इन दिनों देश के अलग-अलग भागों में नाटक ‘संघ गंगा के तीन भगीरथ’ का मंचन हो रहा है। पिछले दिनों दिल्ली के दिलशाद गार्डन, रोहिणी, झंडेवाला आदि स्थानों पर इस नाटक का मंचन हुआ, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक आए।
इस नाटक में आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, द्वितीय सरसंघचालक श्रीगुरुजी और तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस के जीवन चरित्र का परिचय देने के साथ ही संघ में उनके अद्वितीय योगदान, संघ के निर्माण एवं विस्तार की प्रेरणादायी यात्रा का उत्कृष्ट चित्रण किया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष की यात्रा को भी दर्शाया गया है।
नाटक में नागपुर के कलाकारों का दल शामिल है। नाटक का आरंभ बाल केशव के ऋ ग्वेद शिक्षक रहे श्री वझे गुरुजी (नानाजी वझे) से होता है, जहां वे केशव की छोटी-छोटी शरारतों और छत्रपति शिवाजी महाराज के पदचिह्नों पर चलने की प्रबल इच्छा के बारे में उनके माता-पिता को बताते हैं। सामाजिक चेतना जगाने वाले संवादों से नाटक धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।
युवा केशव ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में, अपने दृढ़ निश्चय के दम पर कोलकाता जाकर, चिकित्सक बनने का सपना साकार किया था। नाटक में डॉ. हेडगेवार के क्रांतिकारी विचार, उनके जातिवाद के प्रति स्पष्ट मत और संघ के कार्य में अंतर की स्पष्टता-इन सबका सुंदर चित्रण किया गया है।
उल्लेखनीय है कि प्रस्तुति में संघ के पहले तीन महानायकों के कार्य, उनके नेतृत्व, उनके द्वारा नेतृत्व का हस्तांतरण, उनसे जुड़े ऐतिहासिक पक्ष और उनकी जीवन-यात्रा को सुरुचिपूर्ण ढंग से चित्रित किया गया है।
नाटक में संघ की स्थापना का संकल्प, उसके प्रचार-प्रसार का विचार और महात्मा गांधी एवं डॉ. हेडगेवार की भेंट के प्रसंग को बहुत प्रभावी अंदाज में दर्शाया गया है। साथ ही श्रीगुरुजी के जीवन, स्वामी अखंडानंद जी के साथ उनका प्रवास व नागपुर लौटना, डॉ. हेडगेवार से मुलाकात आदि प्रसंगों को नाटक में रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है।
सरदार वल्लभभाई पटेल और श्रीगुरुजी के बीच संवाद, कश्मीर का भारत में विलय, संघ पर प्रतिबंध इन सभी प्रसंगों को प्रदर्शित करने से नाटक और अधिक प्रभावी बन पड़ा है। सरसंघचालक के रूप में श्री बालासाहब देवरस के चयन को भी नाटक में शामिल किया गया है। इसके साथ ही उनके कार्यकाल में घटीं प्रमुख घटनाओं, जैसे-1975 के आपातकाल की पृष्ठभूमि, उसका विरोध, मीसाबंदी, रामजन्मभूमि आंदोलन ऐसे अनेक प्रसंगों को भी नाटक में दिखाया गया है।
नाटक में प्रसंगों, व्यक्तित्वों और घटनाओं को ‘भारत माता’ के माध्यम से रुचिकर बनाने का प्रयास किया गया है। भारत माता की भूमिका में मीनल मुंडले की प्रभावशाली वाणी ने दृश्य को और भी मनोरम बनाया है। किसी नाटक की प्रस्तुति को संगीत भी प्रवाहमान बनाता है। इस नाटक में दृश्यों के अनुरूप संगीत और ‘वंदे मातरम्‘ की गूंज के साथ संघ घोष की लय का सुंदर समन्वय है। दृश्यों के परिवर्तन में संगीत का उपयुक्त प्रयोग नाटक की विशेषता है।
नाटक के लेखक श्रीधर गाडगे हैं। नाटक के मार्गदर्शक-रविंद्र भुसारी, निर्देशक-संजय पेंडसे, निर्माता-सारिका पेंडसे हैं। संगीत डॉ. भाग्यश्री चिटणीस का है और नेपथ्य सतीश पेंडसे ने रचा है।
निर्माण में रमण सेनाड, नीलिमा बावणे और अरुणा पुरोहित ने योगदान दिया है। अभिनेता मनीष ऊईके ने डॉ. हेडगेवार, रमण सेनाड ने श्रीगुरुजी और यशवंत चोपडे ने श्री बालासाहेब देवरस की भूमिका निभाई है।
















