प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर छत्तीसगढ़, जिसे प्रकृति ने अनुपम संसाधन और छटाएं बख्शी हैं। यहां की सांस्कृतिक धरोहर बेहद समृद्ध है। जनजातीय जीवन और लोक परंपराओं की गूंज जहां आज भी घाटी कंदराओं से लेकर बस्तर तक सुनी जा सकती है। नक्सली हिंसा के दौर के थमने के बाद सामने आई चुनौतियों, अर्थव्यवस्था, राज्य के भविष्य जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने विशेष बातचीत की, प्रस्तुत हैं उसके संपादित अंश
जनवरी 2024 में अमित शाह जी की एक बैठक हुई थी जिसमें उन्होंने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूरी तरह खात्मे की बात की थी। संकल्प पूरा भी हुआ। इस बात की गूंज देश की संसद से पूरी दुनिया तक सबने सुनी। मगर इस संकल्प को पूरा होने के पीछे चुनौतियां कैसी थीं? काम कैसे हुआ? और आगे की राह आप कैसे देखते हैं?
विधानसभा चुनाव 2023 में छत्तीसगढ़ की 3 करोड़ जनता ने भारतीय जनता पार्टी और हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी पर विश्वास करके हमें बड़ा जनादेश दिया। 13 दिसंबर, 2023 को सरकार ने शपथ ली और अगले ही महीने जनवरी 2024 में हमारे देश के यशस्वी गृहमंत्री श्री अमित शाह जी छत्तीसगढ़ आए। उन्होंने रायपुर में छत्तीसगढ़ समेत जितने भी नक्सल प्रभावित प्रदेश थे, उन सभी की समीक्षा बैठक की। उस दौरान पता चला कि 75 प्रतिशत से ज्यादा नक्सलवाद छत्तीसगढ़ में ही बचा हुआ है। इसका कारण यह भी था कि पिछली कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार के साथ सहयोग नहीं किया, इसलिए नक्सलवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ाई नहीं लड़ी गई। इसके बाद भी गृह मंत्री जी लगातार छत्तीसगढ़ आते रहे, जवानों की हौसला अफजाई करते रहे, सुरक्षा कैंपों में गए, उनके साथ संवाद किया। इससे जवानों का उत्साह बढ़ा। फिर 24 अगस्त, 2024 को उन्होंने 31 मार्च, 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद समाप्त करने की समय-सीमा घोषित की। इसके बाद रणनीति बनी और उसका सही तरीके से क्रियान्वयन किया गया। आज हम 3 करोड़ छत्तीसगढ़ की जनता की ओर से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, गृहमंत्री श्री अमित शाह जी और हमारे जवानों के बहुत आभारी हैं। उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति और साहस के कारण नक्सलवाद को समाप्त करने में सफलता मिली। एक समय राज्य के करीब 14 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, आज वे नक्सलमुक्त हो चुके हैं। विशेषकर बस्तर क्षेत्र, जो केरल प्रांत से भी बड़ा है, चार दशकों से विकास से वंचित था। अब नक्सलवाद समाप्त होने के बाद वहां तेजी से विकास हो रहा है।

छत्तीसगढ़ राज्य को 25 वर्ष हो चुके हैं। भाजपा को लंबे समय तक जनता ने कमान सौंपी, फिर बीच में कांग्रेस आई। ऐसे में क्या गाड़ी पटरी से उतर गई थी, सत्ता में आने के बाद आपने कौन से कार्य बदले, कौन से संरचनात्मक काम जारी रखे और किन बातों पर फोकस किया?
पिछले साल 2025 में हम लोगों ने प्रदेश की स्थापना का रजत जयंती वर्ष मनाया। 25 वर्ष पूरे हुए और 1 नवंबर को हम स्थापना दिवस मनाते हैं। इस अवसर पर हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री जी रायपुर आए और उन्होंने राजोत्सव का शुभारंभ किया, नवनिर्मित विधानसभा भवन का लोकार्पण किया और शहीद वीर नारायण सिंह ट्राइबल म्यूजियम का भी लोकार्पण किया। छत्तीसगढ़ में अनेक जनजातीय समाज के महापुरुष हुए जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और बलिदान हुए। हमने ऐसे क्रांतिकारियों को लेकर देश का पहला डिजिटल ट्राइबल म्यूजियम बनाया है। 25 वर्षों को देखें तो शुरुआती तीन वर्ष कांग्रेस की सरकार थी। उसके बाद पहले विधानसभा चुनाव में जनता ने भारतीय जनता पार्टी को जनादेश दिया और डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में 15 वर्षों तक सरकार चली। कांग्रेस के समय वहां भुखमरी की स्थिति थी, लोग महुआ खाते थे और कभी-कभी वह भी नसीब नहीं होता था। 2003 के पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनी तो हमने खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया। इससे भुखमरी लगभग खत्म हो गई। उस समय न सड़क थी, न बिजली थी, न पानी था। लेकिन 15 वर्षों में राज्य का बहुमुखी विकास हुआ। केंद्र में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की, इसके बाद छत्तीसगढ़ के गांवों तक सड़कें बननी शुरू हुईं। कांग्रेस को 2018 के चुनाव में मौका मिला, लेकिन वह उसे संभाल नहीं पाई, जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी और जनता के विश्वास को तोड़ा। इसलिए 2023 में फिर से भाजपा को जनादेश मिला।

नक्सलवाद खत्म होने के बाद भी एक वैचारिक चुनौती बची रहती है। गोली रुक सकती है, लेकिन आक्रोश की भाषा, भड़काने की मानसिकता और बौद्धिक आतंकवाद कैसे समाप्त होगा? वनवासी समाज के दर्द पर मरहम कैसे लगेगा?
नक्सलवाद समाप्त हुआ है, लेकिन हम जानते हैं कि चार दशकों तक विकास से वंचित रहे लोगों तक विकास पहुंचाना भी जरूरी है। उनसे सतत संपर्क में रहना होगा। इसलिए नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई शुरू करते ही वहां विकास पहुंचाने का काम भी शुरू किया गया। हमने नियानार योजना शुरू की है, जिसका हिंदी अर्थ है “आपका सुंदर गांव।” इसके तहत सरकार की करीब 15-16 विभागों की और 40 से भी ऊपर व्यक्ति-मूलक योजनाएं उन क्षेत्रों तक पहुंचाई जा रही हैं। आज 500 से ज्यादा गांवों में सड़कें बन चुकी हैं, पानी पहुंच चुका है, बिजली घरों में पहुंच चुकी है, राशन कार्ड बन गए हैं, राशन की दुकान खुल गई हैं और दूरसंचार के साधन भी स्थापित किए गए हैं। जहां कभी बंदूकों की आवाज सुनाई देती थी, आज वहां स्कूलों की घंटियां सुनाई देती हैं। अस्पताल भी खुल रहे हैं। गृहमंत्री जी ने आश्वस्त किया है कि बस्तर को देश का सबसे सुंदर आदिवासी संभाग बनाया जाएगा, जहां पक्के घर, बिजली, पानी, अच्छे अस्पताल और अच्छे स्कूल होंगे। इसी के साथ लोगों को जोड़ने के लिए बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजन भी किए जा रहे हैं। जनजातीय समाज खेलों के प्रति रुचिकर है, तीरंदाजी, तैराकी, दौड़ और मैराथन जैसे खेलों में उनकी दक्षता है। ये उनकी पुश्तैनी दिनचर्या का हिस्सा हैं। बस्तर ओलंपिक में पहले साल 1,65,000 लोग शामिल हुए थे, दूसरे साल यह संख्या बढ़कर 3 लाख हो गई। प्रधानमंत्री जी भी ‘मन की बात’ में बस्तर ओलंपिक का उल्लेख कर चुके हैं।
विकास के साथ यह भी सवाल रहता है कि कमाई कैसे होगी और खर्च कैसे चलेगा। एक तरफ कल्याणकारी राज्य की अवधारणा है, दूसरी तरफ चुनौतियां भी हैं। इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाएंगे?
बस्तर क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। प्राकृतिक दृष्टि से वह बहुत सुंदर है। मैं स्वयं चित्रकूट, तीर्थगढ़, कांगेर और दरबा जैसी जगहों पर कई बार जा चुका हूं। वहां पर्यटन को और आगे बढ़ाया जाएगा। ‘होम-स्टे’ को नई औद्योगिक नीति में शामिल किया गया है, ताकि विदेशी पर्यटक होटल की बजाय स्थानीय लोगों के साथ रहना, बोलना और मिलना पसंद करें। वहां सैकड़ों तरह के वन उत्पाद हैं, इमली, साल बीज, महुआ, रेशम और काजू आदि। बस्तर की इमली दिल्ली के मेलों में प्रसिद्ध हो रही है। काजू सिर्फ गोवा में नहीं, बस्तर में भी बहुत अच्छी किस्म का पैदा होता है। छत्तीसगढ़ को सिर्फ धान का कटोरा नहीं, बल्कि विविधीकृत अर्थव्यवस्था के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा। कृषि को बढ़ाने के लिए सिंचाई साधन भी बढ़ाए जा रहे हैं। इस साल देवरगांव और मटनार की दो बड़ी सिंचाई परियोजनाएं, करीब 2000 करोड़ की, स्वीकृत की गई हैं। इससे खेतों में पानी पहुंचेगा। पशुपालन और मत्स्यपालन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। आर्थिक विकास के साथ अर्थव्यवस्था में विविधकरण भी किया जा रहा है।
छत्तीसगढ़ की पहचान में जनजातीय जीवन, आस्थाएं और परंपराएं बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसी बीच कन्वर्जन का मुद्दा भी लंबे समय से रहा है। कन्वर्जन की रोकथाम के लिए जिस बिल की चर्चा है, उसकी आवश्यकता आपको पहली बार कब महसूस हुई और उसकी विशेषताएं क्या हैं?
मैं छत्तीसगढ़ के पूर्वी क्षेत्र के जसपुर जिले का रहने वाला हूं। यह क्षेत्र मिशनरियों का बड़ा केंद्र रहा है, यहां पहले बहुत कन्वर्जन होता था। वहां स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव जी हुए, जिन्होंने ‘घर वापसी’ कार्यक्रम चलाया और लाखों लोगों के पैर अपने हाथों से धोकर उन्हें फिर से हिंदू बनाने का काम किया। ‘अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम’ का केंद्रीय कार्यालय जसपुर में है, गांव-गांव में उसके कार्यकर्ता हैं। उन्हीं के नेतृत्व में हमने कन्वर्जन और गौहत्या को लेकर अनेक पदयात्राएं भी कीं, जिससे कुछ रोक लगी। किसी को भी अपनी आस्था चुनने का अधिकार है। लेकिन किसी की अशिक्षा, गरीबी या भोलेपन का लाभ उठाकर कन्वर्जन कराना अनुचित और गलत है। इसके खिलाफ हम लगातार विरोध करते रहे। इसलिए छत्तीसगढ़ विधानसभा में ‘धर्म स्वतंत्रता बिल’ पास कराया गया है, जिसमें कठोर सजा का प्रावधान है। मुझे पूरा भरोसा है कि अब कन्वर्जन पर अंकुश लगेगा।
कांग्रेस ने ऐसा क्यों नहीं किया ? क्या यह इच्छाशक्ति का विषय था या उनकी प्राथमिकताओं में यह विषय ही नहीं था? क्या भाजपा और कांग्रेस की सोच अलग है ?
भारतीय जनता पार्टी जो कहती है, वह करती है। कांग्रेस ने जनजातीय समाज को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया, कभी भी उनके हित की चिंता नहीं की। जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी, तब पहली बार जनजातीय समाज के समुचित विकास के लिए आदिम जाति कल्याण मंत्रालय का गठन किया गया। छत्तीसगढ़ में 32 प्रतिशत जनजातीय समाज है, उनके विकास के लिए अलग राज्य बनाया गया। आज सम्मान बढ़ाने का काम भी भाजपा ने किया है। देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पर जनजातीय समाज से आने वाली श्रीमती द्रौपदी मुर्मू विराजमान हैं और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में एक जनजातीय समाज के छोटे से कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री का दायित्व दिया गया है।
कांग्रेस की प्राथमिकता में कभी जनजातीय समाज क्यों नहीं रहा? दरभा घाटी की बात आती है तो मुझे महेंद्र कर्मा याद आते हैं, जिन्हें बस्तर का शेर कहा जाता था। कांग्रेस पार्टी की पूरी लीडरशिप को नक्सलियों ने मार दिया, लेकिन कांग्रेस की ओर से इस हिंसा के प्रतिरोध में जो दृढ़ता होनी चाहिए थी, वह क्यों नहीं दिखी?
दरअसल, नक्सलवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ाई भाजपा ने लड़ी। दरभा घाटी की घटना के समय विपक्ष में कांग्रेस के लोग थे और भूपेश बघेल नेता प्रतिपक्ष थे। वे बोलते थे कि दरभा घाटी का प्रमाण हमारी जेब में है, लेकिन बाद में पांच साल सरकार चलाने का अवसर मिलने पर भी वे उस मुद्दे पर कुछ नहीं कर पाए। उनकी कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है।
उस हिंसा के बाद जनता में आक्रोश तो था। फिर भी कांग्रेस ने नक्सलवाद की समाप्ति के लिए इच्छा शक्ति क्यों नहीं दिखाई। आप इसे कैसे देखते हैं?
बिल्कुल आक्रोश था, लेकिन ये लोग आपस में इतने बिखरे हुए हैं कि उन्हें अपने दल की भी चिंता नहीं रहती, बल्कि अपने गुट की चिंता रहती है। भ्रष्टाचार की दलदल की भी चिंता नहीं होती। 5 वर्षों तक उन्हें बड़ा जनादेश मिला था, लेकिन उन्होंने छत्तीसगढ़ को लूटने का काम किया। अनेक भ्रष्टाचार किए। आज भी इनके लोग कई केसों में जेल के अंदर हैं।
आपके नेतृत्व में जो बदलाव दिख रहा है, उसमें शिक्षा और स्वास्थ्य भी बड़ी कसौटी है। ग्रामीण और जनजातीय समाज को शहरी क्षेत्रों जैसी सुविधा कैसे मिल सके, इस दिशा में क्या काम हो रहा है?
छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के समय शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में बहुत पिछड़ा हुआ था। उस समय राज्य में मात्र एक मेडिकल कॉलेज था। लेकिन जब भाजपा की सरकार आई और 15 साल तक हम सरकार में रहे, और अब दो साल से फिर सरकार में हैं, तो आज 15 मेडिकल कॉलेज हो गए हैं। अभी दो साल में पांच और मेडिकल कॉलेज बनाए जा रहे हैं। आज छत्तीसगढ़ के अंदर आईआईटी, आईआईएम, ट्रिपल आईटी, लॉ यूनिवर्सिटी जैसी सभी प्रमुख शिक्षण संस्थाएं मौजूद हैं। हर विकासखंड में कॉलेज की स्थापना हो रही है। 1 किलोमीटर के भीतर प्राइमरी स्कूल, 3 किलोमीटर में मिडिल स्कूल, 5-6 किलोमीटर में हाई स्कूल और 7-8 किलोमीटर के अंदर हायर सेकेंडरी स्कूल की व्यवस्था की जा रही है। चिकित्सा के लिए बस्तर क्षेत्र में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बनाए गए हैं, और हर संभाग मुख्यालय में भी ऐसे अस्पताल बनाए गए हैं। जगदलपुर और अबूझमाड़ क्षेत्र में दो और शैक्षिक केन्द्र बनाने जा रहे हैं, ताकि चार दशक से पिछड़ गए बच्चों को शिक्षा के साधन मिलें। हमारी सरकार की यही चिंता है।
अब यह भी कहा जा रहा है कि नक्सलवाद के खत्म होने के बाद जंगल चले जाएंगे और उद्योगपति आ जाएंगे। विकास और पर्यावरण के बीच की इस चुनौती तथा राजनीतिक नारेबाजी को आप कैसे देखते हैं?
यह कांग्रेस द्वारा अपनी कमजोरी छिपाने के लिए बनाया गया नैरेटिव है कि भाजपा इसलिए नक्सलवाद खत्म कर रही है ताकि उद्योगपतियों को बैठाया जा सके। इसमें कोई सचाई नहीं है। इन्होंने 5 साल तक नक्सलवाद के खिलाफ बिल्कुल लड़ाई नहीं लड़ी और अब अपनी कमजोरी छिपाने के लिए ऐसा विमर्श बना रहे हैं। जबकि हम उस क्षेत्र में पर्यटन बढ़ाने वाले हैं, कृषि को बढ़ाने वाले हैं, और सैकड़ों तरह के वन उत्पादों का मूल्य संवर्धन करने वाले हैं। पशुपालन और मत्स्यपालन को बढ़ाने वाले हैं। उनका आरोप निराधार और असत्य है।
दो वर्ष के अनुभव और आपके साथ जनजातीय समाज के गहरे जुड़ाव को देखते हुए अगर हम आगामी 10 वर्ष की बात करें, तो भविष्य का छत्तीसगढ़ कैसा होगा?
छत्तीसगढ़ को भगवान ने बड़ा समृद्ध बनाया है। यह खनिज संपदा से भरपूर है, करीब 19-20 प्रतिशत लौह अयस्क है, उतना ही कोयला है, यहां हीरा, सोना, लिथियम और बॉक्साइट जैसे खनिज हैं। राज्य का 44 प्रतिशत भूभाग वनों से आच्छादित है और सैकड़ों तरह के जंगली उत्पाद हैं। यहां की धरती और लोग दोनों बहुत अच्छे हैं। देश में कहा जाता है कि ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’। प्रधानमंत्री जी का संकल्प है कि 2047 तक भारत को विकसित भारत के रूप में खड़ा करना है, इसलिए हमने भी 2047 विकसित छत्तीसगढ़ का ‘विजन डॉक्यूमेंट’ बनाया है। हम सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी को आने वाले वर्षों में दोगुना करके 2047 तक 75 लाख करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। नई औद्योगिक नीति लाई गई है, जिसके कारण डेढ़ साल में करीब 8 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिले हैं और कई जगह धरातल पर काम शुरू भी हो गया है। रोजगार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। दो वर्षों में विभिन्न विभागों में 20,000 से ज्यादा नौकरियां दी गई हैं, रिक्तियां लगातार निकल रही हैं, और हम जानते हैं कि सबको सरकारी नौकरी नहीं दे सकते। इसलिए नई औद्योगिक नीति और उद्योगों के माध्यम से हमारे बच्चों को रोजगार देने का काम भी करेंगे। आने वाले समय में एक विकसित छत्तीसगढ़ खड़ा करना ही हमारा एक मात्र उद्देश्य है।

















