अफगानिस्तान के नागरिकों पर हमले पर चुप्पी क्यों? मारे गए अफगानी बच्चों और महिलाओं पर रमजान माह में भी कोई विमर्श नहीं
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अफगानिस्तान के नागरिकों पर हमले पर चुप्पी क्यों? मारे गए अफगानी बच्चों और महिलाओं पर रमजान माह में भी कोई विमर्श नहीं

वे महिलाओं की हत्या पर शोक नहीं मनाना चाहते, वे केवल एजेंडा चलाना चाहते हैं, क्योंकि यदि लड़कियों की पीड़ा ही उद्देश्य या ध्येय होता तो जनवरी में ईरान के शासन के हाथों मारी गई लड़कियों के लिए भी कुछ बोलते।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Mar 20, 2026, 06:56 pm IST
in विश्लेषण
Pakistan attack on Afghanistan

अफगानिस्तान में नागरिकों पर हमले को लेकर चुप्पी क्यों

पश्चिम एशिया में जहां संघर्ष की स्थिति है, वहीं भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच भी झड़पें जारी हैं। पाकिस्तान ने सीमा लांघते हुए अफगानिस्तान के नागरिकों की हत्या की। पिछले महीने फरवरी में पाकिस्तान ने ग़ज़ब लिल हक अभियान आरंभ किया था, तो उसमें संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार इस अभियान में अफगानिस्तान में जो नागरिक मारे गए थे उनमें महिलाओं और बच्चों की संख्या बहुत अधिक थी। यह हमला रमजान के महीने में हुआ।

यह भी दुर्भाग्य की बात है कि शोक भी बहुत सिलेक्टिव हो गए हैं। जहां ईरान में ईरानी शासन के हाथों मारी जा रही लड़कियों और महिलाओं के शवों पर जिस वर्ग ने झूठे आंसू भी नहीं बहाए थे, वह वर्ग अमेरिका के हमले में मारी गई ईरानी छात्राओं पर विलाप कर रहा था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस वर्ग के लिए लड़कियां महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनके लिए केवल अपना एजेंडा महत्वपूर्ण है। वे लोग नहीं चाहते हैं कि लड़कियों या महिलाओं की हत्याओं पर बात हो।

केवल एजेंडा चलाना चाहते हैं

वे महिलाओं की हत्या पर शोक नहीं मनाना चाहते, वे केवल एजेंडा चलाना चाहते हैं, क्योंकि यदि लड़कियों की पीड़ा ही उद्देश्य या ध्येय होता तो जनवरी में ईरान के शासन के हाथों मारी गई लड़कियों के लिए भी कुछ बोलते।

यदि बच्चे ही उद्देश्य होते तो उन बलूच बच्चों पर भी आवाज उतनी ही बुलंद होती, जो पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों का शिकार हो रहे हैं। हिन्दू किशोरियां भी उनकी आवाज के दायरे में आतीं, जिन्हें पाकिस्तान और बांग्लादेश में मजहब के नाम पर यौन हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ।

यूएन की रिपोर्ट क्या कहती है 

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के नागरिकों पर भी हमले किये थे और इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी मारी गईं। यूनाइटेड नेशंस असिस्टेंट मिशन इन अफगानिस्तान द्वारा नई रिपोर्ट में यह कहा गया था कि 26 फरवरी की शाम से 5 मार्च तक पाकिस्तान के साथ सीमपार की मुठभेड़ और गोलाबारी में अफगानिस्तान में 185 नागरिक मारे गए थे। जो पीड़ित थे, उसमें महिलाएं और बच्चे थे। इसके अनुसार “इस अवधि में मारे गए अधिकतर नागरिक (55%) महिला और बच्चे थे।“

अफगान बच्चों के लिए कोई विमर्श नहीं

रिपोर्ट में आगे है कि 27 फरवरी को पकिता प्रांत के बरमल जिले में हुए हवाई हमले में 14 नागरिक मारे गए थे, जिनमें दो लड़कियां, पांच लड़के और तीन पुरुष थे। मगर यह अफसोस की बात है कि इन अफगानी बच्चों के लिए कोई भी विमर्श पैदा नहीं हुआ। यह और भी हैरानी की बात है कि यह वही तालिबान सरकार है, जिसके आने पर पाकिस्तान में भी जश्न मना था और भारत के कथित प्रगतिशील वर्ग में भी, जिसके अनुसार तालिबान ने अमेरिका को उसकी औकात दिखा दी थी।

मगर अब जब पाकिस्तान अफगानिस्तान पर लगातार हमले कर रहा है और उसके नागरिकों को मार रहा है, तो ऐसे में वे लोग कहां गायब हो गए हैं, जो तालिबान का स्वागत करने में सबसे आगे थे।

अफगानिस्तान में नशामुक्ति केंद्र पर हमले को लेकर भी चुप्पी

16 मार्च की रात को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के काबुल में एक नशामुक्ति केंद्र पर हमला किया। जिसमें कथित रूप से 400 लोग मारे गए और 259 से ज्यादा घायल हो गए। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा कि काबुल में नशा मुक्ति केंद्र पर हुए इस जघन्य हमले की उचित, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए और जो भी इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अंतर्गत दंड दिया जाना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत, नागरिकों और नागरिक संपत्तियों को कड़ा संरक्षण प्राप्त है। युद्ध के कानून स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करते हैं कि किसी भी हमले को ‘भेदभाव’, ‘अनुपात’ और ‘सावधानी’ के मूलभूत सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून चिकित्सा सुविधाओं के लिए विशेष और अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है।“

उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में जो सीमापार की झड़पें चल रही हैं, उनसे नागरिक प्रभावित हो रहे हैं, पाकिस्तान में भी कई लोगों को अपने घर छोड़कर जाना पड़ा और स्कूल बंद हैं। मगर पाकिस्तान की क्रूरता पर उन्होंने बोलना उचित नहीं समझा। इसी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन के डायरेक्टर जनरल ने भी शांति की बात की और पाकिस्तान द्वारा की गई इस जघन्य हिंसा की घटना की निंदा तो की, परंतु पाकिस्तान का नाम लेने से बचे।

तालिबान का स्वागत करने वाले भी चुप

पाकिस्तान लगातार ही अफगानिस्तान के आम नागरिकों को निशाना बना रहा है, मगर यह हैरानी की बात है कि भारत जैसे देश में, जहां पर तालिबान की सरकार का स्वागत एक बहुत बड़े वर्ग ने किया था, अब वही वर्ग पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के नागरिकों पर हुए इस हमले पर लगातार ही मौन साधे हुए है, तो क्या उनके लिए अफगानी नागरिक केवल तभी चर्चा का केंद्र हैं, जब अमेरिका कुछ करे? क्या पाकिस्तान द्वारा किये गए हमले और अफगानी नागरिकों की मौत उनके लिए मायने नहीं रखती है?

ईरान में स्कूल पर हुए हमलों में बच्चियों का सहारा लेकर वे केवल अमेरिका और इजरायल पर निशान साध सकते हैं। मगर वे लोग न ही ईरान के तानाशाही शासन के क्रूर नियमों के चलते मर रही लड़कियों पर बोलते हैं और न ही पाकिस्तान के हाथों मरते अफगानिस्तान के नागरिकों पर कुछ बोल रहे हैं? आखिर ये चुप्पी क्या कहलाती है?

 

Topics: अफगानी नागरिकों पर हमलातालिबान और पाकिस्तानबलूच बच्चों पर अत्याचारईरान में महिला अधिकारकाबुल नशामुक्ति केंद्र हमलाअंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनसीमा पार गोलाबारीपाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्षunamaसंयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट
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