ओपेक से यूएई ने किया किनारा, भारत के लिए खुलेंगे सस्ते तेल और रणनीतिक जीत के द्वार
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ओपेक से यूएई ने किया किनारा, भारत के लिए खुलेंगे सस्ते तेल और रणनीतिक जीत के द्वार

संयुक्त अरब अमीरात का करीब 59 साल बाद ओपेक से अलग होना वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक पावर शिफ्ट का संकेत है

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता
Apr 29, 2026, 06:30 pm IST
in विश्व
भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान

खाड़ी देशों के इतिहास में एक नया मोड़ आ गया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने तेल उत्पादक देशों के ताकतवर संगठन ओपेक (OPEC)से बाहर निकलने का फैसला किया है। उसके इस कदम से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल मच गई है। भारत के लिए यह घटनाक्रम ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल, संयुक्त अरब अमीरात का करीब 59 साल बाद ओपेक से अलग होना वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक पावर शिफ्ट का संकेत है। भारत, जो अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इस फैसले का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।

भारत पर होंगे इसके सकारात्मक प्रभाव

ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई अब उत्पादन की सीमाओं से मुक्त होगा। वह अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा, जिससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति (सप्लाई) बढ़ेगी। आपूर्ति बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने की प्रबल संभावना है, जो सीधे तौर पर भारत के आयात बिल को कम करेगा।

भारत के लिए सस्ता कच्चा तेल न केवल परिवहन खर्च घटाएगा बल्कि देश के भीतर महंगाई को नियंत्रित करने में भी बड़ी भूमिका निभाएगा। इससे भारत का राजकोषीय घाटा कम होगा और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

यूएई पहले से ही भारत का एक विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार है। ओपेक की बंदिशों के बिना यूएई अब भारत के साथ सीधे और अधिक लचीले दीर्घकालिक तेल समझौतों पर हस्ताक्षर कर सकता है।

खाड़ी में गढ़े जा रहे नए समीकरण

यूएई का यह कदम केवल आर्थिक नहीं बल्कि गहरे रणनीतिक मतभेदों का परिणाम है। खाड़ी देशों के भीतर बढ़ती दरार अब साफ नजर आने लगी है, जहां एक तरफ सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की का नया गठजोड़ तैयार हो रहा है, वहीं यूएई ने भारत की ओर अपना झुकाव बढ़ा दिया है।

इसके कारण भी साफ हैं। यूएई इस बात से नाराज है कि ईरान के साथ संघर्ष के दौरान पाकिस्तान ने एक स्पष्ट रुख अपनाने के बजाय ‘मध्यस्थ’ बनने की कोशिश की। यूएई इसे अपनी सुरक्षा के प्रति पाकिस्तान की बेरुखी मान रहा है। इसी नाराजगी के चलते अबू धाबी ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज समय से पहले लौटाने को कहा, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका था।

ईरान के हमलों के दौरान यूएई को खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) से वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी। अमेरिका के युद्धविराम के फैसले के बाद यूएई ने खुद को सैन्य रूप से असुरक्षित महसूस किया और इजराइल व भारत जैसे देशों के साथ रक्षा संबंधों को प्राथमिकता देना शुरू किया। साथ ही यूएई अब खुद को सऊदी अरब के नेतृत्व वाले साये से बाहर निकालना चाहता है।

भारत के लिए रणनीतिक लाभ

यूएई और भारत के बीच बढ़ती नजदीकियां पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक हार की तरह हैं। क्योंकि इस कदम से यूएई ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी विदेश नीति को ‘व्यापार और सुरक्षा’ के आधार पर चलाएगा न केवल धार्मिक या पारंपरिक गठजोड़ पर।

हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल की यूएई यात्रा ने दोनों देशों के बीच रक्षा और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है।

यूएई भारत के बुनियादी ढांचे और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में भारी निवेश कर रहा है, जो सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की ब्लॉक के खिलाफ भारत की स्थिति को मजबूत करता है।

यूएई के नेताओं का तर्क

यूएई के ऊर्जा मंत्री सुनील मोहम्मद अल माजुरी ने इस फैसले को देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और बाजार की जरूरतों के अनुरूप बताया तो वहीं उद्योग मंत्री सुल्तान अल जाबर ने इसे राष्ट्रीय हित और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिहाज से जरूरी बताया। साफ है कि खाड़ी में तनाव के बीच भारत और यूएई मिलकर कुछ ऐसे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं जो दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो।

 

Topics: Global Oil PricesGulf Geopoliticslndian Economy Ajit Doval UAE VisitPakistansaudiIndia energy securityUAE Quits OPECIndia UAE Strategic Ties
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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