रेड कॉरिडोर का खात्मा! अब वैचारिक विषबेल पर निर्णायक प्रहार
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रेड कॉरिडोर का खात्मा! अब वैचारिक विषबेल पर निर्णायक प्रहार

रेड कॉरिडोर में सुरक्षा बलों की बड़ी सफलता, नक्सली घटनाओं में भारी गिरावट। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा— अब असली लड़ाई विचारधारा और शहरी नेटवर्क के खिलाफ। पढ़िए विस्तृत विश्लेषण

Written byअरशद फरीदीअरशद फरीदी — edited by Shivam Dixit
Apr 14, 2026, 10:00 pm IST
in भारत, विश्लेषण

भारत के तथाकथित “रेड कॉरिडोर” के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने सशस्त्र नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ी और निर्णायक जीत हासिल की है। कभी हजारों की संख्या में सक्रिय और दुर्गम इलाकों में जमे नक्सली आज लगभग समाप्ति की कगार पर हैं। उनके ठिकानों पर कब्जा कर लिया गया है और उनके हथियार खामोश हो चुके हैं। इस उपलब्धि की सराहना करते हुए केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि यह लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

केंद्र और राज्य सरकार के तालमेल की भूमिका

केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच मजबूत तालमेल ने इस सफलता में अहम भूमिका निभाई। सुरक्षा, विकास और पुनर्वास को साथ लेकर चलने की नीति ने जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम दिए। यही कारण है कि नक्सली हिंसा में लगातार और ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2010 के उच्च स्तर की तुलना में 2024 तक नक्सली घटनाओं में लगभग 80 प्रतिशत और मौतों में करीब 85 प्रतिशत की कमी आई है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर महज 38 रह गई है। यह उपलब्धि किसी एक पहल का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और सुविचारित रणनीति का प्रतिफल है।

हाल के वर्षों में तेज हुआ सुधार

हाल के वर्षों में यह सुधार और तेज हुआ है। वर्ष 2019 से 2024 के बीच हिंसक घटनाएं 501 से घटकर 374 हो गईं, जो लगभग 25 प्रतिशत की कमी को दर्शाती हैं। इसी अवधि में नागरिकों और सुरक्षाबलों की मौतें 202 से घटकर 150 सालाना रह गईं। इससे स्पष्ट है कि न केवल घटनाओं की संख्या घटी है, बल्कि उनकी तीव्रता भी कम हुई है। सबसे बड़ा बदलाव नक्सलियों के व्यवहार में देखने को मिला है। बड़ी संख्या में उग्रवादी अब हथियार छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौट रहे हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में 290 नक्सली मारे गए, 1,090 गिरफ्तार हुए और 881 ने आत्मसमर्पण किया। वहीं 2025 में (सितंबर तक) 270 मारे गए, 680 गिरफ्तार हुए और 1,225 ने आत्मसमर्पण किया।

विकास के साथ विश्वास की नीति का असर

यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि सरकार की “विकास के साथ विश्वास” की नीति का सीधा असर जमीनी कैडरों पर पड़ा है। अब वे हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल हो रहे हैं।

बस्तर में दिख रहा बड़ा परिवर्तन

छत्तीसगढ़, जो कभी नक्सलवाद का गढ़ माना जाता था, वहां भी उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। बस्तर क्षेत्र में समूह के समूह आत्मसमर्पण कर रहे हैं। दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ (DKAMS) से जुड़े 200 से अधिक कैडरों का एक साथ आत्मसमर्पण इस बदलाव का प्रतीक बन चुका है।

पुनर्वास योजनाओं से नई उम्मीद

सरकार की पुनर्वास योजनाओं ने भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नई उम्मीद जगाई है। आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व उग्रवादी अब “बस्तर कैफे” जैसे उद्यम चला रहे हैं, जबकि कई “बस्तर फाइटर्स” के रूप में सुरक्षा बलों में शामिल होकर समाज की सेवा कर रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि पुनर्वास केवल कागजी नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से सफल रहा है। सुरक्षा बलों ने नक्सली संगठन के शीर्ष नेतृत्व को भी बड़ा नुकसान पहुंचाया है। हाल ही में नमबला केशव राव उर्फ बसवराजू को मार गिराया गया। पिछले चार वर्षों में केंद्रीय समिति के 18 से अधिक सदस्य मारे गए या गिरफ्तार हुए हैं, जिससे संगठन की कमर टूट चुकी है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी में बड़ा विस्तार

सरकार की “क्लियर, होल्ड एंड डेवलप” रणनीति के तहत विकास कार्यों को तेज किया गया। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 8,300 किलोमीटर से अधिक नई सड़कें बनाई गईं, जबकि 2014 से अब तक कुल 14,618 किलोमीटर सड़क निर्माण हुआ है। दूरसंचार क्षेत्र में 7,768 मोबाइल टावर स्थापित कर 4G कनेक्टिविटी पहुंचाई गई। बैंकिंग सेवाओं के विस्तार के लिए 1,007 नई शाखाएं और 937 एटीएम खोले गए। शिक्षा के क्षेत्र में 95 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, 46 आईटीआई और 49 कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए। स्वास्थ्य सेवाओं के तहत 186 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले गए।

सुरक्षा बलों को मिली ऑपरेशनल स्वतंत्रता

सरकार ने सुरक्षा बलों को पूर्ण ऑपरेशनल स्वतंत्रता दी, जिससे त्वरित कार्रवाई संभव हुई। मल्टी-एजेंसी समन्वय, ड्रोन निगरानी और मजबूत खुफिया तंत्र के कारण नक्सली गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हुआ। साथ ही एनआईए और ईडी ने नक्सलियों की फंडिंग और लॉजिस्टिक नेटवर्क पर कड़ा प्रहार किया, जिससे उनके संसाधन कमजोर पड़ गए।

विचारधारा के मोर्चे पर नई चुनौती

हालांकि जमीनी स्तर पर बड़ी सफलता मिल चुकी है, लेकिन असली चुनौती अब उस अदृश्य मोर्चे की है, जहां नक्सलवाद की विचारधारा अब भी जिंदा है—शहरी नेटवर्क, बौद्धिक वर्ग और कुछ संगठनों के भीतर। यह विचारधारा भारतीय लोकतंत्र और संविधान को चुनौती देती है।

भीमा कोरेगांव केस और बढ़ी सख्ती

भीमा कोरेगांव केस ने कथित रूप से कुछ बुद्धिजीवियों और नक्सली तंत्र के बीच संबंधों को उजागर किया। इसके बाद सरकार ने विदेशी फंडिंग और संदिग्ध गतिविधियों पर सख्ती बढ़ा दी है। नक्सलियों ने “जनताना सरकार” और “जन अदालतों” के नाम पर समानांतर शासन व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश की, जहां असहमति रखने वालों को हिंसक तरीके से खत्म किया जाता था। इससे आदिवासी क्षेत्रों में भय और अराजकता का माहौल बना।

मानवाधिकार और हिंसा पर उठते सवाल

यह स्थिति एक अहम सवाल खड़ा करती है— जब वनवासी समुदाय नक्सली हिंसा का शिकार हुआ, तब तथाकथित मानवाधिकार आवाजें कहां थीं? क्या निर्दोष नागरिकों के अधिकार कम महत्वपूर्ण थे? क्या हिंसा को “क्रांति” बताना उचित था?

विचारों की लड़ाई अब सबसे अहम

अब नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से लड़ी जाएगी। शिक्षा, जागरूकता और सही जानकारी के प्रसार के जरिए इस विचारधारा को चुनौती दी जाएगी। विश्वविद्यालयों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सामाजिक संवाद के माध्यम से भ्रामक नैरेटिव का जवाब देना जरूरी है।

सलवा जुडूम का संदर्भ

संसद में चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सलवा जुडूम का भी उल्लेख किया, जो 2005 में नक्सलवाद के खिलाफ एक जनआंदोलन था। हालांकि बाद में कानूनी कारणों से इसे समाप्त करना पड़ा, लेकिन इससे यह स्पष्ट हुआ कि स्थानीय स्तर पर लोगों की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है।

आगे की राह: स्थायी शांति और सुरक्षा

आज भारत एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। सशस्त्र नक्सलवाद पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है, लेकिन उसकी विचारधारा को जड़ से समाप्त करना अभी बाकी है। जागरूकता, कड़े कानून और वैचारिक संघर्ष के जरिए ही देश एक स्थायी, शांतिपूर्ण और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकता है।

Topics: india internal security newsBastar Naxal surrendernaxalism india latest newsamit shah naxal statementred corridor india updatenaxal violence decrease
अरशद फरीदी
अरशद फरीदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं। [Read more]
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