जहाँ एक ओर प्रभु श्रीराम का जीवन मर्यादा का सर्वोच्च प्रतिमान माना जाता है वहीं दूसरी ओर राम भक्त हनुमान का समूचा जीवन सेवा, त्याग, तप व बलिदान की अनुपम मिसाल है। अमरत्व के वरदान से विभूषित रुद्रांश श्री हनुमान ने त्रेता युग में भगवान श्री राम की सहायता के लिये इस धरा धाम पर अवतार लिया था। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार महावीर हनुमान का जन्म अब से तकरीबन करोड़ 85 लाख 58 हजार 112 वर्ष पहले चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सूर्योदय काल में माता अंजना के गर्भ से हुआ था। इसीलिए सनातनधर्मी हिन्दू धर्मावलम्बी प्रति वर्ष चैत्र माह की पूर्णिमा को महावीर हनुमान का जन्मोत्सव हर्षोल्लास से मनाते हैं।
सेवा, भक्ति व समर्पण की अनुपम मिसाल हैं महावीर हनुमान
रामकथा के आधार स्तम्भ महावीर हनुमान का समूचा जीवन सेवा, भक्ति, समर्पण, त्याग, तप व बलिदान की अनुपम मिसाल है। शक्तिमत्ता के सर्वोच्च प्रतिमान महावीर हनुमान मन से जितने बलशाली है; हृदय से उतने ही निर्मल। पवनपुत्र के जीवन चरित्र में हम सफल जीवन के कई महत्वपूर्ण सूत्र हासिल कर सकते हैं। उनके वीरता, साहस, सेवाभाव, स्वामिभक्ति, विनम्रता, कृतज्ञता, नेतृत्व और निर्णय क्षमता जैसे गुणों को अपने जीवन में हृदयंगम कर हम सफलता के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। हनुमान जी जहां एक ओर अतुलित बलशाली हैं वहीं दूसरी ओर तो विद्वता में भी उनका कोई सानी नहीं है। फिर भी उनके भीतर रंचमात्र भी अहंकार नहीं। जबकि आज के समय में थोड़ी सी शक्ति या बुद्धि हासिल कर व्यक्ति अहंकार से भर जाता है, ऐसे लोगों को हनुमान जी के प्रेरणा लेनी चाहिए।
बाल्यकाल में सूर्य को ग्रास बना लेने वाले महावीर हनुमान श्री राम के समक्ष मात्र सेवक की भूमिका में रहते हैं। सीता हरण के बाद न सिर्फ तमाम बाधाओं से लड़ते हुए हनुमान समुद्र पार कर लंका पहुंचे और अहंकारी रावण का मद चूर किया। जिस स्वर्ण-लंका पर रावण को अभिमान था, हनुमान ने उसका दहन कर दिया। यह रावण के अहंकार का प्रतीकात्मक दहन था। बलवानों में भी महाबलवान महावीर हनुमान ने रावण और मेघनाद को ही नहीं, अपितु भीम के शक्तिमद को भी धूल चटायी थी। हम अपने शरीर व मन की शक्ति का समाज के विकास में किस तरह से नियोजन कर सकते हैं; श्री हनुमान के जीवन चरित से इन प्रश्नों का समाधान सहज ही पाया जा सकता है।
श्रीहनुमान के महाशक्तिशाली होने का रहस्य
क्या आप जानते हैं श्री हनुमान के महाशक्तिशाली होने का रहस्य क्या था ! यह रहस्य हनुमान चालीसा में छिपा हुआ है। “अष्टसिद्धि नवनिधि के दाता, अस वर दीन्ह जानकी माता।” इस दोहे में हनुमान जी की शक्ति मूल रहस्य निहित है। सूर्यदेव से ज्ञान प्राप्त करते हुए हनुमान जी ने आठ सिद्धियां हासिल की थीं। यही आठ सिद्धियां हनुमान जी की शक्ति का मूल स्रोत मानी जाती हैं। इनमें पहली है अणिमा सिद्धि। यह ऐसी सिद्धि है जिससे व्यक्ति अपने आकार में मनचाहा आकर दे सकता है। इसी सिद्धि के बल पर हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धर कर अशोक वाटिका में माता जानकी के सामने प्रकट हुए थे। दूसरी है लघिमा सिद्धि- इसके बल से हनुमान जी सैकड़ों योजन का सागर एक ही छलांग में लांघ कर लंका में प्रवेश करने में सफल हुए थे। तीसरी है गरिमा सिद्धि- इस सिद्धि से शरीर को जितना चाहे भारी बनाया जा सकता है। इसी सिद्धि से हनुमान जी ने अपनी पूंछ को इतना भारी बना दिया था कि भीम जैसा महाबलशाली भी उसे हिला तक नहीं सके। चौथी है प्राप्ति सिद्धि- अपने नाम के अनुसार यह ऐसी सिद्धि है जिससे इच्छा मात्र से मनचाही वस्तु सामने आ जाती है। अपनी इसी सिद्धि के कारण हनुमान जी परम संतोषी कहलाए और उन्होंने भगवान राम के द्वारा दिए मोतियों को भी कंकड़ के समान माना और आजीवन श्रीराम की भक्ति में लीन रहे।
पांचवीं है प्राकाम्य सिद्धि- इस सिद्धि से व्यक्ति जो भी कामना करता है वह तुरन्त पूरी हो जाती है। छठी है महिमा सिद्धि-यह ऐसी सिद्धि है जिसे हासिल करके व्यक्ति अपने व्यक्ति की महत्ता कहीं भी स्थापित कर सकता है। हनुमान जी ने लंका पर चढ़ाई के समय कई बार इस सिद्धि का प्रयोग किया था। सातवीं है-ईशित्व सिद्धि- इस सिद्धि से व्यक्ति में ईश्वरत्व का वास हो जाता है यानी व्यक्ति में ईश्वर की शक्ति आ जाती है और वह पूजनीय हो जाता है। इसी सिद्धि के कारण हनुमान जन-जन के आराध्य व पूज्य बन गये। आठवीं सिद्धि है वशित्व सिद्धि- इस सिद्धि को प्राप्त करके किसी को भी अपने वश में किया जा सकता है। हनुमान जी ने अपनी इस सिद्धि से मन, वचन, कर्म से काम, क्रोध, मद, लोभ लोभ, दंभ, दुर्भाव, द्वेष, आवेश, राग-अनुराग सभी को अपने वश में कर लिया था। इन्हीं सिद्धियों ने हनुमान जी को महावीर बनाया था।
प्रभु श्रीराम ने दिया था हनुमान जी को अमरता का वरदान
कहा जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम तो धर्म की स्थापना करके अपने बैकुण्ठ लोक वापस चले गये। लेकिन भगवान राम ने धर्म की रक्षा के लिए प्रलय काल तक हनुमान को पृथ्वी पर रहने का आग्रह किया और इसके लिए राम ने हनुमान जी को अमरता का वरदान भी दिया। माना जाता है कि इसी वरदान के कारण हनुमान जी आज भी जीवित हैं और भगवान के भक्तों और धर्म की रक्षा में लगे हुए हैं। कहा जाता है कि 16वीं सदी में महान संत कवि गोस्वामी तुलसीदास जी को हनुमान की कृपा से ही श्रीराम के दर्शन प्राप्त हुए थे। किम्वदंती है कि हनुमान जी ने तुलसीदास जी से कहा था कि राम और लक्ष्मण चित्रकूट नियमित आते रहते हैं। मैं वृक्ष पर तोता बनकर बैठा रहूंगा और जब राम और लक्ष्मण आएंगे तो मैं आपको संकेत दे दूंगा। राम और लक्ष्मण जब आये तो तोता रूप धारी हनुमान जी गाने लगे “चित्रकूट के घाट पै, भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।” हनुमान जी के यह वचन सुनते ही गोस्वामी तुलसीदास प्रभु राम और लक्ष्मण को निहारने लगे। इस प्रकार हनुमान जी की ही कृपा से तुलसीदास की प्रभु दर्शन की चिर प्रतीक्षित साध पूरी हो गयी।
चैत्र पूर्णिमा से जुड़े अन्य पौराणिक सन्दर्भ
कहा जाता है कि भगवान राम के वन गमन की शुभ तिथि भी चैत्र पूर्णिमा ही थी। महीने भर चलने वाला वैशाख का स्नान पर्व चैत्र पूर्णिमा से शुरू होता है। चैत्र पूर्णिमा के दिन जहाँ एक ओर उत्तर भारत, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में गंगा स्नान, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन, सत्यनारायण व्रत कथा, हवन-पूजन, सुन्दरकाण्ड व रामचरितमानस के अखंड पाठ, भजन-कीर्तन व भंडारों की धूम दिखायी देती है; वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों में चैत्र पूर्णिमा हिन्दू नववर्ष के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बौद्ध व जैन धर्म में भी चैत्र पूर्णिमा की पावन तिथि की विशिष्ट महत्ता है। बौद्ध व जैन साहित्य के उद्धरणों के अनुसार को निर्वाण प्राप्त करने से पूर्व देवी सुजाता ने चैत्र पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध को खीर खिलायी थी और जैन धर्म के छठे तीर्थंकर पद्मप्रभु ने चैत्र पूर्णिमा के दिन मोक्ष प्राप्त किया था। इस दिन ‘’ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, ‘’ॐ महालक्ष्मी नमः’’ और ‘’ॐ आंजनेय नमः’’ मंत्र का जप विशेष फलदायी माना गया है। इस दिन के संध्या काल चन्द्रमा को अर्घ्य देने की भारी महिमा स्कन्द पुराण में बतायी गयी है। ऐसी मान्यता है कि चंद्र अर्घ्य के बिना चैत्र पूर्णिमा का व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है।

















