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छोड़ा धर्म, गई जाति

सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कहा कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध मत छोड़कर ईसाइयत जैसे अन्य पंथ को अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद लोभ-लालच से कन्वर्जन कराने वालों की गतिविधियां कम होंगी और जो लोग पूर्वजों के धर्म को छोड़कर और कहीं गए हैं, उनकी घरवापसी हो सकती है

Written byआदित्य कश्यपआदित्य कश्यप
Mar 31, 2026, 07:43 pm IST
inभारत, विश्लेषण

गत 24 मार्च को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने एक ऐसे प्रश्न पर निर्णायक और स्पष्ट विधिक स्थिति स्थापित की, जो दशकों से मुकदमेबाजी, राजनीतिक विवाद और कुछ संप्रदायिक एवं निहित स्वार्थी तत्वों के दबाव का विषय रहा है। प्रश्न यह था कि क्या हिंदू धर्म छोड़कर स्वेच्छा से ईसाई बन चुका व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा बनाए रख सकता है और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के संरक्षण का लाभ उठा सकता है! अब न्यायालय ने इस प्रश्न का बहुत ही सटीक उत्तर दे दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह प्रकरण आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के निवासी चिंथाडा आनंद की शिकायत से जुड़ा है। चिंथाड़ा ने दावा किया था कि वह अनुसूचित जाति है। उसने आरोप लगाया कि जनवरी, 2021 में ईसाई पादरी के रूप में रविवार की प्रार्थना सभा से लौटते समय रेड्डी समुदाय के कुछ लोगों ने उस पर हमला किया, जातिसूचक गालियां दीं और धमकियां दीं। इस आधार पर एससी/एसटी अधिनियम के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धाराओं में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गई। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले का निपटारा करते हुए कहा था कि जो व्यक्ति एक दशक से अधिक समय से खुलेआम ईसाई पादरी के रूप में कार्यरत है, वह एससी/एसटी अधिनियम का लाभ नहीं ले सकता। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी अपील को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय के आदेश को पूर्णतः उचित ठहराया।

संवैधानिक ढांचा

न्यायालय ने निर्णय की नींव मूलभूत संवैधानिक प्रावधानों पर रखी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अंतर्गत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करने की शक्ति विशेष रूप से और एकमात्र राष्ट्रपति में निहित है। इस शक्ति के अंतर्गत जारी संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 में एक स्पष्ट और निर्णायक प्रावधान है कि जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध मत से भिन्न कोई पंथ अपनाता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा। न्यायालय ने इस आदेश का विधायी इतिहास भी स्पष्ट किया। जब 1950 में यह आदेश पहली बार जारी हुआ, तो केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों को इसमें सम्मिलित किया गया था। 1956 में सिख पंथ को और 1990 में बौद्ध मत को इसमें जोड़ा गया। दशकों के राजनीतिक दबाव के बावजूद ईसाई मत को कभी सम्मिलित नहीं किया गया और संसद ने ऐसा न करने का निर्णय भी लिया है।

न्यायालय ने ‘अपनाता है’ शब्द की गहन विवेचना की। पंजाबराव बनाम डी.पी. मेशराम (1964), गुंटूर मेडिकल कॉलेज बनाम वाई. मोहन राव (1976), एम. चंद्रा बनाम एम. थंगामुथु (2010) और हाल ही के सी. सेलवरानी (2024) जैसे निर्णयों की श्रृंखला के आधार पर न्यायालय ने निर्धारित किया कि ‘अपनाना’ का अर्थ है किसी पंथ की खुली, सार्वजनिक घोषणा या आचरण। जो व्यक्ति खुलेआम और निरंतर ईसाई पादरी के रूप में कार्य करता हो, रविवार की प्रार्थना सभाएं आयोजित करता हो, एक ईसाई मंडली का नेतृत्व करता हो और ‘पास्टर्स फेलोशिप’ का कोषाध्यक्ष हो, वह अपने उसी आचरण से सार्वजनिक और असंदिग्ध रूप से ईसाई मत को अपनाता है।
न्यायालय ने कहा कि ईसाई मत अपने मूलभूत सिद्धांत के अनुसार जाति की संस्था को मान्यता नहीं देता। भारतीय ईसाइयत में जो भेद हैं, वे सम्प्रदायगत हैं, जातिगत नहीं। ऐसे में कोई व्यक्ति एक साथ यह दावा नहीं कर सकता कि उसे जाति के आधार पर भेदभाव सहना पड़ रहा है, जबकि वह एक ऐसे मत का सक्रिय अनुयायी हो जिसका शास्त्र ही हिंदू सामाजिक व्यवस्था का निषेध करता है।

स्थापित सिद्धांत

इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण अवदान वे आधिकारिक सिद्धांत हैं, जो न्यायालय ने कन्वर्जन के संदर्भ में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की सदस्यता निर्धारित करने के लिए प्रतिपादित किए हैं। ये आगे के लिए बाध्यकारी विधि का निर्माण करते हैं। 1950 के आदेश के खंड 3 में उल्लिखित मत—पंथों से भिन्न किसी भी मत में कन्वर्ट होते ही, जन्म की परवाह किए बिना, कन्वर्जन के क्षण से ही अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल और पूर्णतः समाप्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति कोई भी संवैधानिक लाभ, संरक्षण, आरक्षण या हकदारी, जिसमें एससी/एसटी अधिनियम का संरक्षण भी शामिल है, प्राप्त नहीं कर सकता।

यह निर्णय घरवापसी का दावा करके व्यवस्था का दुरुपयोग करने के प्रयासों पर भी कठोरता से प्रतिबंध लगाता है। कोई व्यक्ति कन्वर्जन के बाद पुनः हिंदू धर्म में वापसी का दावा करे, तो उसे अधिसूचित जाति की मूल सदस्यता का स्पष्ट प्रमाण; परिवर्तित मत के पूर्ण और निःसंदिग्ध परित्याग तथा मूल जाति के रीति-रिवाजों और प्रथाओं को वास्तविक रूप से अपनाने के साथ वास्तविक घरवापसी का विश्वसनीय साक्ष्य देने होंगे। केवल स्वयं की घोषणा पर्याप्त नहीं है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्षों से एक प्रवृत्ति देखी जाती रही है कि कोई व्यक्ति ईसाई मत अपनाता है, मिशनरी संगठनों द्वारा प्रदत्त सामाजिक और भौतिक लाभ उठाता है, और जब संवैधानिक लाभों और आरक्षण की बात आती है तो हिंदू जातिगत पहचान का दावा करने लगता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से इस प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

अनुसूचित जनजातियों के संबंध में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतर रेखांकित किया। 1950 के अनुसूचित जनजाति आदेश में किसी व्यक्ति या समूह को उनके धार्मिक विश्वासों, आस्था या धर्म-परिवर्तन के कारण सामाजिक, आर्थिक या कानूनी अधिकारों से वंचित करने का कोई प्रावधान नहीं है। अतः कन्वर्जन के बाद अनुसूचित जनजाति के दर्जे का निर्धारण महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति जनजातीय पहचान के आवश्यक तत्वों, जैसे रीति-रिवाज, सामाजिक संगठन, सामुदायिक जीवन और जनजाति समुदाय द्वारा स्वीकृत नियमों को बनाए रखता है या नहीं। जहां कन्वर्जन के परिणामस्वरूप समय के साथ जनजातीय जीवनशैली से पूर्ण विच्छेद हो गया हो, वहां जनजातीय दर्जा समाप्त हो सकता है।

अनुसूचित समाज के अधिकारों
पर डाका नहीं डालने देंगे : विहिप

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि यह निर्णय संविधान की मूल भावना, सामाजिक न्याय और विधि के शासन को सुदृढ़ करने वाला है। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कन्वर्जन के पश्चात कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति (एससी) की संवैधानिक श्रेणी में नहीं आता और ऐसे में उसे एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की भावना के भी अनुरूप है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध मत के अनुयायी ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आते हैं।

उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने वाला है, जिनमें कुछ लोग कन्वर्जन के बाद भी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर संवैधानिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इस निर्णय से कन्वर्जन माफिया पर गहरी चोट लगी है। ईसाई व मुस्लिम नेता एक ओर तो कहते हैं कि उनका पंथ समतावादी है, उनके यहां जाति-पाति की व्यवस्था नहीं है वहीं, दूसरी ओर वे दलित ईसाई व दलित मुस्लिम जैसे शब्दों की रचना करके उनके लिए आरक्षण की मांग करते हैं जिससे उनके कन्वर्जन के कुचक्रों को गति मिल सके।

डॉ. जैन ने कहा कि अब भारत की धरती में उनके कुचक्र नहीं चल सकेंगे। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति के अधिकार और संरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय को दूर करना है, जो विशेष रूप से हिंदू समाज की संरचना में उत्पन्न हुआ था। अतः जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से कन्वर्ट होता है, तो वह उस सामाजिक संदर्भ से भी स्वयं को अलग कर लेता है, जिसके आधार पर ये विशेष अधिकार प्रदान किए गए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पुनः हिंदू, सिख या बौद्ध पंथ में लौटता है और समाज द्वारा उसे स्वीकार किया जाता है, तभी वह पुनः अनुसूचित जाति के अधिकारों का पात्र बन सकता है।

डॉ. जैन ने कहा कि यह निर्णय देश में सामाजिक समरसता, पारदर्शिता और न्याय की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। विहिप के कार्यकर्ता देशभर में ऐसे लोगों की सूची बनाएंगे जिन्होंने अनुसूचित समाज के अधिकारों पर डाका डाला है और उनसे वे अधिकार छीनकर उन लोगों को दिलाएंगे जो उनके वास्तविक अधिकारी हैं।

राज्य सरकार का तर्क अस्वीकृत

अपीलार्थी ने आंध्र प्रदेश सरकार के 1977 के एक सरकारी आदेश पर विशेष बल दिया था, जिसमें अनुसूचित जाति के ईसाई एवं बौद्ध हो चुके लोगों को कुछ रियायतें देने की बात कही गई थी। न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह सरकारी आदेश स्वयं अपने दायरे को केवल गैर-संवैधानिक रियायतों, अर्थात् कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक सहायता तक सीमित करता है। उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आरक्षण और केंद्रीय विधान के अंतर्गत संरक्षण सहित संवैधानिक लाभ, 1950 के राष्ट्रपतीय आदेश के अधीन मान्यता प्राप्त व्यक्तियों तक ही सीमित रहेंगे। इससे भी अधिक मौलिक बात यह है कि कोई भी राज्य संविधान के अंतर्गत जारी राष्ट्रपतीय आदेश को विस्तारित नहीं कर सकता। केंद्र सरकार ने भी 2021 में यह स्थिति स्पष्ट की थी कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लाभ एवं अन्य संवैधानिक लाभ अनुसूचित जाति के उन लोगों को नहीं दे सकते, जो ईसाई बन गए हैं।

व्यापक महत्त्व

दशकों से एक सुनियोजित और भारी वित्त-पोषित अभियान चलाया जाता रहा है, जो मुख्यतः कुछ सांप्रदायिक हितों और उनके राजनीतिक सहयोगियों द्वारा संचालित है, ताकि ईसाई बने लोगों के लिए अनुसूचित जाति आरक्षण और संरक्षण का विस्तार किया जा सके। यह तर्क दिया जाता है कि धार्मिक पहचान से निरपेक्ष रहते हुए जातिगत भेदभाव बना रहता है। यह तर्क, चाहे जितना आकर्षक लगे, संवैधानिक अभिकल्पना की मूल भावना को गलत समझता है और यदि स्वीकार किया जाए तो उसे मौलिक रूप से विकृत कर देगा।

अनुसूचित जाति का ढांचा एक विशिष्ट सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के भीतर उत्पन्न अक्षमताओं को दूर करने के लिए बनाया गया था। 1950 का राष्ट्रपतीय आदेश एक सुविचारित संवैधानिक चयन को प्रतिबिंबित करता है। अनुसूचित जाति की सूची में परिवर्तन का अधिकार केवल संसद को है, न राज्य सरकारों को, न न्यायालयों को और निश्चित रूप से न दबाव समूहों को। ऐसी संसदीय कार्रवाई के अभाव में ईसाई बन चुके लोगों को अनुसूचित जाति के लाभ देना संविधान के साथ धोखाधड़ी होगी।

Topics: संवैधानिक प्रावधानअधिसूचित जातिकन्वर्जनविधिक स्थितिधर्मांतरणपूर्वजों का धर्मआरक्षणआरक्षण एवं संरक्षणईसाई मतएससी/एसटी अधिनियमपाञ्चजन्य विशेषसंवैधानिक लाभघरवापसीसामाजिक और वैचारिकअनुसूचित जाति दर्जाजातिगत पहचानऐतिहासिक निर्णयआदित्य कश्यप
आदित्य कश्यप
आदित्य कश्यप
अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय [Read more]
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