परम आदरणीय बलबीर पुंज जी से मेरा परिचय अयोध्या आंदोलन के दौरान हुआ। मैंने यह देखा कि इतनी ज्यादा क्लैरिटी, इतनी ज्यादा सारी चीजों का ज्ञान शायद ही किसी और में था। धीरे-धीरे मेरा और उनका संबंध बढ़ता गया और वास्तविकता यह है कि वह मेरे लिए बड़े भाई, गाइड और एक बिल्कुल जिसे कहते हैं कि ‘प्रणेता’ के रूप में आगे आए।
पिछले 30 वर्षों से लगभग मैं उनसे बराबर संपर्क में न केवल रहा, बल्कि अक्सर बातचीत में कभी वह मुझसे कहते थे कि ‘इस विषय पर आप लिखिए’ और कभी मैं उनसे कहता था कि ‘इस विषय पर वह लिखें’। मेरा उनका संबंध एक भाई, एक गुरु और एक गाइड की तरह था। आज मैं अपने आप को अनाथ सा समझता हूं।
हमेशा पूरे साक्ष्यों के साथ बातें रखीं
लेकिन यह भी बता दूं -आप उसे राइट विंग कहिए या जो भी कहना चाहें-अपनी विचारधारा में बलबीर पुंज उन दो-तीन व्यक्तियों में से हैं, जिन्होंने बेहद स्पष्टता के साथ और पूरे साक्ष्यों के साथ अपनी बातें रखी हैं। शायद ही कभी किसी को उनके लेखों में किए गए उद्धरणों का, उनके द्वारा कही गई बातों का एक बार भी साहस हुआ हो कि वह उन्हें काट सके। उनका गहन अध्ययन चाहे वह देश के अंदर की समस्याओं को लेकर हो या विश्व की समस्याओं को लेकर, बिल्कुल अद्वितीय था। जब भी वह कभी बात उठाते थे-देश में तमाम तरह की जातीय समस्याएं, संकीर्णता और तरह-तरह के कम्युनलिज्म के मुद्दे-उन्होंने हमेशा लिखा। कभी कोई एक भी लाइन में जवाब नहीं दे सका।
जवाब कैसे देते? बलबीर पुंज तो पूरे तथ्यों के साथ लिखते थे। और जब तथ्यों के साथ लिखने वाला व्यक्ति आपके पास हो, तो लफ्फाजी नहीं चल सकती।
तथ्य हमेशा उनके साथ रहे
मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि जिस भी विषय पर बलबीर पुंज जी लिखते थे-चाहे वैश्विक समस्याएं हों, कम्युनलिज्म हो या जातीय समस्याएं-उन्होंने जब भी लिखा, न केवल खुलकर लिखा बल्कि अपनी सभी बातों को तथ्यों के साथ स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। स्वीकार करने के लिए इसलिए बाध्य किया क्योंकि तथ्य हमेशा उनके साथ रहते थे।
श्री बलबीर पुंज का क्षेत्र था विस्तृत
आज उनके जाने के बाद न केवल मैं बहुत व्यथित हूं, वह इतना बड़ा खाली स्थान छोड़कर गए हैं, जिसकी पूर्ति करना असंभव है। बलबीर पुंज का इतना बड़ा और इतना विस्तृत क्षेत्र था बातचीत का, लेखों का, कि उसे 10-20 लोग मिलकर भी पूरा नहीं कर पाएंगे। बलबीर पुंज जी के बारे में मैं निश्चित तौर पर बहुत आगे की बात करूंगा। लेकिन आज बस इतना ही।
















