सशस्त्र माओवाद का पूर्ण उन्मूलन: अब शहरी माओवादियों के बौद्धिक मुखौटे बेनकाब करने का समय
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सशस्त्र माओवाद का पूर्ण उन्मूलन: अब शहरी माओवादियों के बौद्धिक मुखौटे बेनकाब करने का समय

सशस्त्र माओवाद खत्म, लेकिन शहरी माओवाद अभी सक्रिय। इस लेख में पढ़ें कैसे बौद्धिकों ने दशकों तक हिंसा को ‘सामाजिक न्याय’ का नाम दिया और अब राष्ट्र को आत्ममंथन की जरूरत क्यों है।

Written byअभय प्रताप सिंहअभय प्रताप सिंह — edited by कुलदीप सिंह
Mar 29, 2026, 11:50 am IST
in विश्लेषण
108 Naxalites

108 Naxalites

आज जब भारत 31 मार्च 2026 तक सशस्त्र माओवाद के पूर्ण उन्मूलन की दहलीज पर खड़ा है, तब इस अवसर का जश्न केवल सुरक्षा बलों की सफलता तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अब समय आ गया है उन “बौद्धिक मुखौटों” को भी बेनकाब करने का, जिन्होंने जंगलों में चल रही बंदूकों और रक्तरंजित दौर को दशकों तक सामाजिक न्याय और क्रांति का जामा पहनाया।

माओवादी शहरों में भी

सच्चाई यह है कि माओवादी आतंक केवल बस्तर के जंगलों में नहीं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की बहसों, अकादमिक शोध-पत्रों, मीडिया और सेमिनारों के वातानुकूलित कमरों में भी ‘शहरी माओवाद’ के रूप में लगभग चार दशकों तक खूब फला-फूला। देश के बौद्धिक जगत में दशकों तक एक ऐसा कुटिल ढांचा खड़ा किया गया जहाँ नक्सली हिंसा को प्रतिरोध और ‘न्याय की लड़ाई’ जैसे आकर्षक शब्दों से अलंकृत किया जाता था। लंबे समय तक तो कुछ संस्थानों में इस पूरे ढांचे का समर्थन करना ही बौद्धिक होने की अनिवार्य योग्यता बन गई थी।

यह ‘बौद्धिक घेराबंदी’ इतनी सुनियोजित थी कि दशकों तक एक आयातित विचारधारा के पोषण के लिए अपनों के ही रक्त की आहुति को न्यायोचित ठहराया गया। सिद्धांतों के इस शोर में ज़मीनी सच्चाई दबा दी गई कि माओवाद वस्तुतः आतंकवाद का ही एक रूप है। जब दंतेवाड़ा और सुकमा के जंगल हमारे जवानों के रक्त से लाल हुए, जो राष्ट्र की अखंडता के लिए वीरगति को प्राप्त हुए। ‘जनताना सरकार’ के नाम पर उन आदिवासियों को प्रताड़ित किया गया, जिनके अधिकारों की रक्षा इस देश का संविधान करता है।माओवाद ने केवल बंदूकें नहीं उठाईं, बल्कि स्कूलों, सड़कों और अस्पतालों को ध्वस्त कर विकास की हर संभावना का गला घोंटा। शिक्षा दूतों की हत्या की गई और जनजाती समुदाय की पीढ़ियों को मुख्यधारा से जुड़ने से रोका गया।

इसे भी पढ़ें: ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन: ट्रंप की नीतियों के खिलाफ अमेरिका-यूरोप में उबाल

खूनी आतंक के प्रति बौद्धिक आसक्ति

दशकों तक देश के कुछ विश्वविद्यालयों के गलियारों में इस खूनी आतंक के प्रति एक ‘बौद्धिक आसक्ति’ जानबूझकर जीवित रखी गई। यह ‘आसक्ति’ एक प्रकार का वैचारिक अंधमोह था जहाँ तथाकथित बुद्धिजीवियों को किताबी सिद्धांतों से इतना प्रेम हो गया कि उन्हें ज़मीनी मासूमों की चीखें सुनाई देना बंद हो गईं। वे हिंसा के खूनी चेहरे को देखने के बजाय उसे क्रांति के रूमानी चश्मे से देखने के शौकीन बने रहे। यह ‘बौद्धिक आसक्ति’ केवल शोध-पत्रों एवं सेमिनार तक ही सीमित नहीं थी बल्कि सार्वजनिक प्रदर्शनों में भी वीभत्स रूप में दिखाई दी। वर्ष 2010 में जब दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवानों ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, तब जेएनयू (JNU) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के परिसर में इस नरसंहार पर ‘जश्न’ मनाने की घटनाओं ने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया था। वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर उस खूनी कृत्य को ‘क्रांति की सफलता’ के रूप में महिमामंडित किया जा रहा था।

राष्ट्र के विरुद्ध अदृश्य युद्ध

विश्वविद्यालयों में ‘किश्तों में क्रांति’ जैसे शीर्षकों के नीचे होने वाले आयोजनों और कुछ विशेष मीडिया मंचों द्वारा इन ‘वैचारिक आतंकियों’ को ‘असहमति की आवाज़’ बताकर प्राइम टाइम पर महिमामंडित करना, इस षड्यंत्र का प्रमुख हिस्सा था।शहरी माओवाद की सबसे बड़ी ताकत उसका छद्म मानवाधिकारवाद रहा है। यह एक ऐसा सुरक्षा कवच है जिसका उपयोग ये बुद्धिजीवी तब करते हैं जब कानून का डंडा उनके करीब पहुँचता है। विडंबना देखिए जो विचारधारा लोकतंत्र को ‘बंदूक की नोक’ पर उखाड़ फेंकना चाहती है वही संकट के समय उसी लोकतंत्र के संवैधानिक अधिकारों की आड़ लेती रहती है। यही कारण रहा की जब भी राज्य नागरिकों की रक्षा के लिए कदम उठाता, तो कुछ ‘स्वयंभू मानवाधिकारवादी’ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि एक “दमनकारी देश” के रूप में पेश करने लगते हैं। यह कृत्य केवल वैचारिक दोहरापन नहीं, बल्कि राष्ट्र के विरुद्ध एक ‘अदृश्य युद्ध’ जैसा है ।

लम्बे समय तक भारत में सशस्त्र माओवाद को बौद्धिक ढाल देने के लिए “संरचनात्मक हिंसा” (Structural Violence) जैसे भारी-भरकम सिद्धांतों का सहारा लिया गया ताकि हिंसा को एक ‘अनिवार्य प्रतिक्रिया’ सिद्ध किया जा सके। यहाँ एक बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है: क्या अकादमिक अभिव्यक्ति का उपयोग उस संविधान को ही सशस्त्र चुनौती देने वालों के समर्थन में किया जा सकता है? क्या कोई भी नागरिक, राष्ट्र के विरुद्ध शस्त्र उठाने वालों का ‘वैचारिक सारथी’ बन सकता है? महानगरों के वातानुकूलित कमरों में बैठे बुद्धिजीवी निष्पक्ष अध्ययन का स्वांग रचते रहे, जबकि धरातल पर रक्त की धाराएं बहती रहीं।यह ज्ञात है की जब किसी विमर्श का झुकाव निरंतर हिंसा को सुकोमल बनाने की ओर हो तो वह तटस्थ अध्ययन नहीं, बल्कि हिंसा की ‘नैतिक वैधता’ का निर्माण बन जाता है। यहीं से शुरू होती है उन विचारों की भी आपराधिक जिम्मेदारी जो कई दशकों तक बंदूकों से भी अधिक घातक सिद्ध हुए हैं।

सशस्त्र माओवाद के खात्मे के बाद भी एक सवाल खड़ा

आज भले ही देश से सशस्त्र माओवाद समाप्त होने की कगार पर है, लेकिन हमें उनसे सवाल जरूर पूछना चाहिए जिन्होंने अपनी संकुचित ‘राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ के लिए अपने ही देश के नागरिकों को दशकों तक विकास की धारा से वंचित रखा। आदिवासियों के नाम पर अपनी रोटियां सेकने वाले इन लोगों ने विकास की हर किरण को उनके पास तक पहुँचने से रोका, ताकि उनकी “क्रांति” का प्रयोग चलता रहे।

इन सभी परिस्थितियों के बीच माओवाद के इस वैचारिक तिलस्म का सबसे बड़ा जवाब आज बस्तर के उन युवाओं ने दिया है जो बंदूक छोड़ कर कलम और खेलों के माध्यम से तिरंगे का मान बढ़ा रहे हैं। यह उन ‘शहरी माओवादियों’ की सबसे बड़ी हार है, जिन्होंने कभी दावा किया था कि आदिवासी कभी इस लोकतंत्र का हिस्सा नहीं बनना चाहता। आज जब सुदूर वनांचलों में मतदान का प्रतिशत बढ़ता है तो वह केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि उस थोपी गई विदेशी विचारधारा के विरुद्ध भारत के ‘स्व’ की जीत है। आज जब छत्तीसगढ़ के वनवासी क्षेत्रों में तिरंगा फहराया जाता है तो वह भारत के नागरिकों का उनके राष्ट्र के प्रति समर्पण दर्शाता है।

देश की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सुरक्षा बलों के पराक्रम से सशस्त्र माओवाद का सैन्य पराभव तो सुनिश्चित हो चुका है लेकिन असली चुनौती अब उस ‘शहरी माओवादी’ इकोसिस्टम की है जो अब भी वैचारिक स्तर पर सक्रिय है। क्योंकि विचार यदि अपनी नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त होकर राष्ट्र-विरोध का साधन बन जाएं, तो वह समाज के लिए कैंसर बन जाते हैं।

अकादमिक जगत को आत्ममंथन की आवश्यकता

अब समय आ गया है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था और अकादमिक जगत एक गहरा आत्ममंथन करे। देश में सशस्त्र माओवादी आतंक ने जितना नुकसान किया है उससे कहीं अधिक नुकसान बौद्धिक आतंकी लगातार कर रहे हैं। सशस्त्र माओवाद के खात्मे के पश्चात् शहरी माओवाद और उसके बदलते स्वरुप से निपटना सबसे बड़ी चुनौती होगी क्यूंकि आज जब उनका एक प्रयोग असफल हो रहा है तब वह समाज को विखंडित करने के अन्य कई प्रयोगों पर कार्य कर रहे हैं, यही कारण है की शहरी माओवादियों के सम्पूर्ण उन्मूलन तक अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

(लेखक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं, राष्ट्रीय मंत्री, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद)

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