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स्वदेशी शक्ति से वैश्विक होता भारत का रक्षा क्षेत्र, अहम है DRDO का योगदान

भारत का रक्षा क्षेत्र आज वहां आ पहुंचा है, जहां तकनीक, अनुसंधान और स्वदेशी क्षमताएं राष्ट्रीय शक्ति का नया आधार बनती जा रही हैं।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
May 6, 2026, 07:23 pm IST
in रक्षा, विश्लेषण

भारत का रक्षा क्षेत्र आज वहां आ पहुंचा है, जहां तकनीक, अनुसंधान और स्वदेशी क्षमताएं राष्ट्रीय शक्ति का नया आधार बनती जा रही हैं। हाल के वर्षों में सरकार ने रक्षा अनुसंधान को नीति के केंद्र में स्थापित किया है, जिससे देश की सुरक्षा व्यवस्था अधिक सशक्त, आधुनिक और आत्मनिर्भर बन रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा व्यक्त विचार इस दिशा में स्पष्ट संकेत देते हैं कि आने वाला समय तकनीकी श्रेष्ठता का होगा और भारत इस दौड़ में पीछे रहने वाला देश नहीं है।

वस्तुत: आज केंद्र सरकार द्वारा रक्षा अनुसंधान एवं विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देना एक दूरदर्शी कदम माना जा सकता है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा अब तक 2,200 से अधिक तकनीकों का उद्योगों को हस्तांतरण इस बात का प्रमाण है कि देश में शोध और उत्पादन के बीच मजबूत पुल तैयार हो चुका है। इस प्रक्रिया ने रक्षा उत्पादन को गति दी है और निजी क्षेत्र को भी नए अवसर प्रदान किए हैं। अनुसंधान पर निरंतर ध्यान बनाए रखना भविष्य के युद्धों में बढ़त दिलाने वाला कारक बन सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर में स्वदेशी तकनीकों का उपयोग बढ़ती सैन्य क्षमता को दर्शाता है

रक्षा अनुसंधान एवं विकास बजट का 25 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों, अकादमिक संस्थानों और स्टार्टअप्स के लिए निर्धारित किया जाना एक क्रांतिकारी पहल है। इन संस्थाओं द्वारा 4,500 करोड़ रुपए से अधिक का उपयोग यह दर्शाता है कि देश में नवाचार की ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है। इससे एक ओर जहां नई तकनीकों का विकास संभव हुआ है, वहीं युवाओं को भी रक्षा क्षेत्र में योगदान देने का अवसर मिला है। नई टेक्नोलॉजी ट्रांसफर नीति के तहत शुल्क समाप्त करना उद्योगों के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन साबित हुआ है। इससे विकास और उत्पादन में साझेदारी को बढ़ावा मिला है। साथ ही पेटेंट्स को मुफ्त उपलब्ध कराने की नीति ने तकनीकी विकास को नई गति दी है। परीक्षण सुविधाओं को उद्योगों के लिए खोलना भी सहयोगात्मक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यही कारण है कि भारत अब डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स, हाइपरसोनिक हथियार, क्वांटम तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये तकनीकें भविष्य के युद्धों की दिशा तय करेंगी। इन क्षेत्रों में निवेश और अनुसंधान भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना रहे हैं। हमने पिछले साल देखा भी है कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में स्वदेशी तकनीकों का सफल उपयोग देश की बढ़ती सैन्य क्षमता को दर्शाता है। आकाशतीर, आकाश मिसाइल सिस्टम और ब्रह्मोस जैसी उन्नत प्रणालियां इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब आत्मनिर्भर रक्षा शक्ति बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। यह उपलब्धि हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन का 1.54 लाख करोड़ पहुंचना ऐतिहासिक उपलब्धि

इसके साथ ही कहना होगा कि भारत के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन का 1.54 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। रक्षा निर्यात का 38,424 करोड़ रुपए तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। पिछले एक दशक में 174 प्रतिशत की वृद्धि और निर्यात में कई गुना विस्तार देश की बदलती पहचान को दर्शाता है। जिसमें कि रक्षा निर्यात में निजी क्षेत्र का लगभग 15,000 करोड़ रुपए का योगदान इस क्षेत्र में आए बड़े बदलाव को दर्शा रहा है। अब रक्षा निर्माण सरकारी संस्थानों की पहुंच से आगे उद्योगों और स्टार्टअप्स की सक्रियता में एक व्यापक इकोसिस्टम बन चुका है।

स्वभाविक तौर पर इससे नवाचार और प्रतिस्पर्धा दोनों को बढ़ावा मिला है।आज इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस, एडीआईटीआई और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड जैसी योजनाएं रक्षा क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार कर रही हैं। इन पहलों ने युवाओं और उद्यमियों को रक्षा तकनीकों के विकास में भाग लेने का अवसर दिया है। इससे देश में नवाचार की संस्कृति मजबूत हो रही है। ऐसे में यह भी ध्यान में आता है कि भारत का लक्ष्य अब तकनीकी संप्रभुता हासिल करना है, जिसमें महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास, स्वामित्व और संरक्षण देश के भीतर ही हो।

क्वांटम-सिक्योर कम्युनिकेशन जैसी उपलब्धियां इस दिशा में बड़ी प्रगति को दर्शाती हैं। यह क्षमता भविष्य के युद्धों में निर्णायक साबित हो सकती है। बजट 2026-27 में रक्षा क्षेत्र के लिए 6.81 लाख करोड़ रुपए का आवंटन सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि है, जोकि रक्षा तैयारियों को और मजबूत बनाएगी। अत: हम सभी के लिए आज गौरव की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की रक्षा यात्रा एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां आत्मनिर्भरता, तकनीकी श्रेष्ठता और वैश्विक पहचान एक साथ आकार ले रही हैं। यह परिवर्तन हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह तो हम सभी जानते हैं कि देश का रक्षा क्षेत्र सुरक्षा का प्रतीक है, किंतु कहना होगा कि इस दिशा में हो रहे नवाचार आज शक्ति और आत्मविश्वास का भी प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं, जोकि हर भारतीय को आशा और उत्साह से भर रहे हैं।

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डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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