मेरे पास बिलकुल समय नहीं है। आजकल व्यस्तता इतनी हो गई है कि व्यक्तिगत कामों के लिए भी समय नहीं मिलता। घर में सब लोग यही कहते हैं कि आप घर में रहते हो या केवल खाने-पीने, सोने के लिए घर आ रहे हो। सुबह जल्दी-जल्दी तैयार होकर निकलना और (सायं नहीं) रात को कितने बजे वापस आएंगे कोई ठिकाना नहीं। जीवन मानो ! एक मशीन की तरह सब चल रहा है।
व्यस्त व्यक्ति ही समय निकाल सकता है
यह सब पढ़ने पर अपने आसपास के किसी व्यक्ति की याद आती होगी। कुछ पाठकों को लगता होगा कि यह तो मानो, मेरा ही वर्णन है।
जिस व्यक्ति के पास बिल्कुल ही समय नहीं है-ऐसे कहता है, उसके लिए अंग्रेजी में एक कहावत है – only busy can save the time – प्राप्त परिस्थिति में वही व्यक्ति समय दे सकता है जो बहुत व्यस्त है। उसे समय का मूल्य पता है। वह उपलब्ध समय में ऐसा नियोजन करता है कि दस कामों मे एक ग्यारहवां काम भी कर सके और अनुभव कहता है वह व्यक्ति सहजरूप में नए काम को न्याय देता है।
संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरूजी एक बार एक वकिल को मिले। उसने कहा कि मेरे पास बिल्कुल समय नहीं है। गुरूजी ने कहा इसलिए आपको मिलने आए हैं कि आप सारे कामों के बीच संघ कार्य के लिए भी थोड़ा समय दें। साथी कार्यकर्ताओं को लगा ये वकील साहब वैसे भी व्यस्त है, तो और समय कहां से निकालेंगे? संघ कार्य समय दिए बीना तो होगा नहीं तो ये कैसे संघ कार्य करेंगे? परंतु कुछ ही समय में वे अच्छे कार्यकर्ता बन गए, क्योंकि उन्हें समय के आयोजन की आदत थी। सारे काम होते हुए भी वे संघ के कार्यकर्ता बन गए।
गुरूजी और व्यस्त वकील का अनुभव
एक दूसरा अनुभव-कुछ दिन पूर्व मैं एक परिवार में मिलने गया था। पति-पत्नी दोनों निवृत्त। परमात्मा की कृपा से दोनों का स्वास्थ्य भी बहुत अच्छा था। बातचीत करने पर पता चला कि उन्हें समस्या है दिन भर का समय कैसे व्यतीत करना? वे हमें पूछ रहे थे-कोई काम है तो बताओ। उपर की दोनों बातें सही हैं। कुछ लोग ऐसे मिलते हैं, जिन्हें बात करने का समय नहीं है। जब देखो काम में व्यस्त और दूसरे ऐसे भी लोग है कि जिनके पास समय ही समय है। हम रहे सामाजिक कार्य से जुडे़ कार्यकर्ता। हमें तो सभी प्रकार के लोग चाहिए। संस्कृत में एक वचन है ‘योजकस्तत्र दुर्लभः।’ योजना करने वाला है तो दोनों प्रकार के व्यक्तियों को हम कार्य के साथ जोड़ सकते हैं। जिसके पास समय है उसकी रूचि, प्रकृत्ति, प्रवृत्ति के अनुसार कार्य के साथ यदि जोड़ते हैं तो हमारे साथ आने वाले को भी कार्य करने का आनंद आएगा और लम्बे समय तक कार्य करने वाला व्यक्ति भी मिलेगा।
कभी-कभी थोड़े अनुभव के पश्चात व्यक्ति अधिक रूचि लेता है। उसकी प्रकृति देखते हुए कार्य में अन्य पहलुओं पर भी काम दे सकते हैं। पहले स्वयं काम करता है और कुछ समय पश्चात अन्यों को कार्य के साथ जोड़ने लगता है। काम करते-करते मानो कोई छोटी-मोटी गलति भी हो गई तो उसमें से सीख कर भविष्य में और अधिक अच्छा और गति के साथ काम करने लगता है। प्रश्न ये है कि हम उससे कैसे काम ले सकते हैं। व्यक्ति के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण उसके अंदर छिपी विशेषताओं का अनुभव करता हैै। काम करते-करते उसके साथ मित्रवत सम्बन्ध बने तो हमारी बात को ध्यान से सुनता है और आवश्यकता पड़ने पर अपने में परिवर्तन करते हुए कार्य को आगे ले जाता है।
संक्षेप में कहें तो व्यक्ति जैसे मिले वैसे साथ में लेना और कार्य के लिए जैसा चाहिए वैसा बनाने के प्रयास करना। प्रत्येक व्यक्ति अपनी कार्यक्षमता एवं कुशलता के आधार पर ही आगे बढ़ता है। हम तो केवल इस प्रक्रिया में निमित्त के रूप में है। अपनी शिक्षा पूर्ण कर एक युवक व्यवसाय करने लगा। कुछ समय के पश्चात उसका विवाह हुआ। उसकी व्यस्तता और अधिक बढ़ गई। अब वह व्यवसाय के साथ-साथ घर के सांसारिक कामों में भी व्यस्त हो गया। जिस समाज के बीच व्यक्ति रहता है कुछ मात्रा में सामाजिक कामों में उसे समय देना होता है। सामाजिक कार्याें से बिलकुल अलिप्त रहना भी सम्भव नहीं। एसे में अब तो इतना व्यस्त दिखता है कि उसे पूरा दिन कम पड़ रहा हो।
एसे किसी व्यक्ति ने भावना में आकर कहा कि विवाह के पूर्व आप मिले होते तो मैं आपके साथ पूर्णकालीन कार्यकर्ता के रूप में ही जुड़ जाता। ये कहना तो सरल है परंतु वास्तविक एसा होता नहीं। उसके पूर्व यदि बात की होती तो ढेर सारे कारण सामने आ जाते। कभी-कभी मन में विचार आता है कि समय देकर काम करने की आयु कौन सी होती है? इसका एक मात्र सरल उत्तर है इसकी कोई आयु नहीं होती। व्यक्ति के मन में कितनी तीव्रता है उस पर निर्भर करता है कि वह कैसे समय देगा। एक कार्यकर्ता अपने आयु की 66वें वर्ष भी पूर्णकालीन कार्यकर्ता के रूप में कार्य में जुड़ गए। उनकी अपनी आयु की मर्यादा में रहकर आगे दो दशक तक उन्होंने अपने छात्रावास पर रहकर वनवासी बालकों को पढ़ाया। अर्थात कोई भी व्यक्ति किसी भी आयु में कार्य के साथ जुड़ सकता है। मन में है तो पूर्णकालीन भी निकल सकता है। अकेले क्या पति-पत्नी दोनों निकल सकते हैं।
गति के साथ काम करने का समय
आज का समय कहता है कि गति के साथ काम करें। ऐसे में अधिक से अधिक व्यक्तियों को काम के साथ जोड़ना भी आवश्यक हो गया है। हम जितने अधिक लोगों को कार्य के साथ जोडे़ेंगे, कार्य उतने गति से आगे बढे़गा। कल्याण आश्रम के कार्य में वन क्षेत्र में रहने वाला हमारा जनजाति समाज, ग्रामीण एवं नगरों में रहने वाले सभी की आवश्यकता है। कोई भी व्यक्ति निकम्मा नहीं है। सभी के पास कोई न कोई गुण तो होता ही है उसके अनुरूप उसे काम से जोड़े तो स्वाभाविक रूप में कार्य बढ़ते जाएगा। ये बात सही है कि बात कहना जितना सरल है उतना काम करते समय सरलता का अनुभव कभी-कभी नहीं होता। कई प्रकार की अड़चने आते रहती है। कभी-कभी तो एसा लगता है कि हमने जो सोचा वैसा नहीं है। काम बहुत ही कठिन है। दूसरे शब्दों में कहे तो काम शुरू करना सरल हो सकता है परंतु सतत करते रहना उतना ही कठिन है।
एक सुविचार कहता है कि कार्य कठिन है इसलिए करने योग्य है। सभी काम केवल सरल होते तो उसमें कौनसा पुरूषार्थ है कि हम कार्य को गति एवं कुशलता के साथ करें। कठिन कार्य जब पूर्णत्व प्राप्त करता है तो करने का आनंद भी कुछ विशेष होता है। हम सभी ने इसका अनुभव भी किया होगा। नागपूर से दूर छोटा नागपूर के वन क्षेत्र में जाकर कठिन परिस्थिति में कैसे कार्य खड़ा होता है इसका उदाहरण कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं ने देखा है-सुना है। वनयोगी बाला साहब देशपाण्डे का आदर्श हमारे सामने है। एक जनजाति गांव का युवक सारे देश का नेतृत्व कर सकता है यह आदरणीय जगदेव राम जी काअनुभव भी देखा है। इसलिए इन आदर्शों ने दिखाए मार्ग पर चलने में ही जीवन की धन्यता है इतनी बात कहते हुए विराम।

















