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शोक-अवकाश: संवेदना का संवैधानिक अधिकार

भारत की सभ्यता और सामाजिक संरचना का मूल आधार परिवार है। यहां माता-पिता केवल जीवनदाता नहीं होते; वे संस्कारों के स्रोत, जीवन के प्रथम शिक्षक और नैतिक मार्गदर्शक होते हैं।

Written byडॉ. दिनेश शर्माडॉ. दिनेश शर्मा
Mar 28, 2026, 08:00 pm IST
inभारत

मैंने राज्य सभा में एक ऐसे विषय को उठाया, जो केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था का प्रश्न नहीं है, बल्कि हमारे समाज की मानवीय संवेदना, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। मैंने यह प्रस्ताव रखा कि देश में माता-पिता के निधन की स्थिति में संतानों को कम से कम 13 दिन का “शोक-अवकाश” सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह मांग किसी विशेष वर्ग या क्षेत्र की नहीं, बल्कि भारत के करोड़ों परिवारों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है।

भारत की सभ्यता और सामाजिक संरचना का मूल आधार परिवार है। यहां माता-पिता केवल जीवनदाता नहीं होते; वे संस्कारों के स्रोत, जीवन के प्रथम शिक्षक और नैतिक मार्गदर्शक होते हैं। जब जीवन में वह क्षण आता है जब कोई व्यक्ति अपने माता या पिता को खो देता है, तो वह केवल एक पारिवारिक घटना नहीं होती; वह व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक जीवन को गहराई से प्रभावित करने वाला अनुभव होता है। ऐसे समय में व्यक्ति की मानसिक स्थिति सामान्य कार्य के अनुकूल नहीं होती।

मनोवैज्ञानिक वास्तविकता क्या है

विश्व स्वास्थ्य संगठन और विभिन्न मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार निकट संबंधी की मृत्यु के बाद व्यक्ति के मानसिक संतुलन, निर्णय क्षमता और कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि इस अवधि में व्यक्ति की उत्पादकता औसतन 30 से 40 प्रतिशत तक घट सकती है। यह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मनोवैज्ञानिक वास्तविकता है।

शोक अवकाश पर स्पष्ट नीति नहीं है

भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से उभर रहा है। देश की कुल कार्यशक्ति 50 करोड़ से अधिक लोगों की है, जिनमें से करोड़ों लोग सरकारी और निजी संस्थानों में कार्यरत हैं। परंतु यह एक विडंबना है कि इतनी बड़ी कार्यशक्ति वाले देश में शोक-अवकाश को लेकर कोई स्पष्ट और सार्वभौमिक नीति नहीं है। अधिकांश संस्थानों में कर्मचारी को अपने जीवन के सबसे कठिन क्षणों में भी आकस्मिक अवकाश या अर्जित अवकाश का सहारा लेना पड़ता है। कई बार तो परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि व्यक्ति को अंतिम संस्कार के तुरंत बाद ही अपने कार्यस्थल पर लौटना पड़ता है। यह स्थिति न तो मानवीय दृष्टि से उचित है और न ही सामाजिक दृष्टि से।

भारतीय परंपरा में 13 दिनों तक शोक-प्रक्रिया 

भारतीय परंपरा में मृत्यु के बाद 13 दिनों तक शोक-प्रक्रिया का पालन किया जाता है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि एक गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक व्यवस्था है। इन तेरह दिनों में परिवार और समाज मिलकर शोकग्रस्त व्यक्ति को भावनात्मक सहारा देते हैं, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कार सम्पन्न होते हैं, और धीरे-धीरे व्यक्ति जीवन की सामान्य लय में लौटने की मानसिक शक्ति प्राप्त करता है। यदि कार्यस्थल की बाध्यता के कारण व्यक्ति इस प्रक्रिया से वंचित हो जाता है, तो उसके मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरे देशों में क्या है व्यवस्था

विश्व के अनेक देशों ने इस मानवीय आवश्यकता को समझते हुए शोक-अवकाश की स्पष्ट व्यवस्था की है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में कर्मचारियों को निकट संबंधी की मृत्यु पर “Bereavement Leave” का अधिकार प्राप्त है। न्यूज़ीलैंड में 2021 में कानून में संशोधन कर गर्भपात या शिशु हानि की स्थिति में भी तीन दिन का शोक-अवकाश सुनिश्चित किया गया। फ्रांस में माता-पिता या जीवनसाथी के निधन पर तीन से सात दिन का अनिवार्य अवकाश दिया जाता है, जबकि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी ऐसे प्रावधान मौजूद हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यही है कि कार्यस्थल की उत्पादकता को मानवता से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इन देशों का अनुभव यह बताता है कि ऐसी व्यवस्थाएँ केवल कर्मचारी कल्याण को ही नहीं बढ़ातीं, बल्कि कार्यस्थलों में विश्वास, सम्मान और उत्पादकता को भी मजबूत करती हैं।

किसी भी संस्था की सबसे बड़ी पूंजी मानव संसाधन

एक शिक्षक और वाणिज्य के विद्यार्थी के रूप में मेरा यह स्पष्ट मत है कि किसी भी संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसका मानव संसाधन होता है। यदि कर्मचारी मानसिक रूप से आहत और अस्थिर अवस्था में काम करने को विवश है, तो वह संस्था के लिए भी दीर्घकालिक रूप से लाभकारी नहीं हो सकता। हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के एक अध्ययन के अनुसार मानसिक तनाव से जूझ रहे कर्मचारियों की कार्यक्षमता औसतन 20 प्रतिशत तक कम हो जाती है और कार्य में त्रुटियों की संभावना भी बढ़ जाती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो शोक-अवकाश केवल संवेदना का विषय नहीं, बल्कि कार्यकुशलता और संस्थागत दक्षता का भी प्रश्न है।

लाखों परिवारों को मिलेगा भावनात्मक संबल

भारत में हर वर्ष लगभग एक करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु होती है। इसका अर्थ है कि लाखों परिवार प्रतिवर्ष ऐसे शोक के दौर से गुजरते हैं। यदि इन परिवारों के सदस्यों को संस्थागत स्तर पर सहारा और समय दिया जाए, तो इससे न केवल उनका मानसिक संतुलन सुरक्षित रहेगा, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि राज्य और संस्थाएं अपने नागरिकों की संवेदनाओं के प्रति सजग हैं।

सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में हो प्रावधान

मेरी यह भी मान्यता है कि शोक-अवकाश की व्यवस्था को केवल सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। यह प्रावधान सरकारी और निजी—दोनों क्षेत्रों में समान रूप से लागू होना चाहिए। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में एक संतुलित और व्यवहारिक नीति बनाई जा सकती है, जिसमें संस्थानों की कार्यात्मक आवश्यकताओं और कर्मचारियों की मानवीय आवश्यकताओं—दोनों का समुचित संतुलन हो।

मानवीय मूल्यों के अनुरूप विकसित हो कार्य-संस्कृति

आज जब देश में सुशासन और संवेदनशील प्रशासन की दिशा में व्यापक प्रयास हो रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी  के नेतृत्व में शासन व्यवस्था जनकल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है, तब यह आवश्यक है कि हमारी कार्य-संस्कृति भी मानवीय मूल्यों के अनुरूप विकसित हो। विकास केवल आर्थिक सूचकांकों का विस्तार नहीं होता; वह समाज की संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा के संरक्षण से भी मापा जाता है।

यदि भारत आज विश्व मंच पर एक सशक्त और नैतिक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहता है, तो हमें अपने प्रशासनिक ढाँचे में भी ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित करनी होंगी जो मानव जीवन की वास्तविकताओं को समझती हों। शोक-अवकाश की व्यवस्था उसी दिशा में एक आवश्यक कदम है।

समय और सम्मान दोनों जरूरी

मेरा विश्वास है कि इस विषय पर व्यापक विमर्श होगा और सरकार, नीति-निर्माता तथा उद्योग जगत मिलकर एक ऐसी व्यवस्था विकसित करेंगे जो करोड़ों भारतीय परिवारों की भावनाओं का सम्मान कर सके। जब कोई व्यक्ति अपने माता-पिता को खोता है, तो वह जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजरता है। ऐसे समय में उसे केवल सांत्वना ही नहीं, बल्कि समय और सम्मान भी मिलना चाहिए।

अंततः किसी राष्ट्र की महानता केवल उसके आर्थिक विकास से नहीं मापी जाती; वह इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह अपने नागरिकों के जीवन के दुखद क्षणों में कितनी संवेदनशीलता से उनके साथ खड़ा रहता है। यदि हम शोक-अवकाश की व्यवस्था को एक अधिकार के रूप में स्थापित कर सकें, तो यह न केवल एक प्रशासनिक सुधार होगा, बल्कि भारत की मानवीय और सांस्कृतिक चेतना का भी सशक्त प्रतीक बनेगा।

 

Topics: parental loss leaveRajya SabhaWork-Life Balanceshok avkashbereavement leave india
डॉ. दिनेश शर्मा
डॉ. दिनेश शर्मा
(डॉ दिनेश शर्मा शिक्षाविद् हैं, वह उ० प्र० के पूर्व उप-मुख्यमंत्री रह चुके हैं, वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं) [Read more]
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