बात भारत की : जब इतिहास अधूरा होता है, तो समाज भी अधूरा रह जाता है
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बात भारत की : जब इतिहास अधूरा होता है, तो समाज भी अधूरा रह जाता है

इतिहास तीन चीजों से प्रभावित होता चयन, व्याख्या एवं प्रस्तुतिकरण। इतिहास में बार-बार आक्रमण , पराजय एवं बाहरी शासन को प्रमुखता दी जाती है, तो स्वयं के ज्ञान सांस्कृतिक उपलब्धियां पृष्ठभूमि में चली जाती हैं

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Apr 25, 2026, 10:54 pm IST
in भारत
बात भारत की

बात भारत की

आज कक्षा में साधारण सा दिन था लेकिन इतिहास के शिक्षक के प्रश्नों ने उसे असाधारण बना दिया। शिक्षक ने पूछा अकबर के पिता कौन थे ? तुरंत उत्तर आया हुमायूं। शिक्षक ने अगला प्रश्न किया अशोक के पिता कौन थे ? कक्षा में सन्नाटा छा गया हालांकि उत्तर था बिंदुसार, पर लगा कि ज्ञान पीछे छूट गया है। शिक्षक ने प्रश्न बदला और पूछा बाबर की कब्र कहां है ? उत्तर आया काबुल। शिक्षक ने अगला प्रश्न किया राणा सांगा की समाधि कहां है ? अब केवल मौन नहीं था, साथ में एक प्रश्न सब की आंखों में दिखाई दे रहा था कि राणा सांगा कौन ?

शिक्षक ने धीरे से पूछा क्या तुमने एलोरा के बारे में सुना है, उस कैलाश मंदिर के बारे में जो एक ही पत्थर को काटकर बनाई गई संरचना है, जिसका रहस्य आज तक कोई सुलझा नहीं पाया। छात्रों में आश्चर्य था, कहीं न कहीं बेचैनी थी कि आखिर यह सब क्यों हुआ ? हमें क्यों नहीं सिखाया गया ? प्रश्न यह नहीं कि हमें क्या सिखाया गया ? क्या नहीं सिखाया गया ?

यहीं से इतिहास लेखन की समस्या सामने आती है, इतिहास तीन चीजों से प्रभावित होता चयन, व्याख्या एवं प्रस्तुतिकरण। इतिहास में बार-बार आक्रमण , पराजय एवं बाहरी शासन को प्रमुखता दी जाती है, तो स्वयं के ज्ञान सांस्कृतिक उपलब्धियां पृष्ठभूमि में चली जाती हैं, और धीरे-धीरे समाज की आत्म छवि बदलने लगती है। तो क्या वाकई भारतीयता को पीछे धकेला गया है ? क्या भारत का इतिहास आक्रमणों का इतिहास है ? क्या भारत का इतिहास पराजयों का इतिहास है ? वास्तव में भारतीय शासकों, नायकों, परंपराओं और निर्माण को पर्याप्त स्थान नहीं मिला।

इतिहास तब तक अधूरा है…

एक अफ्रीकी कहावत है, जब तक शेर अपने इतिहासकार नहीं बनते तब तक शिकार की कहानी हमेशा शिकारी के पक्ष में ही लिखी जाएगी। यह कथन केवल अफ्रीका के लिए नहीं, हर उस समाज पर लागू होता है, जो अपने इतिहास को स्वयं नहीं लिखना वह दूसरों की दृष्टि से पढ़ता है। वी एस नायपॉल ने अपनी पुस्तक इंडिया ए वुंडेड सिविलाइजेशन में भारत को आहत सभ्यता कहा, उन्होंने कहा कि भारत में ऐतिहासिक विवरण विजेताओं की दृष्टि से लिखे गए। लंबे समय भारत इस्लामी शासन एवं औपनिवेशिक शासन के दशक में रहा, जिसका प्रभाव समाज पर पड़ा, आत्म विश्लेषण की कमी समाज में दिखाई थी। आज हमें इतिहास केवल याद करने का विषय नहीं समझना और पुनः पढ़ने का विषय बनाना पड़ेगा। इतिहास तब तक अधूरा है जब तक उसमें सभी प्रश्न, सभी आवाज़ और सभी दृष्टिकोण ना शामिल हो।

विदेशी स्रोत और मार्क्सवाद

इन सब के पीछे कारण है औपनिवेशिक प्रभाव, सांस्कृतिक मार्क्सवाद और विदेशी स्रोतों पर निर्भरता। औपनिवेशिक शासन ने स्वयं को आधुनिकीकरण के रूप में प्रस्तुत किया और भारतीय समाज को पिछड़ा दिखाया, जिससे भारतीय उपलब्धियां पृष्ठभूमि में चली गईं। वहीं अंटोनिओ ग्राम्सी एवं फ्रैंकफर्ट स्कूल ने सांस्कृतिक मार्क्सवाद के द्वारा भारतीय समाज को संघर्ष के दृष्टिकोण से देखा , वर्ग -जाति और पहचान पर ज्यादा ध्यान दिया गया। भारतीय इतिहास के लेखन में विदेशी स्रोतों और औपनिवेशिक दस्तावेजों को अधिक प्रामाणिक माना गया, जिससे भारतीय ऐतिहासिक परंपराएं पीछे चली गईं। प्रश्न उठता है कि इतिहास को ही निशाना क्यों बनाया गया ? उसके पीछे क्या कारण रहे होंगे ?

सांस्कृतिक मार्क्सवाद का विचार है कि सत्ता केवल बल से नहीं बल्कि सहमति से आती है और यह सहमति बनती शिक्षा से, संस्कृति से, जिसे उन्होंने कल्चरल हेजेमनी कहा है। इतिहास को चुनने के पीछे एक बड़ा कारण है, कि इतिहास एक नैरेटिव अर्थात विमर्श की जड़ है, जो समाज अपने अतीत को जिस तरह समझता है वह उसी के आधार पर अपनी पहचान बनाता है, राजनीतिक भविष्य तय करता है। इतिहास एक पहचान है, जब आप बताते हो हम कौन हैं ? हमारा अतीत क्या है ? हमारे नायक कौन हैं ? तो आप स्वयं के साथ-साथ पूरे समाज के लिए सामूहिक पहचान बना रहे होते हैं। इसलिए इतिहास पर प्रभाव डालना अर्थात समाज की आत्मछवि पर प्रभाव डालना है।

जब गलत इतिहास को सत्य मान लेंगे

दूसरा इतिहास वैधता देता है, इतिहास की विचारधारा लंबे समय तक मस्तिष्क में बनी रहती है और यह बताती कि हम सही हैं ,क्योंकि इतिहास भी यही कहता है। इसलिए अगर हमें गलत इतिहास पढ़ाया जाएगा तो लंबे समय तक उस गलत इतिहास को सत्य मानने लगेंगे। इसलिए इतिहास का उपयोग अपनी वैधता साबित करने के लिए किया जाता है।
अगर हम देखें तो इतिहास कहीं न कहीं विमर्श को नियंत्रित करता है, विचारों को नियंत्रित करता है, जैसा कि एंटोनियो ग्रामसी भी कहते हैं कि जो विचारों को नियंत्रित करता है, वही समाज को नियंत्रित करता है।

इतिहास स्कूल से लेकर महाविद्यालय तक पढ़ाया जाता है, तो युवा वर्ग को इतिहास के माध्यम से आप अपने पक्ष में कर सकते हैं। इसलिए इसका प्रभाव पूरे समाज पर, पूरे देश पर पड़ता है। इतिहास कहीं न कहीं समाज सुधार का एक माध्यम भी है। इतिहास विभिन्न प्रकार की विसंगतियों को चाहे वह सत्य हो या असत्य, उठाने का माध्यम बन जाता है। इतिहास लोगों की भावनाओं से जुड़ा होता है, उनके गौरव से और संघर्ष से जुड़ा होता है। इसलिए इतिहास को चुना जाता है।
आज हमारे समाज को, इस इतिहास ने विभिन्न वर्गों के रूप में परिवर्तित कर दिया जो कहते हैं कि हम शोषित हैं, हमारे साथ शोषण हुआ है। दूसरी वह है जो कहते हैं हम हिंदू ही नहीं। एक वर्ग है जो कहता है कि हम मूल निवासी हैं, बाकी सब विदेशी हैं। प्रश्न उठता है कि लोगों को प्राचीन काल का शोषण याद है और ये विदेशी हैं, यह भी याद है, पर वह मुगलों के एवं अंग्रेजों के शोषण तथा अत्याचारों को भूल गए, जो अभी हाल के ही जख्म हैं। हम उन विदेशियों को याद नहीं कर पाए जो मुगलों, महमूद गजनवी, अंग्रेजों के रूप में पुर्तगालियों के रूप में भारत आए और अनेक अत्याचार किये।

सत्य को पहचानें, तथ्य पर बात करें

यही है इतिहास की विडंबना, और यही है इतिहास का प्रस्तुतीकरण। जिस देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सबको शासन करने का मौका मिला हो, जहां पर अधिकांश देवता गैर-ब्राह्मण हैं, जहां भक्ति आंदोलन में हर जाति के व्यक्तियों को संत का दर्जा दिया और उनके चरणामृत सभी ग्रहण करते हैं। इन बातों को भी तो सामने लाना चाहिए जिसे समाज में एकजुटता हो , समरसता हो ,न कि इस देश को खंड-खंड करने का प्रयास करना चाहिए। कितने टुकड़े करोगे, इस देश के ? कभी हिंदी बनाम तमिल, आर्य बनाम द्रविड़ दलित बनाम सवर्ण, विदेशी बनाम मूलनिवासी आदि इतने सारे विवादित मुद्दे पैदा कर दिए हैं, जिसमें सत्यता का अंश बहुत कम है। पूरा देश आज संक्रमण काल से गुजर रहा है क्या हम स्वयं जानते हैं कि सत्य क्या है ? सब पढ़ा हुआ है, पर पता नहीं क्यों सत्य को नजरअंदाज कर रहे हैं ? इसलिए आवश्यकता है सत्य को पहचाने, तथ्यों पर विचार करें बात करें।

पूजनीय हैं महापुरुष

हमारे देश में चाहे नानक हों या बुद्ध या महावीर या राम, सब हमारे लिए पूजनीय हैं, उनके विचार ग्रहण करने योग्य हैं और यही हमारी समरसता और यही हमारी संस्कृति है।

आज आवश्यकता है विसंगतियां कम हों, संतुलित इतिहास पढ़ना-पढ़ाना और समाज को जोड़ना। इसके लिए हमें पाठ्यक्रम, शोध और विमर्श पर ध्यान देना होगा। इतिहास को बहुआयामी दृष्टिकोण से समझना होगा क्योंकि इतिहास केवल तथ्य संग्रह नहीं है, इतिहास एक कथा है, एक व्याख्या है। इसलिए हमें तर्कसंगत विमर्श को सामने रखना चाहिए पाठ्यक्रम में उपलब्धि-चुनौतियों का संतुलित स्थान होना चाहिए।

दावे के साथ स्रोत दिखाना जरूरी

स्थानीय-क्षेत्रीय नायक, स्थापत्य एवं परंपराओं को भी पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। जितने भी दावे हैं उनके साथ स्रोत दिखाना आवश्यक है। इसके लिए हमें शिक्षकों को भी प्रशिक्षण देने पर चाहिए, नई शोध पद्धतियां पुरातत्व अभिलेख शास्त्र का प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि वह निष्पक्ष और संवादात्मक वातावरण बनाएं साथ ही इसके लिए टीवी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इतिहास को संवेदनशील तत्व ढंग से प्रस्तुत करने चाहिए। सनसनी के बजाय संदर्भ स्रोत बताने चाहिए, विश्वविद्यालय की तरह स्कूल में भी शोध को बढ़ावा देना चाहिए और अंतर विषयक शोध को आगे बढ़ने से इतिहास को नया आयाम मिलेगा। इसलिए इतिहास को लेकर उठे प्रश्न अतीत की बहस नहीं है। क्योंकि इतिहास हमारे वर्तमान की दिशा और भविष्य की चेतना से जुड़ा हुआ है। यदि इतिहास अधूरा है, चयनित है, पक्षपाती है, तो समाज भ्रम , दूरी और विभाजन पैदा करता है। हमें इतिहास को, समाज को जोड़ने वाली शक्ति बनाना है। अगर कहीं ऐतिहासिक गलतियां हुई है तो उन्हें सुधारना है स्वीकार करना है, उपलब्धियो के साथ-साथ कमियों को भी आगे ले जाना है, जिससे हम अपने समाज को एवं अपने राष्ट्र को गौरवमई बना सके। इतिहास को केवल याद करने की वस्तु नहीं, समझने की प्रक्रिया बनाएं जिससे इतिहास राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक एकता का सेतु बन जाए।

Topics: समरसताभारतीय समाज‘बात भारत की’भारतीय इतिहासपाञ्चजन्य विशेषभारतीय संस्कृति
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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