असम में गांधी परिवार की पुरानी रणनीति: जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं को दबाकर चाटुकारों को आगे बढ़ाना
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होम भारत असम

असम में गांधी परिवार की पुरानी रणनीति: जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं को दबाकर चाटुकारों को आगे बढ़ाना

रकीबुल हुसैन की ऐतिहासिक जीत के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें उपनेता या व्हिप नहीं बनाया, जबकि गौरव गोगोई को पद मिला। असम में मुस्लिमों के साथ कांग्रेस का दोहरापन और पार्टी से नेताओं का पलायन।

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
Mar 21, 2026, 11:13 am IST
in असम, विश्लेषण

असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को मुस्लिम मतदाताओं के असंतोष का बड़े पैमाने पर सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस पार्टी खुद को मुसलमानों का हितैषी बताने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती है, मगर जब पार्टी में पद या सत्ता में भागेदारी देने की बारी आती है तो गाँधी परिवार केवल अपने शुभचिंतकों, चाटुकारों और शार्गिदों को ही लाभान्वित करती है।

2024 लोकसभा चुनाव में देश में सबसे अधिक मतों के अंतर से असम के धुबरी लोकसभा सीट का चुनाव परिणाम आया जहाँ कांग्रेस पार्टी के रकीबुल हुसैन ने आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के सर्वेसर्वा बदरुद्दीन अजमल को 1012476 मतों के अंतर से शिकस्त दिया था। रकीबुल हुसैन के जीत का अंतर कांग्रेस पार्टी के एक तिहाई से अधिक 34 सांसदों के जीत के अंतर से भी ज्यादा था। इस सीट पर कांग्रेस पार्टी का वोट 2019 में लगभग 29 प्रतिशत था जो 2024 में बढ़कर लगभग दोगुना  60 प्रतिशत हो गया है।

अतएव धुबरी और असम के मुस्लिम वर्ग को उम्मीद थी कि ऐसे प्रदर्शन के कारण रकीबुल हुसैन को लोकसभा में पार्टी का नेता, उपनेता या मुख्य व्हिप में से कोई पद अवश्य दिया जाएगा। रकीबुल हुसैन को इन पदों का पूर्व का भी अनुभव था और सांसद बनने से पूर्व रकीबुल हुसैन असम विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के उपनेता थे। रकीबुल हुसैन 2001 के लगातार सामगुरी विधानसभा सीट से बड़े मतों के अंतर से विधायक निर्वाचित हो रहे थे। 2011 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने असम के दो बार के मुख्यमंत्री प्रफ्फुल कुमार महंता को इस सीट पर 19980 मतों के अंतर से हराया था। मगर गांधी परिवार ने रकीबुल हुसैन के बदले असम के जोरहाट लोकसभा सीट के निर्वाचित गौरव गोगोई को लोकसभा में पार्टी का उपनेता नियुक्त कर दिया था। गौरव गोगोई को यह पद सिर्फ गांधी परिवार से नजदीकी होने के कारण दिया गया था।

धुबरी सीट की खास बात

असम की धुबरी लोकसभा सीट को 2009 से बदरुद्दीन अजमल लगातार तीन बार अच्छे अंतर से जीत रहे थे। इस सीट की खास बात यह है कि 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में इस सीट पर देश में सर्वाधिक 88.36, 90.66 और 92.08 प्रतिशत मतदान दर्ज़ किया गया था। 2009 में धुबरी लोकसभा सीट पर मतदान प्रतिशत 76 प्रतिशत था, जो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद एकाएक बढ़ जाना भी आश्चर्जनक है। गाँधी परिवार की यह लम्बे समय से नीति रही है कि वो जनाधार वाले नेता के बदले अपने चाटुकारों को ही दल में आगे बढ़ाया जाए, जिससे कि परिवार की स्थिति पार्टी में हमेशा सर्वोपरि बनी रहे। यह परिवार किसी भी जनाधार वाले नेता को इस कारण पार्टी में आगे नहीं बढ़ने देती है। ताकि कहीं वो भविष्य में उनके लिए किसी भी तरह की चुनौती खड़ी नहीं कर सके। गाँधी परिवार की इस नीति के कारण कई बड़े नेताओं को पार्टी से अलग होकर अपना दल बनाना पड़ा या किसी अन्य दल के साथ जुड़ना पड़ा।

इसे भी पढ़ें: भारत ने अफगानिस्तान को दी संजीवनी : पाकिस्तानी हमले के पीड़ितों को भेजी दवा और चिकित्सा सहायता

रकीबुल हुसैन को कांग्रेस पार्टी ने दिया धोखा

कांग्रेस पार्टी और गाँधी परिवार को रकीबुल हुसैन के साथ किये गए नाइंसाफी पर असम की जनता का फैसला रकीबुल हुसैन के द्वारा खाली की गई सामगुरी सीट पर हुए उपचुनाव में ही देखने को मिला जब कांग्रेस उम्मीदवार तंज़ील हुसैन को बड़े मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस पार्टी का 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से खुद का प्रयास रहा है कि रकीबुल हुसैन के बड़े जीत को कमतर करके दिखाया जाए, क्योंकि इससे राहुल गांधी और पार्टी के अन्य नेताओं का चुनावी प्रदर्शन सीमित हो जाएगा। कांग्रेस पार्टी का कोई भी प्रवक्ता रकीबुल हुसैन के प्रकरण को नहीं उठाता है।

मुस्लिमों को कांग्रेस ने दिया धोखा

रकीबुल हुसैन असम के एकमात्र मुस्लिम नेता नहीं हैं, जिन्हें कांग्रेस पार्टी या गाँधी परिवार के राजनीतिक दोहरापन का समाना करना पड़ा हो। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने बरपेटा लोकसभा सीट से अपने मौजूदा सांसद अब्दुल खालिक का टिकट काट कर नए उम्मीदवार दीप बायन को उम्मीदवार बनाया था। बरपेटा के तत्कालीन सांसद अब्दुल खालिक पर किसी प्रकार का कोई आरोप भी नहीं था, इसके बावजूद भी, उन्हें गाँधी परिवार और पार्टी के दोहरी नीति का शिकार होना पड़ा। बरपेटा लोकसभा सीट पर 2024 के पूर्व कांग्रेस पार्टी ने सिर्फ़ मुसलमानों को ही अपना उम्मीदवार बनाया था।

यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने इस सीट पर अपने सहयोगी दलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने की स्थिति में सिर्फ़ मुसलमानों को ही उम्मीदवार बनवाया था। मगर असम में परिसीमन के बाद इस सीट में आये मतदाता बदलाव के कारण अब्दुल खालिक का इस सीट से उम्मीदवारी ख़ारिज कर दिया गया। यह दर्शाता है कि कांग्रेस पार्टी का मुस्लिमों के प्रति प्रेम केवल एक छलावा और चुनाव जीतने का एक जुगत भर है। कांग्रेस पार्टी को मुस्लिमों के विकास से कोई लेना देना नहीं है। बरपेटा सीट पर इस बार भाजपा की सहयोगी असम गण परिषद ने जीत दर्ज़ किया है। जबकि 1998 से या तो कांग्रेस पार्टी या आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट लगातार जीत दर्ज़ कर रही थी।

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अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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