डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा बार-बार टैरिफ लगाने से परेशान भारत पहले से ही अपने तेल को डाईवर्सिफाई कर रहा है। शायद यही कारण है कि खाड़ी में चल रहे युद्ध का असर भारत पर बहुत अधिक नहीं पड़ा। इसी के तहत भारत ने मार्च में रूस से तेल की खरीदारी 90 प्रतिशत बढ़ा दी है। फरवरी के मुकाबले ये उछाल आया, जबकि कुल तेल आयात लगभग 15 प्रतिशत घट गया है।
क्या हुआ और क्यों?
रिपोर्ट्स के अनुसार, मार्च में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में परेशानी बढ़ गई, जो तेल के लिए बहुत जरूरी रास्ता है। इससे मध्य पूर्व के देशों से तेल और गैस आना मुश्किल हो गया। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। हमें अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत तेल बाहर से लाना पड़ता है। रोजाना करीब 5.8 मिलियन बैरल तेल की खपत होती है।
दिसंबर 2025 और जनवरी-फरवरी 2026 में रूस से तेल की खरीद कम थी। लेकिन मार्च में अमेरिका ने 30 दिन का विशेष छूट दिया। इससे समुद्र में पहले से मौजूद प्रतिबंध वाले रूसी तेल को खरीदने की इजाजत मिल गई। इसी वजह से भारतीय रिफाइनरी ने रूस से तेल उठाना तेज कर दिया। कुल तेल आयात 15 प्रतिशत कम होने के बावजूद रूस से 90 प्रतिशत ज्यादा तेल आया। अफ्रीकी देशों जैसे अंगोला, गैबॉन, घाना और कांगो से भी थोड़ा ज्यादा तेल आया, लेकिन उनकी हिस्सेदारी अभी छोटी ही है।
गैस और एलपीजी पर असर
इस रुकावट से एलपीजी (रसोई गैस) के आयात में 40 प्रतिशत की गिरावट आई। कतर से एलएनजी (तरल प्राकृतिक गैस) की सप्लाई भी 92 प्रतिशत घट गई। कतर एनर्जी ने फोर्स मेज्योर घोषित कर दिया था। इसकी भरपाई अमेरिका, ओमान, अंगोला और नाइजीरिया से ज्यादा एलएनजी लाकर की गई।
एलपीजी की कमी को घरेलू उत्पादन बढ़ाकर और कमर्शियल-इंडस्ट्रियल यूजर्स को थोड़ा कम सप्लाई देकर संभाला गया। ताकि घरों में रसोई गैस 33.2 करोड़ से ज्यादा परिवारों तक बिना रुके पहुंचे।मध्य पूर्व से राहत के उपायसऊदी अरब अपना ईस्ट-वेस्ट (यानबू) पाइपलाइन और यूएई अपना हबशान-फुजैरा पाइपलाइन इस्तेमाल करके कुछ तेल को होर्मुज के बिना भेज रहा है। इससे थोड़ी राहत मिल रही है।

















