मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में मंदिर-मस्जिद विवाद पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस मामले में सुनवाई करते हुए इंदौर बेंच में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर तीसरे दिन यानी बुधवार को बहस हुई। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि मस्जिद पक्ष यानी मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी का अपना शपथ-पत्र ही भोजशाला के मंदिर होने के सबूत दे रहा है।
क्या कहा हिन्दू पक्ष ने
कोर्ट में हिंदू पक्ष की दलील थी कि भोजशाला 1034 में बनाई गई थी। उस समय वहां कोई मस्जिद नहीं थी। किताबों के हवाले से बताया गया कि 14वीं सदी से पहले इस जगह पर मस्जिद का कोई अस्तित्व नहीं था। मस्जिद पक्ष के शपथ-पत्र में भी ये किताबें का जिक्र है, जो यही बताती हैं कि भोजशाला पहले से मौजूद थी।
वकील जैन ने आगे कहा कि मंदिर को तोड़कर या उसके सामान से मस्जिद बनाना इस्लामी कानून के खिलाफ है। क्योंकि इस्लाम में किसी मंदिर या पूजा स्थल की चीजों को तोड़कर या इस्तेमाल करके नई इमारत बनाने की इजाजत नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप बदलना प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत भी नहीं हो सकता। ये कानून कहता है कि किसी जगह का धार्मिक चरित्र 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार ही रहेगा।
हिन्दू पक्ष ने पेश किया फोटो
हिंदू पक्ष ने कोर्ट में फोटोग्राफ भी दिखाए। इनमें साफ दिखता है कि जगह मंदिर जैसी है। मस्जिद पक्ष के शपथ-पत्र में इन फोटोग्राफ पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई। जैन ने कहा कि ये दावा सिर्फ आस्था पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सर्वे और तथ्यों पर टिका है। ASI की रिपोर्ट और पुरानी किताबों में भी मंदिर के सबूत मिलते हैं।
उन्होंने ये भी बताया कि आक्रमणकारियों के हमले से मूर्तियां या पूजा प्रभावित हो सकती है, लेकिन प्राण प्रतिष्ठा के बाद देवता का अधिकार खत्म नहीं होता। भोजशाला सरस्वती देवी का मंदिर माना जाता है। पुराने रिकॉर्ड में यहां से मिली मूर्तियों का भी जिक्र है, जिनमें से दो अभी ब्रिटिश म्यूजियम में हैं।
मुस्लिम पक्ष ने खुद ही माना भोजशाला है बहुत पुरानी
मस्जिद पक्ष के शपथ-पत्र में ये बातें खुद लिखी हैं कि भोजशाला बहुत पुरानी है और मस्जिद बाद में बनी। हिंदू पक्ष का कहना है कि इसी से साबित होता है कि मूल संरचना मंदिर की थी। सुनवाई के दौरान जैन ने कहा कि न सिर्फ नमाज पढ़ने से कोई जगह मस्जिद नहीं बन जाती। असली बात ऐतिहासिक और कानूनी सबूतों की है।

















