पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 एक ऐसा साल बनकर उभरा है, जिसने राज्य की दशकों पुरानी राजनीतिक परंपराओं को झकझोर कर रख दिया है। 15 साल पहले, ममता बनर्जी ने ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ वामपंथ के 34 साल पुराने किले को ध्वस्त किया था। लेकिन आज वही नारा पांच नए M-महिला, मुस्लिम, माइग्रेंट (प्रवासी), मतुआ और मशीनरी (BJP की चुनावी मशीनरी) के सामने बेअसर साबित होता दिख रहा है।
रुझानों से साफ है कि बंगाल में ‘दीदी’ की पकड़ ढीली हो गई है और राज्य एक बड़े ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है।
100 के नीचे सिमटी तृणमूल कांग्रेस
पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों के लिए हो रही मतगणना में शुरुआती रुझान बेहद चौंकाने वाले हैं। जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपनी हैट्रिक के बाद चौथी बार वापसी की उम्मीद कर रही थी, वहीं भाजपा ने बहुमत के आंकड़े को आसानी से पार कर लिया है। ताजा रुझानों ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने अब तक वहां 193 सीटों की भारी बढ़त बना ली है। वहीं टीएमसी यानि तृणमूल कांग्रेस 97 सीटों पर सिमटी दिख रही है। ये रुझान दिखाते हैं कि भाजपा न केवल बहुमत के आंकड़े को पार कर गई है, बल्कि वह एक मजबूत और स्थिर सरकार बनाने की ओर अग्रसर है।
यह पहली बार है जब SIR के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के बाद चुनाव हुए हैं, जिसका असर नतीजों पर साफ दिख रहा है।
वे 5 M जिन्होंने ममता की राह रोकी
बंगाल की राजनीति में इस बार समीकरण केवल नारों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर इन पांच M यानी कारकों ने खेल बदल दिया।
1. महिला वोटर
महिलाएं हमेशा से ममता बनर्जी का सबसे मजबूत वोट बैंक रही हैं। ‘लक्ष्मी भंडार’ और ‘कन्याश्री’ जैसी योजनाओं ने उन्हें दीदी का वफादार बनाया था। लेकिन 2026 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार और हत्या कांड ने महिलाओं के बीच सुरक्षा को लेकर बड़ा डर पैदा कर दिया। भाजपा ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और पीड़ित की मां को पनिहाटी सीट से टिकट देकर प्रतीकात्मक रूप से महिलाओं की सुरक्षा का संदेश दिया। प्रधानमंत्री मोदी की महिला केंद्रित योजनाओं ने भी इस वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई।
2. मुस्लिम वोट
बंगाल की 27 फीसदी मुस्लिम आबादी पारंपरिक रूप से टीएमसी के साथ रही है। 2021 में मुस्लिम बहुल 85 सीटों में से 75 पर टीएमसी जीती थी। लेकिन इस बार मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में बदलाव की लहर दिखी। विकास की कमी, नागरिकता के मुद्दों और कांग्रेस व एआईएमआईएम (AIMIM) जैसे दलों की सक्रियता ने टीएमसी के इस ‘वोट बैंक’ को बिखेर दिया।
3. मतुआ समुदाय
अनुसूचित जाति (SC) का यह समूह, जो राज्य की आबादी का 17 प्रतिशत है, भाजपा की जीत का सबसे बड़ा इंजन साबित हुआ। नागरिकता के वादे और समुदाय के प्रति भाजपा के झुकाव ने मतुआ बहुल उत्तर और दक्षिण बंगाल की सीटों पर भाजपा को बढ़त दिलाई।
4. माइग्रेंट्स
चुनावों से पहले लाखों प्रवासी श्रमिक इस डर से वापस बंगाल लौटे कि वोटर लिस्ट से उनका नाम न कट जाए। इन प्रवासियों में प्रशासन के प्रति गुस्सा था। उनकी वापसी ने मतदान को अधिक अस्थिर बना दिया और सरकार के खिलाफ ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ को हवा दी।
5. मशीनरी
भाजपा ने इस बार केवल हवा में चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि अपना पूरा जोर ‘बूथ-लेवल मैनेजमेंट’ पर लगाया। डिजिटल अभियान और राज्य व केंद्रीय नेतृत्व के तालमेल ने टीएमसी के काडर-आधारित तंत्र को कड़ी टक्कर दी। भाजपा का जमीनी नेटवर्क इस बार टीएमसी के नेटवर्क से अधिक चुस्त नजर आया।
अगर ये रुझान अंतिम परिणामों में बदलते हैं, तो बंगाल में साढ़े तीन दशक के वामपंथी शासन और डेढ़ दशक के तृणमूल शासन के बाद एक नई राजनीतिक विचारधारा का उदय होगा। भाजपा के लिए यह जीत उसके ‘पूर्वी अभियान’ की सबसे बड़ी सफलता होगी

















