मां को जिंदा जलाने वाले दंगाइयों पर खड़गे की आक्रामकता होती तो परिवार-गांव को न्याय मिल चुका होता
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मां को जिंदा जलाने वाले दंगाइयों पर खड़गे की आक्रामकता होती तो परिवार-गांव को न्याय मिल चुका होता

भारतीय राजनीति में बयानबाजी और विवाद एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं और मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम हाल के वर्षों में ऐसे ही कई तीखे बयानों के कारण चर्चा में रहा है।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य
Apr 23, 2026, 01:58 pm IST
inविश्लेषण
मल्लिकार्जुन खरगे

मल्लिकार्जुन खरगे

भारतीय राजनीति में बयानबाजी और विवाद एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं और मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम हाल के वर्षों में ऐसे ही कई तीखे बयानों के कारण चर्चा में रहा है। करीब 83 की उम्र के साथ एक ओर उनका लंबा राजनीतिक अनुभव है, दूसरी ओर उनके विवादित बयानों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है।2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान उनका अगर कांग्रेस 40 सीटें ला दे तो क्या प्रधानमंत्री फांसी लगा लेंगे वाला बयान पहली बार बड़े स्तर पर आलोचना का कारण बना था। इसके बाद नवंबर 2022 में गुजरात चुनाव के दौरान उन्होंने नरेंद्र मोदी के क्या 100 सिर हैं जैसी टिप्पणी की, जिसे राजनीतिक मर्यादा से बाहर माना गया। अप्रैल 2023 में उन्होंने गैर राजनीतिक संगठन आरएसएस और राजनीतिक दल भाजपा की तुलना जहरीले सांप से की थी, जिस पर खूब विवाद हुआ।

इसके बाद भी बयानबाजी का सिलसिला नहीं रुका। 2024 में उन्होंने BJP को आतंकवादियों की पार्टी जैसा बताया। 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी पर विवाद हुआ। 2026 में गुजरात के लोग अनपढ़ हैं जैसी टिप्पणी की और अब तमिलनाडु चुनाव के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आतंकवादी कह कर राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है ।हालांकि अपने ही देश के प्रधानमंत्री को आतंकवादी बता कर वह भारत विरोधी शक्तियों को बैठे बिठाए मुद्दा दे रहे हैं। हालांकि उनके विवादित बयानों की फेहरिस्त और इतिहास इस बात का साक्षी है कि कई मौकों पर खड़गे सफाई एवं खेद प्रकट कर चुके है।

इन विवादों से इतर एक बड़ा और असहज सवाल भी खड़ा होता है, जो सीधे खड़गे के व्यक्तिगत और राजनीतिक इतिहास से जुड़ा है। 1948 में उनके गांव में हुई हिंसा में उनके परिवार के कई सदस्य जिंदा जला दिए गए थे। वे खुद भी कह चुके हैं कि उनके जीवन को इस घटना ने गहराई से प्रभावित किया,क्योंकि जब घटना उनकी आंखों के सामने हो रही थी तो उनकी आयु केवल 6 साल थी और वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पाये थे। इसके बावजूद, उनके लंबे राजनीतिक करियर, जिसमें वे 9 बार विधायक, 3 बार लोकसभा सांसद, एक बार राज्यसभा सदस्य, संसद में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष तक रहे, के दौरान इस घटना को लेकर उनके द्वारा संघर्ष,न्याय की कोई बड़ी सार्वजनिक लड़ाई या लगातार अभियान सामने नहीं आया, जबकि इस घटना के चंद साल बाद वह छात्र नेता,संयुक्त मजदूर संघ के बड़े नेता और इस घटना के 24 साल बाद 1972 में पहली बार विधायक चुने जा चुके थे।

यहीं पर विरोधाभास दिखता है। एक नेता जो राष्ट्रीय स्तर पर बड़े बड़े मुद्दों पर आक्रामक बयान देता है, वही अपने निजी जीवन की इतनी बड़ी त्रासदी पर अपेक्षाकृत मौन क्यों रहा ? यह सवाल सिर्फ राजनीतिक विरोधियों का नहीं, बल्कि हर दृष्टि से उठना लाजिमी बनता है। अगर 1984 के दंगों जैसे मामलों में दशकों तक न्याय की मांग जारी रह सकती है, तो फिर अपने गांव और परिवार के लिए वैसी ही मुखरता क्यों नहीं दिखाई गई।दूसरी ओर, प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को आतंकवादी कहना केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता। ऐसे बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संदर्भ से काटकर इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिससे देश की छवि प्रभावित हो सकती है। यह जोखिम किसी भी जिम्मेदार नेता को समझना चाहिए।साफ बात यह है कि खड़गे का राजनीतिक कद बड़ा है, लेकिन उनके कुछ बयान कद के अनुरूप संतुलित नहीं दिखते।

Topics: Mallikarjun Kharge's statement on PM ModiCongressPrime Minister Narendra ModiMallikarjun Kharge
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
वरिष्ठ पत्रकार [Read more]
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