“जनजातीय ज्ञान और तकनीक का मेल ही बदलेगा भारत का भविष्य”- उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन
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“जनजातीय ज्ञान और तकनीक का मेल ही बदलेगा भारत का भविष्य”- उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक यदि पारंपरिक ज्ञान, भाषा और संस्कृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ें, तो वे समाज के सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम बन सकते हैं।

Written byMahak SinghMahak Singh
Apr 12, 2026, 04:34 pm IST
inदिल्ली

नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एक महत्वपूर्ण सम्मेलन में भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने “विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन- भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण” विषय पर अपने विचार साझा किए। यह सम्मेलन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा उत्तर पूर्वी प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग एवं प्रसार केंद्र (NECTAR) और आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल के सहयोग से आयोजित किया गया था।

जनजातीय ज्ञान का महत्व

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक यदि पारंपरिक ज्ञान, भाषा और संस्कृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ें, तो वे समाज के सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन इसी समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ परंपरा और प्रौद्योगिकी एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आए हैं। भारत की जनजातीय विरासत पर प्रकाश डालते हुए सी.पी. राधाकृष्णन ने बताया कि देश में लगभग 1.4 लाख जनजातीय गाँव हैं, जहाँ करीब 9 प्रतिशत आबादी निवास करती है। उन्होंने इन समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को अमूल्य बताया, विशेष रूप से जैव विविधता के संरक्षण और वन संसाधनों के सतत उपयोग में उनकी भूमिका को सराहा। उनके अनुसार, जनजातीय समाज सदियों से भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखे हुए है।

विकास और विरासत साथ-साथ: जनजातीय सशक्तिकरण पर जोर

उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में हरित अर्थव्यवस्था के विकास की अपार संभावनाएँ हैं। साथ ही, उन्होंने जनजातीय समुदायों के पारंपरिक वस्त्र, डिजाइन और रंग संयोजन की कला की प्रशंसा की, जो पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित होती आई है। “विकसित भारत @ 2047” की परिकल्पना का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि इसका मूल मंत्र “विकास भी, विरासत भी” है। उनके अनुसार, आधुनिक विकास और परंपराओं का संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। अपने राजनीतिक जीवन को याद करते हुए उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में लिए गए निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड जैसे राज्यों का गठन शामिल है। उन्होंने जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना को जनजातीय समुदायों के प्रति न्याय और सम्मान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

जनजातीय विकास के लिए सरकार के प्रयास और सम्मान

उपराष्ट्रपति ने झारखंड के उलिहातु में बिरसा मुंडा के जन्मस्थान की अपनी यात्रा का भी उल्लेख किया और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना की। सरकारी पहलों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने “प्रधानमंत्री-जनमान कार्यक्रम” का जिक्र किया, जिसके अंतर्गत हजारों किलोमीटर सड़कों और सैकड़ों पुलों के निर्माण को मंजूरी दी गई है। साथ ही “धरती आभा- जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान” के माध्यम से हजारों जनजातीय गांवों में बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं, जो उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल को उसकी रजत जयंती पर बधाई दी और बताया कि यह संस्थान पिछले 25 वर्षों से उत्तराखंड, उत्तर-पूर्व और लद्दाख के हजारों जनजातीय बच्चों को निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहा है।

इस मौके पर कई महत्वपूर्ण लोग भी मौजूद थे। इनमें दिल्ली के उपराज्यपाल तरणजीत सिंह संधू, अरुणाचल प्रदेश के उप मुख्यमंत्री चौना मीन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव अभय करंदीकर और पूर्व सांसद व आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल के संस्थापक ट्रस्टी तरूण विजय जी भी शामिल थे।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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