युद्ध, वार्ता और भ्रम: ईरान संकट और उभरता भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन
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युद्ध, वार्ता और भ्रम: ईरान संकट और उभरता भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन

अमेरिका और इजरायल का दृष्टिकोण कहता है कि ईरान के विरुद्ध युद्ध को कुछ और समय तक जारी रखा जाना चाहिए, ताकि उसके मूल उद्देश्यों को हासिल किया जा सके, जैसे कि - सैन्य संरचना को निष्क्रिय करना, परमाणु क्षमता प्राप्त करने की संभावनाओं को समाप्त करना, धार्मिक नेतृत्व वाले शासन को कमजोर या समाप्त करना।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा
Mar 29, 2026, 07:01 pm IST
inविश्व, विश्लेषण
पश्चिम एशिया संकट

पश्चिम एशिया संकट

हाल के संकेत डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन, इज़राइल और उनके क्षेत्रीय सहयोगियों-विशेषकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात-की ओर से यह दर्शाते हैं कि यह वास्तविक शांति की दिशा में कदम नहीं, बल्कि एक सामरिक पुनर्संरेखण है।

उभरती हुई सोच स्पष्ट है:

अमेरिका और इजरायल का दृष्टिकोण कहता है कि ईरान के विरुद्ध युद्ध को कुछ और समय तक जारी रखा जाना चाहिए, ताकि उसके मूल उद्देश्यों को हासिल किया जा सके, जैसे कि – सैन्य संरचना को निष्क्रिय करना, परमाणु क्षमता प्राप्त करने की संभावनाओं को समाप्त करना, धार्मिक नेतृत्व वाले शासन को कमजोर या समाप्त करना। इसके साथ ही “वार्ता” का विचार भी उछाला जा रहा है, परंतु यह किसी वास्तविक कूटनीतिक पहल से अधिक रणनीतिक दबाव का उपकरण प्रतीत होता है, जिसका उद्देश्य ईरान को अंततः बिना शर्त समर्पण की ओर धकेलना है। यह दोहरी रणनीति (युद्ध और वार्ता का समानांतर प्रयोग) दरअसल कूटनीति नहीं, बल्कि दबाव का तरीका है।

वार्ता की सीमाएं और संभावित विफलता

पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र द्वारा मध्यस्थता के प्रयासों के बावजूद, वास्तविकता यह है कि ईरान अपने मूलभूत हितों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं दिखता। ईरान अपनी राजनीतिक व्यवस्था, उन्नत मिसाइल एवं सैन्य कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव, होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण से पीछे नहीं हटना चाहता है। वर्तमान संघर्ष ने यह भी बता दिया है कि बिना परमाणु हथियारों के भी ईरान पारंपरिक सैन्य क्षमता के माध्यम से क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत है। एक दृष्टिकोण यह भी है कि ईरान अब संभावित खतरा नहीं, बल्कि एक सक्रिय और सक्षम शक्ति के रूप में स्थापित हो चुका है।

मध्यस्थों की विश्वसनीयता: एक गंभीर प्रश्न

इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चा किया गया पहलू है – मध्यस्थों की विश्वसनीयता, विशेषकर पाकिस्तान की भूमिका। पाकिस्तान का ऐतिहासिक रिकॉर्ड कई सवाल खड़े करता है –

  1. चीन के साथ गहरे सामरिक संबंध
  2. तालिबान, हमास और हिज़्बुल्लाह के साथ जुड़ाव के आरोप
  3. परिस्थितियों के अनुसार बार-बार पक्ष बदलने की प्रवृत्ति
  4. अफगानिस्तान के संदर्भ में भी, पाकिस्तान ने पहले सोवियत समर्थित शासन को हटाने में भूमिका निभाई और बाद में अमेरिकी
  5. समर्थित सरकार के पतन में भी अप्रत्यक्ष योगदान दिया।

ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि शांति प्रक्रिया पाकिस्तान के माध्यम से आगे बढ़ती है, तो उसकी विश्वसनीयता और परिणामों की गारंटी कौन देगा?

रूस: शांति समीकरण की अनिवार्य कड़ी

रूस को इस समीकरण से अलग रखकर किसी स्थायी शांति की कल्पना करना अव्यावहारिक है। रूस, ईरान का प्रमुख रणनीतिक सहयोगी है। उसके समर्थन के बिना ईरानी शासन की स्थिरता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। वहीं, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के हालिया रुझान—रूस के प्रति अपेक्षाकृत नरम दृष्टिकोण। वहीं नाटो सहयोगियों के साथ तनाव यह संकेत देते हैं कि वैश्विक शक्ति संतुलन एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। रूस को दरकिनार कर बनाई गई कोई भी शांति व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकती; वह केवल एक अस्थायी मृगतृष्णा साबित होगी।

भारत की शांत लेकिन निर्णायक कूटनीति

इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत एक संतुलित, विश्वसनीय और उभरती हुई निर्णायक शक्ति के रूप में सामने आ रहा है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने परदे के पीछे सक्रिय कूटनीतिक प्रयास किए हैं, जिनमें डोनाल्ड ट्रंप और मार्को रुबियो के साथ सीधे संवाद शामिल हैं। भारत की रणनीति यथार्थवाद पर आधारित है: रूस की भागीदारी के बिना शांति अस्थायी होगी। संतुलित और समावेशी कूटनीति ही समाधान का मार्ग है। ऊर्जा सुरक्षा वैश्विक स्थिरता का केंद्रीय तत्व है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इज़राइल और ईरान- दोनों पक्षों ने समय-समय पर संकेत दिए हैं कि भारत की भागीदारी इस प्रक्रिया में “गेम चेंजर” सिद्ध हो सकती है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति है उसकी सभी पक्षों के साथ संवाद की क्षमता। वैचारिक निष्पक्षता। क्षेत्रीय विस्तारवाद की अनुपस्थिति, जिसे एक दुर्लभ स्थिति प्रदान करता है।

आगे का यथार्थवादी मार्ग

यह मान लेना कि केवल सैन्य दबाव से ईरान को पूरी तरह बदला जा सकता है, एक सरलीकृत दृष्टिकोण है। वहीं, बिना रणनीतिक यथार्थ के कूटनीति भी उतनी ही कमजोर साबित होगी। एक प्रभावी समाधान के लिए आवश्यक है रूस की औपचारिक भागीदारी और एक विश्वसनीय और निष्पक्ष मध्यस्थ, जहां भारत स्वाभाविक विकल्प बनता है।

युद्ध और विवेक के बीच चयन

वर्तमान समय केवल युद्ध और शांति के बीच चयन का नहीं, बल्कि भ्रम और रणनीति के बीच निर्णय का क्षण है। बिना रणनीति का युद्ध विनाशकारी होता है। बिना शक्ति की वार्ता निरर्थक होती है बिना विश्वसनीयता की मध्यस्थता खतरनाक होती है।

इस जटिल संतुलन में, भारत की संयमित और संतुलित कूटनीति ही वह कारक बन सकती है, जो इस संघर्ष को दीर्घकालिक स्थिरता और संतुलन की दिशा में मोड़ दे।

 

Topics: ईरान-्अमेरिका-इजरायल युद्धभारतरूसपश्चिम एशिया संकटईरान संकटईरान अमेरिका युद्ध
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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