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बचपन छीन रहा है स्मार्टफोन, 12 साल से कम उम्र में फोन मिलना बना रहा बच्चों को अवसाद का शिकार

डिजिटल युग में हर घर में स्मार्टफोन और डिजिटल गैजेट्स ने जगह बना ली है। इस तकनीक ने जहां दूरियों को कम किया है, वहीं हमारे बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर एक गंभीर संकट भी खड़ा कर दिया है।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता
Apr 15, 2026, 03:55 pm IST
in भारत, सोशल मीडिया

आज के डिजिटल युग में हर घर में स्मार्टफोन और डिजिटल गैजेट्स ने जगह बना ली है। इस तकनीक ने जहां दूरियों को कम किया है, वहीं हमारे बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर एक गंभीर संकट भी खड़ा कर दिया है। हाल ही में ‘द लांसेट’ ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसने माता-पिता और नीति-निर्धारकों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक दुनिया भर के एक अरब से अधिक किशोर अवसाद और मोटापे जैसे खतरों के साये में होंगे।

दरअसल, ‘लांसेट कमीशन ऑन एडोलसेंट हेल्थ’ नाम की रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि बच्चों को स्मार्टफोन देने की उम्र उनके मानसिक स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करती है। इसे यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और मेलबर्न यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने तैयार किया है।

अध्ययन में पता चले चौंकाने वाले नतीजे

इस अध्यन में पता चला कि जिन बच्चों को 12 वर्ष की आयु से पहले ही अपना खुद का स्मार्टफोन मिल गया, उनमें अवसाद (डिप्रेशन) और चिंता (एनजायटी) के लक्षण उन बच्चों की तुलना में कहीं अधिक पाए गए, जिन्हें फोन देर से मिला। किशोरावस्था एक बेहद संवेदनशील समय होता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक करोड़ों युवा अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और ‘स्वस्थ वर्ष’ केवल मानसिक विकारों के कारण खो सकते हैं।

स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की नींद की गुणवत्ता और समय दोनों में भारी गिरावट आई है, जो उनके दिमागी विकास को बाधित कर रहा है।

2030 तक 46 करोड़ युवा होंगे मोटापे का शिकार

इस रिसर्च में पता चला कि तकनीक केवल मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक रूप से भी किशोरों को खोखला कर रही है। शारीरिक गतिविधियों में कमी और स्क्रीन पर घंटों बिताने का परिणाम भविष्य में ‘मोटापे की महामारी’ के रूप में देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक करीब 46 करोड़ युवा मोटापे की चपेट में होंगे। यही मोटापा आगे चलकर युवाओं में डायबिटीज और हृदय रोगों का प्रमुख कारण बनेगा।

साइबर बुलिंग का खतरा

आज के दौर में इंटरनेट केवल सूचना का स्रोत नहीं बल्कि शोषण का केंद्र भी बन गया है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग के जरिए बच्चों को परेशान किया जाना (साइबर बुलिंग) उन्हें शर्मिंदगी, भय और आत्महत्या जैसे आत्मघाती विचारों की ओर धकेल रहा है। 10 से 24 वर्ष के आयु वर्ग में आज भी मृत्यु का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा में चूक और दुर्घटनाएं हैं, जो अक्सर लापरवाही या तकनीकी भटकाव के कारण होती हैं।

कैसे पहचानें और कैसे बचाएं?

विशेषज्ञों का कहना है कि इन समस्याओं को समय रहते रोका जा सकता है। इसके लिए माता-पिता को कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे और कुछ प्रारंभिक लक्ष्णों पर ध्यान देना होगा जैसे:

  • बच्चे का अचानक गुमसुम या चिड़चिड़ा हो जाना।
  • खान-पान की आदतों में बदलाव और नींद की कमी।
  • शारीरिक गतिविधियों या दोस्तों से मिलने में रुचि खो देना।

बचाव के प्रभावी उपाय

1. पहला उपाय है स्क्रीन टाइम सीमित करना। बच्चों के लिए फोन के इस्तेमाल का समय निश्चित करें और उन्हें आउटडोर गेम्स यानी बाहर खेलने जाने वाले गेम्स के लिए प्रोत्साहित करें।

2. दूसरा तरीका है बच्चों के साथ संवाद करना। अपने बच्चों से नियमित बात करें। उन्हें अहसास दिलाएं कि वे अपनी ऑनलाइन समस्याओं और डर के बारे में आपसे खुलकर बात कर सकते हैं।

3. तीसरा उपाय है डिजिटल साक्षरता। बच्चों को साइबर बुलिंग के बारे में शिक्षित करें और उन्हें ‘प्राइवेसी’ की अहमियत समझाएं।

यह रिपोर्ट हम सभी के लिए एक अंतिम चेतावनी है। अगर हमने आज अपने बच्चों की जीवनशैली और उनके डिजिटल व्यवहार पर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाली पीढ़ी मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद कमजोर होगी। इसलिए समय रहते चेत जाने में ही समझदारी है।

Topics: Lancet Report 2030स्क्रीन टाइम का प्रभावTeen DepressionObesity CrisisScreen Time AwarenessDigital ParentingMental Wellbeingस्मार्टफोन की लतमानसिक विकारडिजिटल बचपनChild Mental Healthलांसेट रिपोर्टCyber Bullyingमोटापे की महामारीSmartphone Addictionनींद की कमी
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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