अमेरिका के साथ चल रहे युद्ध के बीच भी ईरानी सरकार हिजाब लागू करने की कोशिशों में लगी हुई है। इसी क्रम में ईरान में एक कट्टर मौलवी की महिलाओं पर तीखी टिप्पणी ने सत्ताधारी वर्ग के अंदर हिजाब लागू करने को लेकर चल रही असहमति को सामने ला दिया है। दूसरी तरफ सरकारी मीडिया युद्ध के दौरान लोगों का व्यापक समर्थन दिखाने के लिए बिना हिजाब वाली महिलाओं की तस्वीरें प्रचार में इस्तेमाल कर रहा है।
उत्तर में रश्त शहर में शुक्रवार की नमाज के इमाम रसूल फल्लाही ने युद्ध शुरू होने के बाद रोज हो रही सरकारी समर्थन वाली सभाओं में एक भाषण दिया। उन्होंने बिना हिजाब वाली महिलाओं को “सिस्टम और कुरान के खिलाफ” खड़ी होने का आरोप लगाया। उन्हें “अनैतिक और बेशर्म” बताया। साथ ही उनके पिता, पति और भाइयों को “बेइज्जत” कहा।
उन्होंने बिना हिजाब वाली महिलाओं को चेतावनी देते हुए कहा, “यह मत सोचो कि लोग तुम्हें बर्दाश्त करेंगे।” और आगे कहा कि अगर आम लोग उनसे टकराए तो “ऐसा कुछ कर देंगे कि तुम घर से बाहर निकलने की हिम्मत भी नहीं करोगी।” यह भाषण प्रांतीय टीवी पर लाइव प्रसारित हुआ, जो बाद में देश के अंदर ऑनलाइन काफी फैल गया और हिजाब लागू करने पर फिर से बहस छिड़ गई।
सरकारी तस्वीरों में महिलाएं
रूढ़िवादी अखबार फरारू ने इस मुद्दे पर लेख लिखा जिसका शीर्षक था, “बिना हिजाब वाली महिलाओं पर हमला क्यों?” लेख में कहा गया कि ‘स्वयंसेवी बलिदानी लड़कियों’ की परेड हो या लड़ाकों का समर्थन करने वाली रात की सभाएं, कैमरे बिना हिजाब वाली महिलाओं को तलाशते हैं ताकि दिखाया जा सके कि देश के हर वर्ग के लोग राष्ट्र का साथ दे रहे हैं। एक तरफ सरकारी प्रचार में इन महिलाओं को दिखाया जा रहा है, दूसरी तरफ मस्जिद से उनके खिलाफ सख्त भाषण दिए जा रहे हैं।
कानून और युद्ध का समय
सख्त हिजाब समर्थक, जिनमें फल्लाही जैसे मौलवी शामिल हैं, कहते हैं कि हिजाब ईरानी कानून के मुताबिक जरूरी है। वे सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के पुराने बयान का हवाला देते हैं, जिन्होंने कहा था कि हिजाब न मानना धार्मिक और राजनीतिक रूप से दोनों मना है।
लेकिन फल्लाही के भाषण की कुछ सरकारी पक्ष के मौलवियों ने आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि युद्ध के समय ऐसी बातें सामाजिक एकता को कमजोर कर सकती हैं। खामेनेई के प्रतिनिधि अब्दोलरेजा पुरजहबी ने कुर्दिस्तान प्रांत में चेतावनी दी कि हमें विभाजन वाली बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इससे सामाजिक शांति बिगड़ सकती है और युद्ध से जूझ रहे लोगों को हिजाब का जवाब भी देना पड़ेगा।
लोगों की प्रतिक्रिया
ऑनलाइन भी इस पर काफी प्रतिक्रियाएं आईं है। एक यूजर ने लिखा, “तो अगर युद्ध नहीं होता तो कानून लागू होता, महिलाओं को पीटा जाता, गिरफ्तार किया जाता और जेल भेजा जाता। लेकिन अब युद्ध है और लोगों की जरूरत है तो अस्थायी तौर पर ठीक है?”
2022 के बाद की स्थिति
सितंबर 2022 में महसा अमीनी की हिरासत में मौत के बाद “महिला, जीवन, आजादी” आंदोलन शुरू हुआ था। उसके बाद से सरकार सड़कों पर हिजाब कानून को सख्ती से लागू करने से ज्यादातर बच रही है, क्योंकि फिर से बड़े प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं। फिर भी सरकारी दफ्तरों, अस्पतालों और अदालतों में बिना हिजाब वाली महिलाओं को अंदर नहीं घुसने दिया जाता। स्कूलों में हिजाब अनिवार्य है। देश के अलग-अलग हिस्सों में नियमों की सख्ती अलग-अलग है। क़ोम जैसे धार्मिक शहरों में अभी भी सख्ती बताई जाती है।
एक महिला ने हाल ही में लिखा कि क़ोम में शॉपिंग करते समय एक अधिकारी ने हिजाब करने को कहा। जब उसने अनसुना किया तो अधिकारी ने हथियार पर हाथ रखकर धमकी दी कि कार जब्त कर लेंगे। उसने महिला और उसके वाहन का नंबर फोटो भी लिया। यह पूरा मामला ईरानी व्यवस्था में गहरी उलझन दिखाता है कि युद्ध के समय हिजाब को लेकर जो ढील दी जा रही है, वह सिर्फ अस्थायी रणनीति है या सरकार अब सख्ती करने के राजनीतिक जोखिम को पूरा नहीं उठा सकती।

















