भुवनेश्वर। ओडिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन तथा ओडिशा नालेज कैपिटल बनाने के उद्देश्य से लेकर राज्य के साथ साथ पूरे भारत के शिक्षाविदों का दो दिवसीय मंथन कार्यक्रम ‘प्रज्ञा प्रेरणा’ का लोकसेवा भवन के कनवेंशन सेंटर में शुभारंभ हुआ । मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान भी इसके शुभारंभ कार्यक्रम में उपस्थित रहे ।
इस कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में अपने संबोधन में मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी ने ओशा की शैक्षिक व्यवस्था में एक “क्रांतिकारी परिवर्तन” का आह्वान किया।
एनईपी 2020: भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने का मिशन
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षों से शिक्षा क्षेत्र में जड़ता को समाप्त करना उनकी सरकार की प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) केवल एक सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत को विश्व का “नॉलेज कैपिटल” बनाने का एक महान मिशन है। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की प्रगति की आधारशिला है। सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि राज्य के विद्यार्थी “इंडस्ट्री-रेडी” बनें और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हों।
शिक्षा राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता
मुख्यमंत्री ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में शिक्षा क्षेत्र के लिए 41,273 करोड़ रुपये का विशाल बजट प्रावधान किया गया है। यह निवेश ओडिशा के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव रखेगा और राज्य की शिक्षा अवसंरचना को विश्वस्तरीय बनाएगा। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शैक्षणिक अंतर को कम करने के लिए सरकार ने ‘गोदाबरिश मिश्र आदर्श विद्यालय’ योजना शुरू की है। इस परियोजना पर 12,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे और राज्य की 6,794 ग्राम पंचायतों में एक-एक आधुनिक विद्यालय स्थापित किया जाएगा। इन विद्यालयों में शहरी स्तर की सुविधाएं जैसे उन्नत कक्षाएं, प्रयोगशालाएं और खेल सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

सामाजिक न्याय और समानता पर जोर
सरकार ने उच्च शिक्षा में सामाजिक समानता को बढ़ावा देते हुए SEBC वर्ग के छात्रों के लिए 11.25 प्रतिशत आरक्षण लागू किया है। इसके अलावा, अनुसूचित जनजाति (ST) छात्रों के ड्रॉपआउट को रोकने के लिए ‘शहीद माधो सिंह हाथ खर्च योजना’ के तहत प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ये कदम समाज के अंतिम पायदान पर खड़े छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
मातृभाषा और डिजिटल शिक्षा पर फोकस
मुख्यमंत्री ने कहा कि ओडिशा की अस्मिता को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। तकनीकी और उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों को ओडिया भाषा में उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार ने इग्नू (IGNOU) के साथ समझौता किया है। इससे छात्रों को अपनी भाषा में जटिल विषयों को समझने में आसानी होगी। उन्होंने कहा कि ये सभी पहलें ओडिशा को भविष्य में भारत के शीर्ष ज्ञान-आधारित समाज के रूप में स्थापित करने में सहायक होंगी।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा है कि ओडिशा के शैक्षणिक संस्थानों को केवल पारंपरिक शिक्षण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्वायत्तता, नवाचार और अनुसंधान के माध्यम से पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल के रूप में विकसित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप विश्वविद्यालयों को ऐसे “बेस्ट प्रैक्टिसेस” अपनाने चाहिए, जो स्थानीय समस्याओं के समाधान के साथ-साथ ‘विकसित ओडिशा’ और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को भी सशक्त करें।

ओडिशा: ज्ञान और संस्कृति की भूमि
श्री प्रधान ने ओडिशा को “ज्ञान की भूमि” बताते हुए कहा कि यह प्रदेश प्राचीन काल से ही विश्व को मार्गदर्शन देता आया है। उन्होंने कहा कि कलिंग युद्ध केवल एक रक्तरंजित संघर्ष नहीं था, बल्कि यह मानवता की विजय और शांति का संदेश था। श्रीलंका से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैली भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र ओडिशा ही रहा है। उन्होंने कहा कि ओडिशा की समुद्री व्यापार परंपरा, कृषि, मंदिर कला, साहित्य और समृद्ध संस्कृति का आधार उस समय की शिक्षा प्रणाली रही है। यह प्रदेश प्रारंभ से ही शिक्षा-प्रधान और ज्ञान आधारित समाज रहा है। उन्होंने सारला महाभारत, चंडी पुराण और विलंका रामायण जैसी कालजयी कृतियों को ओडिशा की बौद्धिक विरासत का प्रमाण बताया।
महान विभूतियों का योगदान
उन्होंने कहा कि पं. पठन सामंत, कवी सम्राट उपेन्द्र भंज, फकीर मोहन सेनापति और स्वभाव कवि गंगाधर मेहेर जैसे महापुरुष ओडिया समाज की बौद्धिक श्रेष्ठता के प्रतीक हैं। इसके साथ ही उन्होंने उल्लेख किया कि बौद्ध धर्म की प्रमुख शाखा “वज्रयान” के प्रवर्तक गुरु पद्मसंभव का जन्म ओडिशा में हुआ था, जिससे यह परंपरा हिमालय, तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश तक फैली। उन्होंने कहा कि ओडिशा की 450 किलोमीटर लंबी तटरेखा और खनिज संसाधनों को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था विकसित हो सके।
विश्वविद्यालय: भवन नहीं, भावना निर्माण का केंद्र बनें
श्री प्रधान ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल “भवन निर्माण” के केंद्र नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें “भावना और विचार निर्माण” के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 2036 में ओडिशा के भाषा आधारित राज्य गठन के 100 वर्ष और 2047 में भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होंगे। ऐसे में ‘विकसित ओडिशा’ और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों को अभी से सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि परिसर में खेल, कला, कौशल-आधारित शिक्षा और सेवा भावना को बढ़ावा देकर एक रचनात्मक शैक्षणिक संस्कृति विकसित करना आवश्यक है, जिससे ओडिशा के लगभग सवा करोड़ युवाओं का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।
स्थानीय इतिहास और मातृभाषा पर जोर
उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली में स्थानीय इतिहास, गांव के मंदिरों और ओडिशा के अज्ञात नायकों की वीरगाथाओं को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही संत कवि भीम भोई, गोपबंधु दास और पठन सामंत जैसे महान व्यक्तित्वों के दर्शन और वैज्ञानिक योगदान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। श्री प्रधान ने मातृभाषा ओड़िया को प्राथमिकता देने पर जोर देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शिक्षा नीति का उद्देश्य औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति और भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञान का विस्तार करना है। उन्होंने कहा कि श्रीजगन्नाथ संस्कृति से प्रेरणा लेकर ओडिशा की सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक दायित्व दोनों को शिक्षा प्रणाली में समाहित करना चाहिए।

डिजिटल शिक्षा और वैश्वीकरण पर बल
उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों का उपयोग आवश्यक है। स्वयं और स्वयंप्रभा जैसे प्लेटफॉर्म तथा ओड़िया भाषा में एआई आधारित कंटेंट के माध्यम से दूरदराज क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाई जा सकती है। इसके साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर देते हुए कहा कि विदेशी भाषाओं और आधुनिक पाठ्यक्रमों को शामिल कर ओडिशा के युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाना चाहिए।

















