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हिसाब पर हंगामा

भारत सरकार चाहती है कि विदेश से पैसा लेने वाले गैर-सरकारी संगठन अपने खर्च का हिसाब दें और अपना काम निडरता से करें। इसके लिए सरकार ने एफसीआरए कानून-2010 में संशोधन के लिए लोकसभा में एक विधेयक लाया गया है। इतनी-सी बात पर कुछ संगठन और विपक्षी दल चिल्लाने लगे हैं, सीएए और एनआरसी की तरह झूठ फैला रहे हैं

Written byअरुण कुमार सिंहअरुण कुमार सिंह
Apr 15, 2026, 12:48 pm IST
inझारखण्‍ड

इस समय देश में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में संशोधन के लिए लोकसभा में प्रस्तुत विधेयक पर राजनीति गर्म है। सरकार ने एफसीआरए कानून-2010 में संशोधन के लिए यह विधेयक लाया है, लेकिन इस विधेयक को अल्पसंख्यक, विशेषकर ईसाइयों का विरोधी बताने का प्रयास किया जा रहा है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का मानना है कि सरकार विदेश से आने वाले पैसे पर कब्जा करना चाहती है। इस मामले में केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन राहुल गांधी से एक कदम आगे जाकर कहते हैं, “यह विधेयक अल्पसंख्यकों में डर फैलाने वाला है।” वहीं केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरन रिजीजू ने कहा है, “विपक्षी दल राजनीतिक लाभ के लिए इस विधेयक के संबंध में गलत जानकारी प्रचारित कर रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा है, “यदि विदेश से आने वाले धन का उपयोग जन कल्याण के अपने निर्धारित उद्देश्य के लिए किया जाता है तो चिंता की कोई बात नहीं है, लेकिन उसका दुरुपयोग अवैध गतिविधियों तथा राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध किया जाता है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”

प्रश्न है कि इस विधेयक का विरोध करने वाले कौन लोग हैं! इसका उत्तर अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह के विचारों में मिलता है। वे कहते हैं, ”सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि एफसीआरए में संशोधन क्यों किया जा रहा है। कुछ गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) समाज सेवा के नाम पर विदेश से चंदा लेते हैं और उससे भारत में गलत काम करते हैं। कोई कन्वर्जन कराने वालों की मदद करता है, तो कोई देश-विरोधी तत्वों को आर्थिक रूप से मजबूत करता है। जो लोग इस तरह की देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं, वही इसका विरोध कर रहे हैं।”

कांग्रेस का दोहरा रवैया

शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. निर्मल सिंह सरकार के कदम का समर्थन करते हुए कहते हैं,“सरकार तो केवल इतना ही कह रही है कि आप विदेश से पैसे लें और 85 प्रतिशत खर्च कर उसका हिसाब दें। इसमें किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। हां, जो लोग या संगठन एफसीआरए के जरिए विदेश से मोटी रकम लेकर आरामदायक जिंदगी जी रहे हैं, उन्हें संशोधन से परेशानी होगी। इसलिए ऐसे लोग विरोध कर रहे हैं।”

भारत में ऐसे गैर-सरकारी संगठनों की बहुत बड़ी संख्या है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्र मेें कार्य करने के लिए विदेशी चंदा लेते हैं। ये संगठन अपने को गैर-लाभकारी संस्था बताकर अपना पंजीकरण कराते हैं। इसी आधार पर इन्हें एफसीआर के तहत विदेश से पैसे मिलते हैं। इसके साथ इसमें बड़ी गड़बड़ियां होने लगीं। इसलिए 1976 में पहली बार इस संबंध में कानून बनाया गया। समय के साथ 1976 का कानून उतना प्रभावी नहीं रहा। इसलिए 2010 में सोनिया-मनमोहन सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम बनाया। दुर्भाग्य देखिए आज कांग्रेस अपनी ही सरकार द्वारा बनाए गए इस कानून का विरोध कर रही है। इस कानून का उद्देश्य था देशहित की रक्षा के लिए कुछ व्यक्तियों, संगठनों या कंपनियों द्वारा विदेशी धन की प्राप्ति और उपयोग को विनियमित करना। यह कानून 2011 में लागू हुआ।

कारगर कदम

2010 के कानून में इतने छिद्र थे कि उनका लाभ गैर-सरकारी संगठन जम कर उठाते थे। इसे देखते हुए इस कानून में 2016, 2018 और 2020 में संशोधन हो चुके हैं। अब सरकार चौथी बार इस कानून में संशोधन करने जा रही है। इस कानून के अनुसार विदेशी पैसा प्राप्त करने के लिए एनजीओ को केंद्रीय गृह मंत्रालय में पंजीकरण कराना आवश्यक है। पंजीकरण 5 वर्ष के लिए वैध रहता है। इस कानून के अनुसार चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, समाचार पत्र के संपादक या प्रकाशक, न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी आदि विदेशी अंशदान प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

जानकारों का कहना है कि 2010 के एफसीआरए कानून में कई कमियां थीं। विदेशी पैसे से बनी संपत्तियों का कोई स्पष्ट ढांचा नहीं था। जब किसी संस्था का लाइसेंस रद्द होता था, तब उसके संसाधनों का क्या होगा, इस संबंध में कोई नियम नहीं था। इस कारण कई संगठनों ने इन कमियों का लाभ उठाकर अरबों की संपत्ति खड़ी कर ली है। प्रस्तावित संशोधन में सरकार ने ‘नामित प्राधिकरण’ का प्रावधान कर समस्या का समाधान करने की बात कही है। अब कोई संस्था नियम तोड़ती है, तो उसकी संपत्ति का सही उपयोग सुनिश्चित होगा। भले ही विपक्ष इसे सरकारी नियंत्रण बता रहा हो, लेकिन जानकार मान रहे हैं कि यह देशहित की दिशा में उठाया गया एक कारगर कदम हैै।

Topics: सरकारी नियंत्रणसंशोधन विधेयकराजनीतिक शब्दावलीएफसीआरएविपक्ष का विरोधधर्मांतरणदोहरा रवैयाविदेशी चंदाविवाद और आरोपदेश विरोधी तत्वपैसे का दुरुपयोगएनजीओअल्पसंख्यक डरराजनीतिक लाभकानूनी और तकनीकीअवैध गतिविधियांपाञ्चजन्य विशेष
अरुण कुमार सिंह
अरुण कुमार सिंह
समाचार संपादक, पाञ्चजन्य | अरुण कुमार सिंह लगभग 25 वर्ष से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में साप्ताहिक पाञ्चजन्य के समाचार संपादक हैं। [Read more]
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