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पंजाब सरकार का बेअदबी कानून, उद्देश्य समस्या का समाधान या पिण्ड छुड़ाना ?

पंजाब विधानसभा ने ‘जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम 2026’ सर्वसम्मति से पास कर दिया। जानिए नए बेअदबी कानून की सजाएं, संवैधानिक चुनौतियां, पुराने मामलों पर असर और राजनीतिक मंशा।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Apr 16, 2026, 12:23 pm IST
in पंजाब
Bhagwant mann

भगवंत मान

गत सोमवार को पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र में ढाई घंटे की बहस के बाद ‘जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम 2026’ सर्वसम्मति से पारित हो गया। इस कानून के तहत सामान्य उल्लंघन पर अधिकतम 5 साल कैद, 10 लाख रुपये तक जुर्माने, बेअदबी करने पर 7 साल से 20 साल तक कैद और 2 लाख से 10 लाख रुपये तक जुर्माने, साजिश (शांति भंग के लिए) के लिए आजीवन कारावास, 5 लाख से 25 लाख रुपये तक जुर्माने और अपराध के प्रयास के लिए 3 से 5 साल कैद और 1 लाख से 3 लाख रुपये जुर्माने की व्यवस्था की गई है।

सभी अपराध गैर-जमानती और संज्ञेय होंगे। इनकी सुनवाई सीधे जिला सत्र न्यायालय में होगी। इस कानून को लेकर जितनी विसंगतियां दिख रही हैं उससे सवाल उठना स्वभाविक है कि इसका उद्देश्य समस्या का समाधान है या समस्या से पिण्ड छुड़ाते हुए नाखून कटवा कर शहीद कहलवाना है?

पहले भी दो बार हो चुके हैं प्रयास

पंजाब सरकार ने पहली बार धर्म के अपमान के कृत्यों के लिए कड़ी सजा का विधेयक पेश नहीं किया है। 2016 में, तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने भारतीय दण्ड संहिता (पंजाब संशोधन) विधेयक, 2016 और दंड प्रक्रिया संहिता (पंजाब संशोधन) विधेयक, 2016 पेश किए थे, जिनमें गुरु ग्रंथ साहिब के अपमान के कृत्यों के लिए आजीवन कारावास की सिफारिश की गई थी। केंद्र ने इन विधेयकों को यह कहते हुए लौटा दिया था कि संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को देखते हुए सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। 2018 में, अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने फिर से दोनों विधेयकों को पारित किया, लेकिन उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई।

वर्तमान कानून के रास्ते में रुकावटें

सरकार को बहुमत और विपक्ष द्वारा सहयोग करने के बाद पंजाब सरकार का नया विधेयक सर्वसम्मति से पास तो हो गया पर अब आगे जो होगा वह ज्यादा मुश्किल है और काफी अनिश्चित भी है। मुख्यमंत्री भगवंत मान का दावा है कि जागृत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) बिल, 2026 का महत्व है। यह संकेत देता है कि अब श्री गुरु ग्रंथ साहिब, जो दुनिया भर के सिखों के लिए गुरु का जीवित रूप है, के अपमान को साधारण अपराध की तरह नहीं देखा जाएगा। यह पिछले दस साल से चल रहे लोगों के दर्द और गुस्से का जवाब भी है, जिसे अब तक सही तरीके से नहीं संभाला गया था, लेकिन मान लेना ही न्याय नहीं है। संकेत देना फैसला नहीं होता। कानून पास करने से वह काम पूरा नहीं हो जाता जो पंजाब अब तक नहीं कर पाया है, यानी दोषियों को सजा दिलाना।

नए कानून में पेचीदगियां

बिल विधानसभा से पास हो चुका है, लेकिन अभी कानून नहीं बना है। राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं। वह इसे मंजूरी दे सकते हैं, दोबारा विचार के लिए वापस भेज सकते हैं, या राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं। अगर राष्ट्रपति के पास भेजा गया तो अनुच्छेद 254 (2) के तहत इसे ज्यादा संवैधानिक सुरक्षा मिल सकती है, लेकिन इसमें देरी, अनिश्चितता और पहले के कानूनों की तरह राजनीतिक अटकाव का खतरा रहेगा। लेकिन सरकार को लोगों को साफ-साफ बताना चाहिए कि मंजूरी मिलने के बाद भी यह कानून सिर्फ पंजाब में लागू होगा। यह चंडीगढ़ में लागू नहीं होगा, जो पंजाब की राजधानी है लेकिन केंद्र शासित प्रदेश है। वहां ऐसे मामलों पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) ही लागू होगी। इस समस्या को राज्य सरकार नहीं सुलझा सकती। इसे सिर्फ संसद ही बदल सकती है।

पुराने मामलों पर लागू नहीं होगा कानून

संविधान का अनुच्छेद 20 (1) कहता है कि किसी भी कानून को पीछे की तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती जो अपराध के समय मौजूद नहीं था या उस समय से ज्यादा सख्त सजा नहीं दी जा सकती।  यह कोई छोटी बात नहीं, बल्कि एक मूल संवैधानिक अधिकार है। 2015 में पंजाब में हुए बरगाड़ी बेअदबी मामलों पर यह नया कानून लागू नहीं होगा। नए कानून के तहत बढ़ी हुई सजा सिर्फ उन मामलों में लागू होगी जो इसके लागू होने के बाद होंगे।  लेकिन पंजाब में जानक्रोष तो पिछले एक दशक से हो रहे बेअदबी के मामलों को लेकर है। सरकार पुराने मामलों को कैसे निपटेगी?

संवैधानिक और केंद्र-राज्य टकराव

भारत के संविधान के अनुसार ‘फौजदारी कानून’ समवर्ती सूची का विषय है। इसका अर्थ है कि इस पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। यदि पंजाब का यह नया कानून केंद्र के ‘भारतीय न्याय संहिता’ के प्रावधानों से टकराता है तो संवैधानिक पेच फंस सकता है। ऐसी स्थिति में राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास भेज सकते हैं जिससे इसकी मंजूरी में महीनों या सालों की देरी हो सकती है।

समानता के अधिकार पर चुनौती

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 ‘कानून के समक्ष समानता’ की बात करता है। चूंकि यह नया विधेयक विशेष रूप से केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर केंद्रित है और अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों को इसमें शामिल नहीं किया गया है (जैसा कि 2025 के पिछले बिल में था) तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। तर्क यह दिया जा सकता है कि एक ही तरह के अपराध (धार्मिक ग्रंथ की बेअदबी) के लिए अलग-अलग धर्मों के मामले में सजा के अलग-अलग प्रावधान क्यों हैं?

जांच और सबूतों का अभाव

बेअदबी के मामलों में अक्सर सबसे बड़ी समस्या सबूतों की होती है। कई बार ऐसी घटनाएं सीसीटीवी की पहुंच से दूर या सुनसान जगहों पर होती हैं. केवल कानून सख्त कर देने से दोषसिद्धि नहीं बढ़ेगी। जब तक पुलिस की जांच प्रणाली और फोरेंसिक साक्ष्यों को आधुनिक नहीं बनाया जाता, तब तक उम्रकैद तक पहुंचना कानूनी रूप से कठिन होगा।

गैर-जमानती प्रावधान और मानवाधिकार

विधेयक में जमानत न मिलने का प्रावधान किया गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में इस प्रावधान पर बहस हो सकती है. भारत में ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’, ऐसे में पूरी तरह से जमानत पर रोक लगाना मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के नजरिए से समीक्षा का विषय बन सकता है।

राजनीतिक और सांप्रदायिक संवेदनशीलता

कानून का दुरुपयोग होने की आशंका भी एक बड़ी चुनौती है। यदि जांच एजेंसियां निष्पक्षता से काम नहीं करतीं तो इस सख्त कानून का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिशोध के लिए भी किया जा सकता है। इसके अलावा, जुर्माने की भारी राशि (25 लाख रुपये) की वसूली करना भी एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी, खासकर उन मामलों में जहां दोषी आर्थिक रूप से सक्षम न हो।

धार्मिक समानता का क्या होगा ?

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बेअदबी के नये कानून को लेकर कहा है कि यह विधेयक अभी केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर ही लागू होगा। गैर सिखों यानी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, आदि के पवित्र ग्रंथों और धार्मिक स्थलों से छेड़छाड़ पर इस विधेयक के तहत फिलहाल कोई सजा का प्रावधान नहीं है। पंजाब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी का मामला धार्मिक दृष्टि से तो अति संवेदनशील है ही लेकिन राजनीतिक दृष्टि से भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। अतीत में हुए बेअदबी के मामलों के कारण तत्कालीन सरकारों की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था जिसके कारण उनको राजनीतिक नुकसान हुआ और कुछ सत्ता से बाहर हो गईं। विधानसभा में बिल का सर्वसम्मति से पारित होने के पीछे भी सभी दलों की राजनीतिक लाभ-हानि ही है।

मुख्यमंत्री मान ने स्पष्ट किया है कि इस संशोधन विधेयक के लिए राज्पयाल की मंजूरी की जरूरत नहीं लेकिन व्यवहारिक होकर सोचें तो इस कानून को लागू करना कानूनी दृष्टि से मुश्किल ही होगा। क्योंकि इसकी धाराएं केंद्रीय कानून के साथ मेल नहीं खातीं। दूसरा एक धर्मनिरपेक्ष देश में एक जाति विशेष की धार्मिक भावनाओं को आधार बनाकर अलग कानून बनाना संवैधानिक दृष्टि से भी अनुचित ही है।

केंद्र व राज्य में टकराव

हम यह मानकर चलते हुए कि बेअदबी कानून 2026 पंजाब तक ही सीमित है जो मुख्यमंत्री मान स्वयं कह भी रहे हैं तो इसका अर्थ यह हुआ कि चंडीगढ़ सहित देश के किसी अन्य जगह कोई बेअदबी की घटना घटती है तो वहां इस कानून के तहत नहीं बल्कि केंद्र द्वारा बनाये गए कानून के तहत ही सजा मिलेगी। बेअदबी का कोई मामला अगर पंजाब में होता है तो न्यायालय भी केंद्र के कानून का बाध्य होगा। प्रदेश और केंद्र के कानून में अगर टकराव है तो उस स्थिति में भी केंद्र का कानून ही लागू होगा।

मंदिरों में स्थापित प्रतिमाओं में भी प्राण प्रतिष्ठा होती है

राज्य सरकार का दावा है कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जीवित गुरु का दर्जा रखते हैं और इसी आधार पर इस अधिनियम में केवल इसी ग्रंथ को रखा गया है। जो बात पंजाब सरकार के ध्यान में शायद नहीं आई कि मंदिरों में स्थापित मूर्तियां भी प्राणप्रतिष्ठित होती हैं, उन्हें भी देवी-देवताओं के स्वरूप के रूप में देखा जाता है और पूजा जाता है, भोग व आरती के पीछे भी उपरोक्त भाव ही होता है। विभिन्न समुदायों को अपने-अपने ग्रंथों में जो आस्था है उसे हल्के में लेकर पंजाब सरकार एक बड़ी भूल कर रही है। दूसरी ओर बाबरी मस्जिद व राम मंदिर केस में सर्वोच्च न्यायालय यह व्यवस्था दे चुकी है कि मंदिर में स्थापित विग्रह जीवंत होने के नाते मंदिरों के स्वामी हैं। अगर किसी धर्मग्रंथ के जीवंत होने पर कानून लाया जाता है तो उसमें विग्रह को शामिल नहीं किया जाना चाहिए था?

क्या है धरातल की स्थिति

धरातल की स्थिति यह है कि पंजाब सरकार नये कानून को शायद लागू न करा पाये क्योंकि कई कानूनी व संवैधानिक बाधाएं दिखाई दे रही हैं, लेकिन इस कानून को लाते समय जिस तरह दूसरे धर्म के ग्रंथों की अनदेखी करने के कारण उनमें आस्था रखने वाले लोगों की भावनाओं को जो ठेस पहुंची है यह बात आम आदमी पार्टी को 2027 के विधानसभा चुनावों में घातक साबित होगी। बेहतर यही है कि धर्म जैसे अति भावनात्मक व संवेदनशील मुद्दे को लेकर राजनीति न की जाए।

Topics: Punjab Legislative Assembly Special SessionPunishment for Sacrilege of Guru Granth Sahibजागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार संशोधन अधिनियम 2026पंजाब बेअदबी कानून 2026गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार बिलपंजाब विधानसभा विशेष सत्रगुरु ग्रंथ साहिब बेअदबी सजाJagat Jot Sri Guru Granth Sahib Sataar Amendment Act-2026Punjab Sacrilege LawGuru Granth Sahib Sataar Bill
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