पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव कई मायनों में पूर्व के चुनावों से अलग होने जा रहा है। राज्य में विगत दो लोकसभा चुनावों 2019 और 2024 और 2021 के विधानसभा चुनाव द्विध्रुवीय चुनाव हो गया था। ऐसा लग रहा था कि पश्चिम बंगाल भी राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सरीखे राज्यों की तरह की महज दो दलों भाजपा और तृणमुल कांग्रेस के बीच द्विपक्षीय चुनावी दौर में चला गया है। मगर 2026 के विधानसभा चुनाव में इस बार त्रिकोणीय चुनाव की ओर अग्रसर हैं। 2019 के बाद भाजपा के राज्य की राजनीति में प्रवेश के साथ ही वाम दल और कांग्रेस पार्टी मृतप्राय हो गई और मुस्लिम मतदाताओं के लिए ममता बनर्जी को मत करना मजबूरी बन गया था।
मगर 2026 के विधानसभा चुनाव में हुमायूँ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की गठबंधन ने पश्चिम बंगाल चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है। असदुद्दीन ओवैसी बंगाल में बाहरी माने जाते थे मगर हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन के बाद भाजपा और तृणमूल कांग्रेस को चुनावी टक्कर देते दिख रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच होने वाले इस मुकाबले में असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर खेल बिगाड़ सकता है।
ओवैसी और हुमायूं कबीर के गठबंधन की तैयारी
यह गठबंधन 294 सदस्य पश्चिम बंगाल विधानसभा में 182 सीट पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। इनमें आठ सीटों पर एआईएमआईएम के चुनाव लड़ने की सम्भावना है और शेष 174 सीटों पर हुमायूं कबीर की पार्टी चुनाव लड़ेगी। ओवैसी और हुमायूँ कबीर ने संयुक्त बयान में कहा है कि तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम वोट तो किए, लेकिन समुदाय के लिए कुछ नहीं किया। ओवैसी के अनुसार तृणमूल कांग्रेस में मुसलमानों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। ओवैसी ने कहा कि राज्य में 30 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या मगर सरकार नौकरियों में महज 7 प्रतिशत ही उनका प्रतिनिधित्व है। ओवैसी ने ममता राज में मुस्लिमों की शिक्षा पर भी सवाल उठाये हैं। ओवैसी ने ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का भी आरोप लगाया है।
2021 के चुनावों में कांग्रेस और वाम दलों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था। ऐसे में यह गठबंधन उस खाली राजनीतिक जमीन को भरने की रणनीति पर काम कर रहा है। इस गठबंधन का मुख्य लक्ष्य मुस्लिम बहुल सीटों पर असर डालकर मजबूत तीसरे मोर्चे के रूप में स्थापित करना है। इस गठबंधन ने ममता बनर्जी को कई करने से परेशान कर रखा है। ओवैसी जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों से जुड़े मुद्दे उठाते हैं। वहीं हुमायूं कबीर बंगाल में राज्य स्तरीय मुसलमानों की समस्या को मजबूती देते दिख रहे हैं। ओवैसी और कबीर दोनों के मिलकर चुनाव लड़ने से बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं को एक नया विकल्प मिलता दिख रहा है, क्योंकि वर्तमान में उनके पास मजबूरी में भाजपा के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस को ही मत देना पड़ता था। बंगाल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां का सूपड़ा साफ होने के कारण ममता दीदी मुस्लिम मतदाताओं पर अपना एकाधिकार समझती थी। ऐसे में यह गठबंधन बंगाल की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
ममता के लिए परेशानी की वजह
ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन ममता बनर्जी के लिये उन सीटों पर परेशानी खड़ी कर सकता है, जहाँ मुस्लिम मतदाता बहुतायत में हैं। पश्चिम बंगाल में ऐसी सीटों की संख्या लगभग 65 है और इन सीटों को ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता था। इनमें मुर्शिदाबाद, वीरभूम, उत्तर 24 परगना। दक्षिण 24 परगना और मालदा जैसे मुस्लिम बहुल जिले शामिल है। इस गठबंधन के मजबूती से चुनाव लड़ने से ममता बनर्जी के लिए वैसी सीट जिन पर वो पिछली बार कम मतों के अंतर से जीत दर्ज़ की है। उन सीटों पर ममता बनर्जी की मुस्किलें बढ़ सकती हैं। विगत विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी 37 सीटों पर 10000 से कम मतों के अंतर से जीत दर्ज़ की थी। इनमे तीन सीटों पर एक हज़ार से कम और पांच हज़ार से कम मतों से 13 सीटों पर जीत दर्ज़ की थी।
यह गठबंधन खुद ममता बनर्जी के लिए उनके भबानीपुर विधानसभा की सीट पर भी मुश्किल पैदा करता दिख रहा है, क्योंकि विगत 2024 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस पार्टी महज 8269 मतों से भाजपा से आगे थी। वहीं 2019 के लोकसभा के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस भाजपा से 3168 वोट से आगे थी और 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी भाजपा से पिछड़ गई थी। अतएव यह गठबंधन सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के लिए ही नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के लिए भी मुश्किल हालात पैदा करता दिख रहा है।
इस चुनाव में यह गठबंधन बंगाल की मुस्लिम राजनीति का नया चेहरा प्रस्तुत करने का भी प्रयास करता दिख रहा है। अभी तक ममता बनर्जी के द्वारा ही थोपा गया व्यक्ति मुस्लिम समाज का नेता बनता था। मगर इस बार स्थिति बदलती दिख रही है और हुमायूं कबीर इस कमी को पूरा करने का प्रयास ओवैसी की मदद से करने की ओर बढ़ रहे हैं।
पहले ममता के ही विश्वासपात्र थे हुमायूं कबीर
हुमायूँ कबीर पूर्व में ममता बनर्जी की विश्वस्त विधायक थे और उन्होंने 6 दिसंबर 2025 को अपने इलाके मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने का ऐलान किया था। जिसके बाद भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधा तो ममता बनर्जी ने संभावित नुकसान का आकलन करते हुए हुमायूं कबीर को पार्टी से ही बर्खास्त कर दिया। इसके बाद कबीर ने अपनी पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी का गठन किया। हुमायूँ कबीर की इस मुहिम को ना केवल बंगाल बल्कि, देश भर के मुसलमानों के बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त हुआ और बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए कबीर को पूरे देश से करोड़ों रुपए का चंदा प्राप्त हुआ था। बाबरी मस्जिद की शिलान्यास में मुर्शिदाबाद में लगभग 1 लाख लोगों की मुसलमान शामिल हुए। बाबरी मस्जिद मुहिम का हुमायूं की राजनीति को फायदा मिला मिलता दिख रहा है।
ममता बनर्जी के लिए हुमायूँ कबीर और ओवैसी इसलिए भी चुनौती खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद में 22 विधानसभा की सीटें हैं और इन सभी सीटों पर कबीर का बहुत अच्छा प्रभाव माना जाता है।
विगत विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को इनमें 20 सीट मिला था। हुमायूँ कबीर खुद मुर्शिदाबाद जिले में दो सीटों से चुनाव लड़ने की घोषणा किया है। इतना ही नहीं, बल्कि कबीर का दावा है कि अगर विधानसभा त्रिशंकु बनी तो उनकी पार्टी किंग मेकर बनेगी। खबरों के अनुसार, चुनाव बाद कबीर मुस्लिम उपमुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री पद की मांग भी कर सकते हैं। पश्चिम बंगाल के कुल 294 विधानसभा क्षेत्रों में से 120 से 140 सीटें ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम मतदाता जो है वो हार और जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 46 विधानसभा सीटें तो ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम वोटर की संख्या 50% से भी ज़्यादा है। वहीं 20 सीटों पर मुसलमानों की आबादी 40% से ज्यादा है। जबकि, 30 से 35 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30% से ज्यादा है और 50 सीटों पर मुस्लिम 25% से अधिक है। लोकनीति सीएसडीएस के चुनाव बाद सर्वे के अनुसार, 2021 के विधानसभा चुनाव में करीब 75% मुस्लिम मतदाताओं ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया था और मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर एकतरफा जीत हासिल किया था।

















