यों ही नहीं कहा जाता देसां मै देस हरियाणा, जित दूध-दही का खाणा…इस बाबत देश की सर्वोच्च पंचायत में हरियाणा और राष्ट्रीय गोकुल मिशन की सफलता का नया अध्याय सामाने आया। यह बताता है पशुपालन में क्रांति,दूध उत्पादन और नस्ल सुधार में हरियाणा ने बड़ी छलांग लगाई है। यानी हरियाणा अब पशुपालन जैसी पारंपरिक गतिविधि तक सीमित नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक को अपनाते हुए निरंतर आगे बढ़ रहा है। उसके यह कदम एक मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार बन रहे है। इसकी ताजा तस्वीर तब सामने आई जब केन्द्रीय मंत्री राजीव रंजन लल्लन सिंह ने राज्यसभा में बताया कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत हरियाणा ने स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की है।
कभी धीरे-धीरे घटती स्वदेशी नस्लों की संख्या अब बढ़ते आत्मविश्वास की कहानी सुना रही है। पशुधन जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में स्वदेशी मवेशियों की आबादी 8.12 लाख से बढ़कर 9.49 लाख पहुंची है। और यह केवल आंकड़ों की बढ़ोतरी नहीं, किसानों की बदली सोच और सरकारी योजनाओं की जमीनी पकड़ का संकेत है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत हरियाणा को 113.60 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता मिली है, जिसने इस बदलाव को रफ्तार दी। गांव-गांव तक पहुंच रही कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं ने इस मिशन को और शक्ति दी। अब तक 9.41 लाख कृत्रिम गर्भाधान किये हैं,जिससे करीब 4.7 लाख किसान इससे लाभान्वित हुए । इसका सीधा बेहतर असर नस्ल सुधार और दूध उत्पादन पर पड़ा।

यह सच है कि तकनीक इस क्षेत्र में असली क्रांति लाने में सफल हुई है। लिंग-विभाजित वीर्य तकनीक ने किसानों को अपनी पसंद के अनुसार बेहतर नस्ल तैयार करने का मौका मिला है। पहले जो तकनीक महंगी थी, अब उसकी लागत 800 से घटकर महज 250 रुपये पर आ चुकी है। यकीनन इससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी बेहतर पशुधन तैयार करना संभव हुआ है। इसी दिशा में हिसार में स्थापित आईवीएफ लैब एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। यहां अब तक 535 भ्रूण तैयार किए जा चुके हैं और हजारों भ्रूण प्रत्यारोपण के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली नस्लों का तेजी से विस्तार हो रहा है। खास बात यह है कि इन प्रयासों से पैदा हुए बछड़ों में बड़ी संख्या मादा बछियों की है, जो भविष्य में दूध उत्पादन बढ़ाने का मजबूत आधार बनेंगी।
हरियाणा की पहचान बन चुकी मुर्रा भैंस और हरियाणा नस्ल की गायों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वंश परीक्षण और चयन कार्यक्रम के जरिए उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांड तैयार किए जा रहे हैं, जो पूरे देश में नस्ल सुधार की रीढ़ बन रहे हैं। इन योजनाओं का असर अब सीधे उत्पादन में दिखाई दे रहा है। वर्ष 2014-15 में जहां प्रति पशु प्रतिदिन दूध उत्पादन 7.69 किलोग्राम था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 10.70 किलोग्राम हो गया है। भैंसों की उत्पादकता में भी 42 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। कुल दूध उत्पादन 79 लाख टन से बढ़कर 125.93 लाख टन तक पहुंच गया है। हालांकि इस पूरी तस्वीर में एक सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि तकनीक और योजनाओं का लाभ अभी भी हर किसान तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। कई छोटे पशुपालक अब भी जागरूकता और संसाधनों के अभाव से जूझ रहे हैं। बावजूद इसके यह कहना भी गलत नहीं होगा कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन ने हरियाणा के पशुपालन क्षेत्र को नई दिशा दी है। अगर जागरूकता और क्रियान्वयन की खाई को पाटा जाए, तो यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत स्तंभ बन सकता है।
(राजेश शांडिल्य संपादक विश्व संवाद केंद्र)
















