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ऑपरेशन फ्यूरी: रणनीति, विरोधाभास और शांति का भ्रम

समझौते की जल्दबाजी के पीछे वैश्विक आर्थिक दबाव भी है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी उथल-पुथल मच गई है।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Apr 17, 2026, 09:13 pm IST
inमत अभिमत
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

  • न्यूयार्क से सुबोध मिश्रा

संयुक्त राज्य अमेरिका ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के नेतृत्व में ईरान के मजहबी शासन के खिलाफ कथित रूप से “ऑपरेशन फ्यूरी” शुरू किया। इस सैन्य अभियान के दो प्रमुख उद्देश्य बताए गए-पहला, ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना, जो खुफिया रिपोर्टों के अनुसार कुछ ही दिनों में संभव था; और दूसरा, उस शासन को कमजोर या समाप्त करना, जिसने पिछले चार दशकों से उदार आवाजों, असहमति जताने वालों और विशेष रूप से महिलाओं को कठोर, मध्ययुगीन सामाजिक व्यवस्था के तहत दबाया है।

कूटनीतिक मोड़

हाल के घटनाक्रमों से संकेत मिलते हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता होने की संभावना बन रही है। खबरों के अनुसार, ईरान अपने हथियार-स्तरीय संवर्धित यूरेनियम को सौंपने और भविष्य में परमाणु हथियार कार्यक्रम को आगे न बढ़ाने पर सहमत हो सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस समझौते को अंतिम रूप देने के लिए इस्लामाबाद जाने की भी संभावना जताई है।

पहली नजर में यह एक बड़ी कूटनीतिक सफलता लगती है, जो क्षेत्रीय तनाव कम कर सकती है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के माध्यम से तेल आपूर्ति को सामान्य कर सकती है और वैश्विक ऊर्जा संकट को कम कर सकती है।

IAEA की चेतावनी: “समझौते का भ्रम”

लेकिन इस आशावाद पर Rafael Grossi, जो इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के प्रमुख हैं, ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि किसी समझौते में स्पष्ट और सख्त निरीक्षण व्यवस्था नहीं है, तो वह केवल “भ्रम” साबित होगा।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम व्यापक और जटिल है। उसकी निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की निरंतर और निर्बाध उपस्थिति आवश्यक होगी। इसके बिना किसी भी समझौते की विश्वसनीयता संदिग्ध रहेगी।

तत्काल आवश्यकता बनाम दीर्घकालिक रणनीति

समझौते की जल्दबाजी के पीछे वैश्विक आर्थिक दबाव भी है। होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी उथल-पुथल मच गई है।

लेकिन यही जल्दबाजी एक रणनीतिक गलती भी बन सकती है। यदि समझौता केवल तात्कालिक राहत के लिए किया गया, तो वह भविष्य में बड़े खतरे को जन्म दे सकता है।

मूल विरोधाभास

इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा विरोधाभास अमेरिकी नीति में दिखाई देता है। सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान सरकार की अपने ही नागरिकों पर दमनकारी नीतियों की आलोचना की थी और उसे रोकने की अपील की थी। इस प्रकार, सैन्य कार्रवाई को नैतिक आधार पर भी उचित ठहराया गया था। लेकिन अब उसी सरकार के साथ बातचीत करना उसकी वैधता को स्वीकार करने जैसा प्रतीत होता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका अपने मूल सिद्धांतों से पीछे हट रहा है?

विराम या समझौता?

यदि बिना ठोस सुरक्षा उपायों के समझौता होता है, तो यह केवल अस्थायी शांति लाएगा, लेकिन खतरा बना रहेगा कि ईरान भविष्य में फिर से अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू कर सकता है।

इस परिप्रेक्ष्य में यह स्पष्ट नहीं है कि यह एक रणनीतिक जीत है या केवल एक अस्थायी विराम। अंततः सवाल यही है कि क्या अमेरिका ने ईरान को पीछे हटने पर मजबूर किया है, या फिर स्थिरता की तलाश में उसने महत्वपूर्ण रणनीतिक जमीन खो दी है?

 

Topics: अमेरिकाडोनाल्ड ट्रंपईरान परमाणु कार्यक्रमईरान अमेरिका संघर्षऑपरेशन फ्यूरी
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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