बांधकर प्रतिज्ञा की कि ऐसे अन्यायपूर्ण आदेश को कदापि स्वीकार नहीं किया जाएगा। इस आंदोलन से जनता में जो गहन चेतना उत्पन्न हुई वह अंतत: भारत को विदेशियों के पंजे से मुक्त कराकर ही समाप्त हुई।

रवीन्द्र साहित्य और उपनिषदों का तत्वदर्शन

रवीन्द्र साहित्य व काव्य में ऐसी कई विशेषताएं हैं जो उन्हें सच्चे अर्थों में विश्व कवि बनाती हैं। उनके समकालीन किसी लेखक का कैनवास शायद ही इतना विस्तृत हो। वे विश्वमानव के दुखों के निवारणार्थ समाज की कटु आलोचना करके कोई व्याख्यान नहीं देते, पर जो भी कहते हैं वह मानव की निर्बलताओं को सहानुभूतिपूर्वक देखते हुए अत्यंत कलात्मक ढंग से। वे लिखते हैं-” नहीं मांगता प्रभु विपत्ति से मुझे बचाओ-त्राण करो, विपदा में निर्भीक रहूं मैं , इतना हे भगवान करो।” उनकी सार्वभौमिक और सर्वकालिक लेखनी साहित्य प्रेमियों के लिए मन-मस्तिष्क को शीतल करने वाला क्षीरसागर है। उनकी साहित्यिक कृतियां चाहे कविता, कहानी, उपन्यास या निबंध सभी कुछ मनुष्य के मानसिक स्तर को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से लिखी गयी हैं। बताते चलें कि उनकी “अंतर मम विकसित कर दे” शीर्षक कविता में जिसमें अध्यात्म भावना को बहुत थोड़े शब्दों में बेहद प्रभावोत्पादक रूप में व्यक्त किया गया है; बापू के साबरमती आश्रम में प्रार्थना के समय नित्य गायी जाती थी। बताते चलें कि उनकी सुप्रसिद्ध रचना ‘गीतांजलि’ में वैष्णव कवियों की प्रेम भावना के साथ उपनिषदों के सर्वोच्च आध्यात्मिक विचारों का बेहद भावपूर्ण चित्रण है।

‘शांतिनिकेतन’ से लेकर ‘श्री निकेतन’ तक

कवि रवीन्द्र केवल कल्पना में उड़ने वाले कवि न थे। टैगोर मानते थे कि “मनुष्य की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है।” उन्होंने ‘विश्व-मानव’ की कल्पना की, जहां पूरी दुनिया एक परिवार की तरह रहे। उनकी मान्यता थी देश की समस्याओं का हल महंगी पाश्चात्य शिक्षा के द्वारा नहीं अपितु ऋषि प्रणीत प्राचीन गुरुकुल परंपरा के पुनर्जीवन से ही हो सकता है। इसीलिए उन्होंने “शांति निकेतन” की बुनियाद रखी। दो छात्र व दो अध्यापकों को लेकर शुरू की गयी यह संस्था आज विश्वविख्यात है। इस महाकवि ने अपनी रचनाओं द्वारा संसार में भारतीय संस्कृति का जो मान बढ़ाया, उसके लिए देश का साहित्य जगत उनका सदैव ऋणी रहेगा।

श्री निकेतन की स्थापना

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जहां एक ओर शांति निकेतन के द्वारा प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का पुनर्जीवन किया था वहीं 1912 में उन्होंने शांतिनिकेतन से तीन मील दूर कुछ जमीन खरीद कर श्री निकेतन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों को कृषि, उद्योगों व व्यवसाय का व्यवहारिक प्रशिक्षण देना था। उनका कहना था कि जिस तरह अमेरिका की कुछ संस्थाएं भारतीय छात्रों को विज्ञान व आधुनिक कला कौशल की शिक्षा दे रही हैं, उसी तरह भारत में भी कोई ऐसी संस्था बननी चाहिए जहां सभी देशों के ज्ञानभिलाषी सम्मिलित रूप से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समन्वित शिक्षा पा सकें। सार रूप में कहें तो महाकवि रवीन्द्र संसार के ऐसे गिने चुने महामानवों में से थे जिनका जन्म किन्हीं विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है। उनका गुणानुवाद आगामी पीढ़ियां सैकड़ों वर्षों तक करती रहेंगी।

 

Topics: ‘जन-गण-मन’रवींद्रनाथ टैगोरवंदे मातरमबंकिम चंद्र चटर्जीशांति निकेतनश्री निकेतन
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