तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा की हंसी केवल उनके होठों तक सीमित नहीं रहती, वह उनके पूरे व्यक्तित्व और आत्मा की गूंज होती है। अक्सर लोग हैरान होते हैं कि 80 से अधिक वर्ष की उम्र में और इतने सारे वैश्विक संघर्षों को देखने के बाद भी उनके भीतर एक बच्चे जैसी मासूम हंसी कैसे बची हुई है।
इसका जवाब उनके एक पुराने वीडियो में मिला है। इसमें जब एक शख्स ने उनसे उनकी इस बच्चों जैसी हंसी (Childlike) का रहस्य पूछा, तो उनका जवाब जवाब सबको लाजवाब कर गया।
दलाई लामा ने खोला अपनी हंसी का राज
दलाई लामा के अनुसार, उनकी हंसी का सबसे बड़ा रहस्य एक शांत और तनावमुक्त मन है। वे विस्तार से समझाते हैं कि मानसिक तनाव अक्सर हमारे स्वयं के ‘अहंकार’ की उपज होता है।
उन्होंने कहा कि, जब हम खुद को ‘विशेष’ समझने लगते हैं चाहे वह पद, प्रतिष्ठा या ज्ञान के कारण हो तो हम अनजाने में अपने ऊपर एक भारी बोझ लाद लेते हैं। यह खास होने का भाव हमें दूसरों से अलग करता है और हमारे भीतर एक निरंतर भय पैदा करता है कि कहीं हमारी यह छवि धूमिल न हो जाए।
छिपाने के लिए कुछ नहीं
दलाई लामा कहते हैं कि खुद को ‘विशेष’ दिखाने की कोशिश करना ही तनाव और चिंता मुख्य कारण है। इस दिखावे को बनाए रखने के लिए हमें हर समय सतर्क रहना पड़ता है, जिससे मन की सहजता खत्म हो जाती है।
वे ईमानदारी और पारदर्शिता पर जोर देते हुए बताते हैं जब आपके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होता और आप जैसे हैं वैसे ही दिखते हैं, तो आपका मन पूरी तरह से शांत और सुरक्षित महसूस करता है।
खुद को विशिष्ट व्यक्ति के रूप में नहीं देखते
दलाई लामा बताते हैं कि वे खुद को कभी एक ‘महान धर्मगुरु’ या ‘विशिष्ट व्यक्ति’ के रूप में नहीं देखते। वे कहते हैं जब आप दूसरों से एक ‘मनुष्य’ के नाते मिलते हैं, न कि अपने ‘पद’ के अहंकार के साथ, तो संवाद में एक सहजता और गर्मजोशी आ जाती है। यही वह स्थिति है जहां सच्ची और बेबाक हंसी जन्म लेती है।
















