ऑनलाइन फ्रॉड आजकल तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बात कही है। कोर्ट ने इसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा ही गंभीर करार दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इंटरनेट मीडिया पर कुछ ऐसी संस्थाएं या लोग काम कर रहे हैं, जो कि मीडियाकर्मी या पत्रकार बनकर लोगों को लूटते हैं। कोर्ट ने इसे डिजिटल अरेस्ट करार दिया है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इंटरनेट ब्लैकमेलिंग पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि इंटरनेट मीडिया पर कुछ ऐसी संस्थाएं या लोग काम कर रहे हैं, जो खुद को पत्रकार या मीडियाकर्मी बताकर ब्लैकमेल करते हैं। ये लोग ठीक वैसे ही धोखा देते हैं जैसे डिजिटल अरेस्ट करने वाले फ्रॉडस्टर करते हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने कहा कि कुछ टैबलाइड और दूसरे प्लेटफॉर्म चलाने वाले लोग ब्लैकमेलर की तरह व्यवहार करते हैं। इस पर CJI सूर्यकांत ने तुरंत सहमति जताई और बोले, “यह डिजिटल अरेस्ट जैसी ही किसी चीज का दूसरा रूप है।” उन्होंने यह भी अफसोस जताया कि दुर्भाग्य से अभी कानून में इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा गया है।
क्या है पूरा मामला
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम की पुलिस पर सवाल उठाए गए थे। इन राज्यों की पुलिस अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम हैंडल या पेज पर आरोपितों की ऐसी तस्वीरें और शॉर्ट वीडियो डालती है, जिनमें लोग हथकड़ी लगाए, रस्सी से बंधे, लाठियों से पीटे जाते, घुटनों पर बैठे, घसीटे जाते या सीढ़ियों से खींचे जाते दिखते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह तरीका आरोपित के मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है और उन्हें पहले से ही दोषी साबित कर देता है।
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कोर्ट ने क्या कहा या किया?
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे एक दूसरे मामले के नतीजे का इंतजार करें। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सभी राज्यों की पुलिस को एक मैनुअल या नियमावली लागू करने का आदेश दिया था। इस नियमावली में दिशानिर्देश हैं कि पुलिस को आरोपित के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली कोई भी सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं करनी चाहिए।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी इजाजत दी कि वे एक नई और ज्यादा विस्तार वाली याचिका दायर कर सकते हैं। इसमें यह जानकारी डाली जाए कि कितने राज्यों ने कोर्ट के पुराने आदेशों का पालन किया है और कितनों ने नहीं।
पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग पर टिप्पणी
जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा कि पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग का दायरा अब सिर्फ पुराने तरीकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह इंटरनेट मीडिया हैंडल्स तक भी बढ़ना चाहिए क्योंकि आजकल जानकारी फैलाने का मुख्य जरिया यही प्लेटफॉर्म बन गए हैं। उन्होंने इंटरनेट मीडिया से आने वाली नई चुनौतियों का भी जिक्र किया, जैसे पॉडकास्ट और दूसरे नए फॉर्मेट।
















