भारत के लोग स्वभाव से श्रेष्ठ, सहृदय और गुणवान हैं, किंतु संगठन की कमी के कारण उनकी शक्ति पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हो पाती। इसी समस्या को समझते हुए डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने समाज को संगठित करने के उद्देश्य से 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
आज हिंदुत्व के विचार की चर्चा विश्व स्तर पर हो रही है। यह स्पष्ट है कि दुनिया उसी की सुनती है जो शक्तिशाली और संगठित होता है। हिंदुत्व का मूल स्वभाव समरसता और सर्वकल्याण की भावना है। नवरात्र में कोई व्यक्ति नौ दिन का व्रत रखता है, तो कोई दो दिन का, परंतु सभी का उद्देश्य एक ही होता है–कल्याण और साधना।
यह विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण है। आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और समाज परिवर्तन के लिए ‘पंच परिवर्तन’ के महत्वपूर्ण विषयों पर कार्य कर रहा है। परिवार ही संस्कारों की प्रथम पाठशाला है। बच्चों की शिक्षा और चरित्र निर्माण घर से ही प्रारंभ होता है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता को भगवान से भी उच्च स्थान दिया गया है।
इसलिए कुटुंब प्रबोधन के अंतर्गत साथ बैठकर भोजन, संवाद और सामूहिक जीवन पर बल दिया जाता है। समाज में भेदभाव समाप्त कर सभी वर्गों को एकसूत्र में जोड़ना आवश्यक है। समरस समाज ही सशक्त राष्ट्र का आधार बनता है। वर्तमान समय में पर्यावरण असंतुलन एक गंभीर समस्या बन चुका है।
इसे रोकने के लिए हमें सजग होना होगा। स्वदेशी का अर्थ केवल देशी वस्तुओं का उपयोग नहीं, बल्कि स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता है। टेक्नोलॉजी का उपयोग आवश्यक है, परंतु उसमें आत्मनिर्भर बनना और अपनी क्षमताओं का विकास करना भी उतना ही जरूरी है।
सेवा की भावना हमारी प्राचीन परंपरा का मूल तत्व है। संविधान हमें अनेक अधिकार देता है, जिनकी चर्चा व्यापक रूप से होती है, परंतु मौलिक कर्तव्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। हर नागरिक को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होना चाहिए।
-आलोक कुमार, सह सरकार्यवाह (बलिया में 22 मार्च, 2026)
















