ED बनाम ममता बनर्जी: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को लगाई फटकार, “क्या जांच अधिकारी इस देश के नागरिक नहीं?”
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ED बनाम ममता बनर्जी: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को लगाई फटकार, “क्या जांच अधिकारी इस देश के नागरिक नहीं?”

अदालत ने कहा कि इस मामले में केवल प्रवर्तन निदेशालय (ED) एक संस्था के रूप में नहीं है, बल्कि जांच दल के कुछ अधिकारियों ने व्यक्तिगत क्षमता में भी याचिका दायर की है।

Written byजय प्रकाश गुप्ताजय प्रकाश गुप्ता — edited by कुलदीप सिंह
Mar 26, 2026, 01:54 pm IST
inपश्चिम बंगाल
Supreme Court

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ED) और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चल रहा कानूनी विवाद अब एक नई बहस में तब्दील होता दिख रहा है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने बेहद सख्त और महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए जांच एजेंसी के अधिकारियों के अधिकारों पर जोर दिया।

दरअसल, जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार के तर्कों पर असहमति जताई। कोर्ट का मुख्य सवाल यह था कि क्या कोई व्यक्ति सरकारी सेवा में आने के बाद अपने मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) खो देता है?

‘ED, ED, ED’ की रट लगाने से काम नहीं चलेगा

अदालत ने कहा कि इस मामले में केवल प्रवर्तन निदेशालय (ED) एक संस्था के रूप में नहीं है, बल्कि जांच दल के कुछ अधिकारियों ने व्यक्तिगत क्षमता में भी याचिका दायर की है। जस्टिस मिश्रा ने कपिल सिब्बल से चेतावनी भरे लहजे में कहा, “कृपया ED के उन अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करें, जिनके संबंध में अपराध किया गया है। अन्यथा, आप मुख्य मुद्दे से भटक जाएंगे। आप उस दूसरी याचिका को नहीं भूल सकते, जिसे उन व्यक्तिगत अधिकारियों ने दायर किया है, जो इस अपराध के पीड़ित हैं। मैं आपको बता रहा हूं, आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। सिर्फ ‘ED, ED, ED’ की रट न लगाएं।”

क्यों आमने-सामने हैं ममता बनर्जी और ED?

यह पूरा विवाद जनवरी 2026 में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ठिकानों पर हुई छापेमारी से जुड़ा है। ईडी का आरोप है कि पश्चिम बंगाल के कथित कोयला तस्करी मामले की जांच के दौरान जब वह I-PAC के दफ्तर पहुंचे, तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वहां स्वयं मौजूद थीं।

ED के गंभीर आरोप

ईडी का दावा है कि मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के कारण वहां से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हटा लिए गए, जो जांच के लिए बेहद जरूरी थे। साथ ही जांच दल के अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनके कानूनी कर्तव्यों का पालन करने से रोका गया और डराया-धमकाया गया।
आमतौर पर एजेंसियां निचली अदालतों में जाती हैं, लेकिन इस मामले में अधिकारियों ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, यह कहते हुए कि उनके मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है।

कपिल सिब्बल बनाम सुप्रीम कोर्ट

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जांच करना किसी अधिकारी का ‘मौलिक अधिकार’ नहीं बल्कि एक ‘वैधानिक अधिकार’ है। उनका तर्क था कि अगर जांच में बाधा आती है, तो इसके लिए पुलिस या संबंधित कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, न कि सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट आना चाहिए। सिब्बल ने इसे ‘मुसीबतों का पिटारा’ खोलने जैसा बताया।

हालांकि, कोर्ट ने चुनाव का हवाला देकर सुनवाई टालने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस मिश्रा ने स्पष्ट किया कि कोर्ट न तो राजनीति का हिस्सा बनना चाहता है और न ही किसी अपराध का मूकदर्शक।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने देश की जांच एंजेंसियों और राज्य सरकारों के रिश्तों पर नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट की टिप्पणी से लगता है कि राज्य सरकारें अपने रसूख का उपयोग केंद्रीय जांच एजेंसियों की जांच को रोकने के लिए इस्तेमाल करती हैं? अगर ऐसा है तो क्या सुप्रीम कोर्ट इसे रोकने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी कर सकता है। हो सकता है कि अगली सुनवाई में इस संबंध में भी आला अदालत कुछ टिप्पणी या निर्देश दे सकती है। इस केस में आने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में इस तरह की जांचों स्वरूप तय कर सकता है।

Topics: अनुच्छेद 32जांच एजेंसियांarticle 32fundamental rightsinvestigative agenciesIPAC RaidSupreme CourtED vs Mamata Banerjeeसुप्रीम कोर्टCoal Smuggling Caseकपिल सिब्बलपश्चिम बंगाल की राजनीतिKapil SibalIPAC पर छापामौलिक अधिकारED बनाम ममता बनर्जीwest bengal politicsकोयला तस्करी मामला
जय प्रकाश गुप्ता
जय प्रकाश गुप्ता
लेखक करीब एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी पकड़ है। [Read more]
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