मेरा गांव, मेरी पहचान : सूखे और पलायन से 50 करोड़पतियों तक का सफर, हिवारे बाजार ने लिख दी ग्रामीण भारत की नई तकदीर
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होम भारत गुजरात

मेरा गांव, मेरी पहचान : सूखे और पलायन से 50 करोड़पतियों तक का सफर, हिवारे बाजार ने लिख दी ग्रामीण भारत की नई तकदीर

गांव, यह शब्द सुनते ही मन में बाग, पगडंडियां, नीम की छांव, आम और जामुन के पेड़, हर कोई जाना-पहचाना, और भी बहुत कुछ दृश्य मन-मस्तिष्क में उभरते हैं। लेकिन ये गांव अब विकास की किताब में सुनहरे अक्षरों से अपना अध्याय खुद लिख रहे हैं।

Written byप्रमोद कुमारप्रमोद कुमार
May 1, 2026, 01:16 pm IST
in गुजरात, पर्यावरण, महाराष्ट्र

गांव, यह शब्द सुनते ही मन में बाग, पगडंडियां, नीम की छांव, आम और जामुन के पेड़, हर कोई जाना-पहचाना, और भी बहुत कुछ दृश्य मन-मस्तिष्क में उभरते हैं। लेकिन ये गांव अब विकास की किताब में सुनहरे अक्षरों से अपना अध्याय खुद लिख रहे हैं।

हम बात करेंगे आज महाराष्ट्र में अहमदनगर जिले के हिवारे बाजार गांव की, इस छोटे से गांव ने जल प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और सुनियोजित उद्यमिता के माध्यम से गरीबी से उभरते हुए समृद्धि की ओर बढ़ने का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है।

1980 के दशक के अंत तक यह गांव सूखे, पलायन और शराब की समस्या से जूझ रहा था, लेकिन आज यह भारत के सबसे समृद्ध गांवों में से एक है। आज, यहां 50 से अधिक करोड़पति हैं और औसत आय देश के ग्रामीण औसत से काफी अधिक है, जिसके कारण पुणे और मुंबई से लोग वापस आकर यहां बस रहे हैं। हिवारे बाजार की इस सफलता ने इसे महाराष्ट्र में “आदर्श गांव” के रूप में विकसित होने का गौरव प्राप्त हुआ है।

प्रमुख समस्या की पहचान

महाराष्ट्र में जिला अहमदनगर ही नहीं, अपितु पूरे विदर्भ में सूखे प्रकोप रहता है I अच्छी बात यह है कि हिवारे बाजार गांव के ग्रामीणों से सूखे समस्या को सभी समस्याओं का मूल मानते हुए, इसके समाधान पर वृहद् रूप से काम करने संकल्प लिया I जलाभाव जनित समस्याओं में घिरे इस गाँव ने अपनी मूल समस्या को पहचाना और उसके सम्पूर्ण समाधान पर काम करना प्रारंभ कर दिया I

जल संरक्षण से ग्राम संरक्षण

जल संरक्षण का विचार किया गया एवं सर्व प्रथम एक अनौखी साहसिक पहल की जिसमें गांव ने “जल बजट” की अवधारणा अपनाते हुए, गांव के जल जिसमें प्रतिवर्ष उपलब्ध पानी के आधार पर फसल योजना बनाई गयी । साथ ही वर्षा जल संचयन, गाँव में 52 से अधिक मिट्टी के बांध और चेक डैम बनाये गए I गाँव में जल रिसाव टैंकों का निर्माण किया गया, जिससे कि भूजल स्तर में भारी वृद्धि हुई। अधिक पानी की खपत वाली फसलों (जैसे गन्ना और केला) के स्थान पर, कम पानी वाली फसलों (प्याज, आलू) को प्राथमिकता दी गई। जनजीवन और कृषि कार्यों के लिए जल ही बना जीवन I

सामाजिक और आर्थिक सुधार

सभी पक्षों पर विचार करते हुए, गाँव में शराबबंदी, पेड़ काटने पर रोक और चराई पर नियंत्रण लगाया गया। साथ ही, परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया गया। परिणामतः गाँव में 50 से अधिक करोड़पति हैं और औसत आय देश के ग्रामीण औसत से काफी अधिक है, जिसके कारण पुणे और मुंबई से लोग वापस आकर यहाँ बस रहे हैं। गाँव में सड़क किनारे से पेड़ नहीं काटना,परिवार नियोजन पर जोर ध्यान देना, नशाबंदी लागू करना, श्रमदान के लिए आगे आना, लोटा बंदी हर घर में शौचालय, ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट जैसे सुधार करना गाँव के कायाकल्प के आधार बने I

आर्थिक आधार बनी खेती

बड़ी बात यह है, गाँव को गाँव ही रहने दें, आर्थिक स्वावलंबन के केवल औद्योगीकरण और बाजारवाद से ही नहीं, अपितु गाँव में भूमि सम्पदा का सदुपयोग करते हुए भी, पीढ़ियों से परंपरागत रूप से खेती के काम के अनुभव को अपनी शक्ति बनाया हिवरे बाजार गाँव ने I कमी थी मात्र जल उपलब्धता की, जिसका समुचित निराकरण कर, अपने गाँव के जीवन को जीवंत बनाने के लिए सभी ग्रामीणों ने कृषि कार्य को ही आर्थिक स्वावलंबन का आधार बनाया I बहुतायत में संतरे, प्याज और टमाटर की खेती के अतिरिक्त भी अनेकों प्रकार की आधुनिक फसल लगाने वाले ग्रामीण अपनी कुशल जल प्रबंधन, सामुदायिक प्रयास और आपसी सामंजस्य, गाँव के प्रति गौरव की भावना रखते हुए, खेती के सही स्वरुप को अपना कर प्रगतिशील किसान बनकर उभरे, जिनमें से ग्राम पंचायत के उप-प्रधान पोपट राव पंवार को पद्मश्री पुरुस्कार से भी सम्मानित किया गया है I

Topics: महाराष्ट्रपर्यावरणजल प्रबंधनमेरी पहचानपाञ्चजन्य विशेषमेरा गांवहिवारे बाजार गांवअहमदनगर जिलामेरा गांव मेरी पहचानजल संरक्षण
प्रमोद कुमार
प्रमोद कुमार
पाञ्चजन्य में असिस्टेंट एडिटर। राष्ट्रीय मुद्दों और सामाजिक सरोकार में रुचि। [Read more]
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