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होम विश्लेषण

नारी चेतना का विराट समागम

नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित “भारती-नारी से नारायणी” सम्मेलन ने यह स्थापित किया कि भारत का उत्कर्ष महिलाओं की नेतृत्वकारी भागीदारी के बिना अधूरा है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित इस दो दिवसीय कार्यक्रम में देश के विविध राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से आई महिलाओं ने शिक्षा, आत्मनिर्भरता, नेतृत्व, स्वास्थ्य, संस्कृति और नीति जैसे विषयों पर गंभीर मंथन किया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Mar 30, 2026, 08:59 am IST
in विश्लेषण, दिल्ली
दीप प्रज्ज्वलित कर समापन सत्र का उद्घाटन करती हुईं राष्ट्रपति श्रीमती द्राैपदी मुर्मू। साथ में हैं (बाएं से) श्रीमती शिवानी वी. और शांता अक्का जी

दीप प्रज्ज्वलित कर समापन सत्र का उद्घाटन करती हुईं राष्ट्रपति श्रीमती द्राैपदी मुर्मू। साथ में हैं (बाएं से) श्रीमती शिवानी वी. और शांता अक्का जी

गत 7-8 मार्च को नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में महिला विचारकों का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। इसका विषय था-‘भारती: नारी से नारायणी।’ सम्मेलन का उद्घाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने किया तो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता

कार्यक्रम के शुभारंभ में रेखा गुप्ता ने कहा कि भारत की महिलाएं परंपरा की वाहिकाएं ही नहीं, परिवर्तन की वाहिकाएं भी हैं। आज हर क्षेत्र में भारतीय महिलाएं पुरुषों से बेहतर काम कर रही हैं। महिलाओं ने खुद ही अपने लक्ष्य तय करना शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि परिवार, समाज और देश की अपेक्षाएं महिलाएं अवश्य पूरी करें, लेकिन उन्हें अपने मन की खुशी के लिए भी कुछ समय निकालना चाहिए। पूरे परिवार की सेहत का ध्यान रखते हुए महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने माताओं से अपील की कि जो माहौल उन्हें नहीं मिला, वह उन्हें अपनी बेटियों को जरूर देकर उड़ने के लिए खुला आकाश देना चाहिए। उन्होंने बताया कि दिल्ली में उनकी सरकार ने बेटियों को शक्ति संपन्न करने के लिए ‘लखपति बिटिया योजना’ लागू की है। पहले केवल 10वीं पास करने तक ही दिल्ली की बेटियों को आर्थिक लाभ दिया जाता था, लेकिन उनकी सरकार ने बेटियों के स्नातक करने पर करीब सवा लाख रुपए की सहायता देने का निर्णय किया है। साथ ही उनकी सरकार ने महिलाओं को रात में भी काम करने की छूट दी है। उन्होंने कहा कि भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में अपना नाम करें, यह क्षमता उनमें है। अगर वे अपने लक्ष्य स्वयं निर्धारित करें, तो नारी से नारायणी बन जाएंगी।

समारोह की अध्यक्ष राष्ट्र सेविका समिति की मुख्य संचालिका सुश्री वी. शांता कुमारी ने इस मौके पर कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को बहुत महत्व दिया जाता है। नारी समाज को धारण करने वाली सुदृढ़ शक्ति है, इसलिए नारायणी बन सकती है। मंगलाचरण या वेदों के अध्ययन की बात हो या फिर ऑपरेशन सिंदूर, भारत की महिलाओं ने अप्रतिम शौर्य का परिचय हर क्षेत्र में दिया है। उन्होंने कहा कि क्षमता बढ़ाने से सम्मान हमें स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि समाज हमें प्रोत्साहन दे। प्रोत्साहन का उपयोग कर समाज के उत्थान का प्रयास करना चाहिए। सम्मान प्राप्त करने के बाद यानी नारी से नारायणी बनने के बाद हम हर क्षेत्र में आगे जाएंगे। हमें भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ कर काम करना है और उस पर अभिमान भी करना है। इस तरह हम दूसरों के लिए आदर्श बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय नारियों को अपने ज्ञान का उपयोग अपने आसपास के क्षेत्रों में करते हुए सकारात्मक वातावरण बनाना चाहिए। अपने परिवार को समर्थ बनाकर पूरे समाज को, पूरे राष्ट्र को सक्षम बनाने में योगदान देना चाहिए। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां हुए मंथन से निकलने वाली अमृत धारा को देश भर में पहुंचा कर सही विमर्श स्थापित करना है।

उद्घाटन समारोह में ही भारतीय विद्वत परिषद की सचिव शिवानी वी. ने कहा कि नारी से नारायणी पवित्र यात्रा है। सम्मेलन का उद्देश्य महिलाओं की “मौन शक्ति से निर्णायक शक्ति” तक की यात्रा को सशक्त बनाना है। लोग अक्सर नारी के सशक्तीकरण की बात करते हैं, लेकिन नारी तो अपने आप में ही ऊर्जा और शक्ति का स्रोत है। उन्होंने कहा कि ‘भारती-नारी से नारायणी’ राष्ट्रीय सम्मेलन में हर नारी सशक्तीकरण की बात करने नहीं, बल्कि अपनी शक्ति को जगा कर आत्म-बोध के लिए आए हैं। उन्होंने कहा कि भारत की महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी हैं। वे समस्या नहीं, बल्कि ‘अल्टीमेट सॉल्वर’ हैं। इसलिए महिलाओं को समझना चाहिए कि शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षर विद्या नहीं है, बल्कि शक्ति का संस्कार होना चाहिए। इस मौके पर शरण्या की अध्यक्ष अंजू आहूजा, अदम्य चेतना की मैनेजिंग ट्रस्टी तेजस्विनी अनंत कुमार और चारु कालरा ने भी विचार व्यक्त किए। उल्लेखनीय है कि सम्मेलन में देश भर से लगभग 1500 महिला विचारकों ने भाग लिया और महिला सशक्तीकरण, शिक्षा, नेतृत्व, आत्मनिर्भरता और समाज में महिलाओं की भूमिका जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

‘विकास की सबसे बड़ी शक्ति हैं महिलाएं’

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू म

समापन समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारतीय समाज और राष्ट्र की प्रगति में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षित, आत्मनिर्भर और सशक्त महिलाएं किसी भी देश के विकास की सबसे बड़ी शक्ति होती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी को केवल परिवार की संरक्षक के रूप में नहीं देखा गया है, बल्कि उसे ज्ञान, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। आज की भारतीय महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, प्रशासन, खेल, उद्यमिता और सामाजिक सेवा जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रही हैं और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब महिलाओं को समान अवसर, सम्मान और सुरक्षा प्राप्त हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को निर्णय लेने की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर और शिक्षा तथा रोजगार के समान अवसर मिलना अत्यंत आवश्यक है। आज भारत में महिला-नेतृत्व वाले विकास की अवधारणा तेजी से आगे बढ़ रही है। उन्होंने युवतियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि वे अपने सपनों को साकार करने के लिए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें और देश के विकास में सक्रिय भूमिका निभाएं। जब महिलाएं सशक्त होती हैं तो परिवार, समाज और राष्ट्र सभी मजबूत बनते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत की महिलाएं अपने ज्ञान, नेतृत्व और संवेदनशीलता के माध्यम से देश को प्रगति और समृद्धि की नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को समाज का प्रोत्साहन स्वीकार करना चाहिए। क्षमता बढ़ाने से सम्मान हमें स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। हमारा व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि समाज हमें प्रोत्साहन दे।

बही ज्ञान की गंगा

दो दिवसीय सम्मेलन में प्रमुख रूप से आठ विषयों पर गंभीर चर्चा हुई। इस दौरान शिक्षाविद्, उद्यमी, महिला सांसद, कुलपति और साध्वियों के विशेष सत्र आयोजित किए गए। इसके अलावा कार्यक्रम में समानांतर सत्र भी हुए। इनमें शिक्षा, शासन, अध्यात्म और 2047 तक भारत के विकास के लिए दीर्घकालिक नीतिगत योजना जैसे विषयों पर मंथन और चिंतन हुआ

कार्यक्रम में प्रो. एम. जगदीश कुमार का अभिनंदन करते हुए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति श्री श्रीनिवास बरखेडी

सत्र 1

ज्ञान की शक्ति सत्र में वक्ता के रूप में प्रो. एम. जगदीश कुमार, डॉ. अनुराधा चौधरी, पायल मागो, स्मृति अनंतलक्ष्मी आदिनारायण और डॉ. लीना गहाने उपस्थित थीं। सत्र में महिलाओं को सशक्त बनाने पर जोर दिया गया। एक सवाल के जवाब में प्रो. एम. जगदीश कुमार ने कहा कि महिलाओं के लिए शैक्षिक अवसरों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। लेकिन अभी भी उच्च शिक्षा, शोध क्षेत्रों में महिलाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि शिक्षा केवल शैक्षणिक सफलता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे महिलाओं में नेतृत्व कौशल, आलोचनात्मक चिंतन और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करने पर भी केंद्रित होना चाहिए, ताकि वे राष्ट्र-निर्माण में प्रभावी योगदान दे सकें।

सत्र 2

शक्ति-आत्मनिर्भरता केंद्रित सत्र में श्रीमती अन्नपूर्णा देवी, डॉ. अभिषेक गर्ग, प्रोफेसर गीता भट्ट, डॉ. मदन पडाकी, प्रोफेसर गीता सिंह और अधिवक्ता क्षमा नरगुंद ने अपनी-अपनी बात रखी। यह सत्र महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण विषय पर केंद्रित था। पैनल का उद्देश्य यह मंथन करना था कि संसाधनों, अवसरों का बेहतर इस्तेमाल करके महिलाएँ किस प्रकार अधिक आत्मनिर्भर बन सकती हैं। चर्चा के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि महिलाओं की स्वतंत्रता और समाज में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने में आर्थिक सशक्तिकरण की महत्वपूर्ण भूमिका है। पैनल ने महिला उद्यमियों को अपने उद्यमों को विकसित और टिकाऊ बनाए रखने में सहायता देने के लिए वित्तीय संसाधन, मार्गदर्शन और बाज़ार से जुड़ाव उपलब्ध कराने के महत्व पर भी चर्चा की गई।
कार्यक्रम में उपस्थि​त मातृशक्ति

सत्र 3

मुक्ति और चेतना सत्र में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष श्रीमती विजया रहाटकर, सुश्री भारती खन्ना, सर्वोच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीमती मोनिका अरोड़ा, अधिवक्ता डॉ. जोया अली रिज़वी, प्रो. वी. भारती हरिशंकर और श्रीमती शांता कुमारी वक्ता के रूप में उपस्थित थीं। यह सत्र महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ ही सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक बिंदुओं पर केंद्रित था। इस दौरान वक्ताओं द्वारा कहा गया कि सशक्तिकरण केवल बाहरी अवसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंतरिक शक्ति, आत्मविश्वास और जागरूकता के विकास से भी जुड़ा है, जो महिलाओं को अपनी पूर्ण क्षमता का बोध कराने और जीवन को सक्रिय रूप से आकार देने में सक्षम बनाती है।

सत्र 4

प्रकृति से पोषण सत्र में डॉ. संध्या पुरेचा, डॉ. रूपा रावल, डॉ. एस. महेश, डॉ. मनीषा कोठेकर और श्रीमती किरण चोपड़ा वक्ता के रूप में उपस्थित थीं। यह सत्र महिलाओं की स्वाभाविक भूमिकाओं और उनके समग्र विकास एवं कल्याण के पोषण हेतु आवश्यक तंत्रों को समझने पर केंद्रित था। चर्चा में यह रेखांकित किया गया कि महिलाओं के लिए नीतियाँ और सामाजिक संरचनाएँ उनकी आवश्यकताओं के अनुकूल हों। वक्ताओं ने विशेष रूप से गर्भावस्था, मातृत्व और अन्य स्वास्थ्य-संबंधी अवस्थाओं के दौरान लचीली और समावेशी कार्यस्थल नीतियों के महत्व पर बल दिया।

सत्र 5

सिद्धि: महिला उपलब्धि पर केंद्रित था। इस सत्र में वक्ता के रूप में सुश्री भाग्यश्री साठे, श्रीमती मृदुला प्रधान, डॉ. नीलिमा सोना, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रितु करिधाल, श्रीमती रीवा सूद, श्रीमती लक्ष्मी पुरी, लेखिका श्रीमती माधुरी सहस्रबुद्धे उपस्थित रहीं। इस सत्र में यह विचार किया गया कि सिद्धि केवल पेशेवर उपलब्धि या किसी अधिकार-पद की प्राप्ति नहीं है; बल्कि यह साधना की पराकाष्ठा है। यह एक ऐसी यात्रा है जो धैर्य, अनुशासन और व्यापक सामाजिक उद्देश्य के प्रति समर्पण से निर्मित होती है। चर्चा में नारी से नारायणी तक के रूपांतरण को रेखांकित किया गया, जहाँ नारी व्यक्तिगत पहचान है तो वहीं नारायणी शक्ति, दृढ़ता और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। वक्ताओं ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बल दिया कि जब एक महिला सफलता प्राप्त करती है, तो उसका प्रभाव उसकी व्यक्तिगत उन्नति से आगे बढ़कर परिवार, समुदाय और समूचे राष्ट्र को ऊपर उठाता है।

सत्र 6

कृति: विचारों से क्रियान्वयन सत्र की शुरुआत विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली महिलाओं के सम्मान से हुई। इनमें कांस्टेबल पायल मंडल, कांस्टेबल जयश्री घोष, कमला मौर्य, कांस्टेबल काजल खत्री और साध्वी राजलक्ष्मी मांडा शामिल थीं। उनके सम्मान से सत्र की प्रेरणादायक शुरुआत हुई। सत्र का केंद्र बिंदु महिलाओं के विकास के लिए एक स्पष्ट और क्रियाशील पथ को विकसित करना रहा। चर्चा में आगे यह भी रेखांकित किया गया कि सरकार, प्रशासनिक निकायों और स्थानीय समुदायों सहित समाज के सभी वर्गों को महिलाओं के समग्र विकास के प्रति संवेदनशील होना ही चाहिए।
Topics: पाञ्चजन्य विशेषवी शांता कुमारीनारी से नारायणीनारी चेतना का समागमभारती राष्ट्रीय सम्मेलनलखपति बिटिया योजनामहिला सशक्तिकरणराष्ट्र सेविका समितिराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
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