सुप्रीम कोर्ट ने नफरती भाषणों पर दायर एक जनहित याचिका को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाते हुए इसे ‘पक्षपाती’ बताया है। दरअसल, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा दिए जाने वाले विवादित बयानों को नियंत्रित करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ताओं की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए। सीजेआई सूर्य कांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जॉयमल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका किसी भी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बनेगी।
क्या था मामला?
देश के 12 व्यक्तियों, जिनमें पूर्व नौकरशाह नजीब जंग, हर्ष मंदर और जॉन दयाल जैसे नाम शामिल थे, ने एक याचिका दायर की थी। उनकी मांग थी कि मुख्यमंत्री, मंत्री और नौकरशाह जैसे पदों पर बैठे लोगों के लिए सार्वजनिक भाषणों हेतु विशेष दिशा-निर्देश तय किए जाएं। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि देश का माहौल ‘जहरीला’ हो गया है और इसे सुधारने के लिए अदालती हस्तक्षेप जरूरी है।
कोर्ट ने क्यों जताई आपत्ति?
अदालत ने पाया कि याचिका में कथित हेट स्पीच के उदाहरण के तौर पर केवल भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों (जैसे योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा) और कुछ केंद्रीय मंत्रियों के नाम दिए गए थे। कोर्ट ने इसे ‘सिलेक्टिव’ दृष्टिकोण बताया।
कोर्ट की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह याचिका निश्चित रूप से कुछ खास लोगों को निशाना बना रही है, जबकि हेट स्पीच देने वाले अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को इसमें पूरी तरह छोड़ दिया गया है।
सीजेआई ने कहा कि यदि कोई गाइडलाइन बनती है, तो वह देश के सभी राजनीतिक दलों और पदाधिकारियों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। राजनीति का शोर-शराबा जनहित याचिका का आधार नहीं हो सकता। जस्टिस नागरत्ना ने एक बहुत ही मार्मिक बात कही। उन्होंने पूछा कि क्या अदालत के आदेश से किसी व्यक्ति की सोच या विचार प्रक्रिया को बदला जा सकता है? उन्होंने कहा कि समाधान राजनीतिक दलों के भीतर से आना चाहिए, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और भाईचारे को बढ़ावा दें।
याचिका की दो मांगें
सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के भाषण ‘संवैधानिक नैतिकता’ के अधीन हों। ऐसे भाषणों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम हों ताकि वे दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन न करें।
अब आगे क्या?
याचिका में असम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री सहित कई नेताओं का जिक्र था। जस्टिस बागची ने इसे एक ‘लोकलुभावन कवायद’ करार दिया। जब कपिल सिब्बल ने महसूस किया कि पीठ याचिका की भाषा से संतुष्ट नहीं है, तो उन्होंने व्यक्तियों के संदर्भ हटाने और याचिका में संशोधन करने की अनुमति मांगी। कोर्ट ने उन्हें दो सप्ताह का समय दिया है और स्पष्ट किया है कि केवल एक संशोधित और निष्पक्ष याचिका पर ही आगे विचार किया जाएगा।















