बहुत पहले एक गीत आया था “राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते”, दरअसल जब यह गीत आया था तो इसके कई सांकेतिक अर्थ भी थे जिन्होंने यह फिल्म देखी है वह पुराने लोग और आज के जमाने के नए लोग इस बात को गहराई से समझते ही होंगे किंतु जब घटना काशी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार पार्टी करने की हो, तब इस गीत के बोल के अर्थ को ओर गहराई से समझा जा सकता है।
यह गीत आज के समय में भारतीय समाज की चेतना पर लगा वह आईना है, जिसमें समय-समय पर हमारी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। हद तो ये है कि काशी में गंगा की धारा के बीच नाव पर आयोजित इफ्तार पार्टी करने के बाद कथित रूप से मांसाहार के अवशेष गंगा में फेंक दिए गए।
घटना और सामाजिक प्रश्न
देखा जाए तो यह घटना सीधे तौर पर आस्था, संवेदनशीलता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक मर्यादा के बीच संतुलन की कसौटी बन गया है और यह बताता है कि हिन्दू आस्था पर कैसे-कैसे चोट की जा रही है। वाराणसी की इस घटना में पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ्तार किया। किंतु प्रश्न इससे एक समुदाय (इस्लाम) के व्यवहार के प्रश्न का भी है और साथ में हम सभी के उत्तरदायित्व का भी कि उस पवित्र धारा (गंगा) के प्रति जिम्मेदारी का भाव हमारे भीतर कितना गहन है।
वास्तव में जिसे करोड़ों लोग “मां” के रूप में पूजते हैं। उसमें अपनी जूठन डालना, मांसाहार के अवशेष गिराना कैसे सही हो सकता है? सभी को समझना होगा कि गंगा के प्रति यह ‘मां’ का भाव सिर्फ धार्मिकता के आधार पर ही नहीं है, इसके पीछे अनेक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक आधार भी मौजूद हैं।

धार्मिक ग्रंथों में गंगा का महत्व
गंगा को लेकर भारतीय परंपरा में जो श्रद्धा है, उसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में बार-बार मिलता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है, “गंगाजल स्पर्श मात्र से ही पापों का नाश होता है और आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।” (अध्याय 10, श्लोक 32)। इसी प्रकार वाल्मीकि रामायण में गंगा को “त्रिपथगा” कहा गया है, जो तीनों लोकों में बहती है और जीवन को पवित्र करती है। लेकिन गंगा की महिमा सिर्फ धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी इसके जल की विशेषताओं पर गहन अध्ययन किया है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. डी.एस. भार्गव अपनी पुस्तक “गंगा वाटर पॉल्यूशन” में लिखते हैं कि “गंगा जल में अद्भुत आत्मशुद्धि क्षमता (सेल्फ-प्यूरिफिकेशन कैपेसिटी) है, जो अन्य नदियों में सामान्यतः नहीं पाई जाती।” (डी.एस. भार्गव, गंगा वाटर पॉल्यूशन, 1985, पृष्ठ 45)।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: बैक्टीरियोफेज का महत्व
इसी संदर्भ में ‘फेलिक्स डी’हेरल’ जो बैक्टीरियोफेज पर अपने शोध के लिए प्रसिद्ध हैं, ने गंगा जल पर अध्ययन करते हुए लिखा, “गंगा का जल रोगजनक जीवाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत क्षमता रखता है।” (फेलिक्स डी’हेरल, द बैक्टीरियोफेज, 1926, पृष्ठ 112)। वस्तुत: फेलिक्स डी’हेरल (1873-1949) वह प्रसिद्ध फ्रांसीसी-कनाडाई सूक्ष्मजीवविज्ञानी हैं, जिन्हें बैक्टीरियोफेज की खोज और उनके शोध के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है।1917 में, पास्चर संस्थान में काम करते हुए, उन्होंने ही इन “जीवाणु खाने वाले” बैक्टीरियोफेज की खोज की और उसे ये नाम दिया था।
गंगा जल की वैज्ञानिक विशेषताएं
यह संयोग नहीं है कि सदियों से गंगा जल को अमृत तुल्य माना गया। वैज्ञानिक दृष्टि से इसमें पाए जाने वाले बैक्टीरियोफेज और उच्च ऑक्सीजन धारण क्षमता इसे विशिष्ट बनाती है। डॉ. जे.सी. अग्रवाल ने अपनी पुस्तक “वाटर क्वालिटी ऑफ द गंगा रिवर” में उल्लेख किया, “गंगा जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे यह स्वयं को शुद्ध बनाए रखता है।” (1996, पृष्ठ 78)।
व्यवहार और जिम्मेदारी पर प्रश्न
ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि जिस धारा को धर्म और विज्ञान दोनों ने विशेष माना, उसमें इस प्रकार का व्यवहार कितना उचित है? क्या इसे “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” कहकर टाला जा सकता है? वाराणसी की घटना में जो सबसे गंभीर पहलू सामने आया, वह फिर कहना होगा कि “इफ्तार का आयोजन नहीं होकर गंगा की धारा में मांसाहार करना और उसके अवशेष फेंकना है।” यहां यह समझना आवश्यक है कि हिंदू परंपरा में गंगा सिर्फ जल न होकर “जीवंत सत्ता” है। यही कारण है कि अंतिम समय में गंगाजल पिलाने की परंपरा है, क्योंकि यह आत्मा की शुद्धि का माध्यम मानी गई है।
प्रदूषण और वैज्ञानिक चेतावनी
गंगा की पवित्रता का एक और वैज्ञानिक पक्ष भी है। डॉ. बी.डी. त्रिपाठी अपनी पुस्तक “एनवायरनमेंटल स्टडीज ऑन रिवर गंगा में इस संदर्भ को विस्तार से लिखते हुए बताते हैं कि “गंगा की धारा में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीव जैविक अपशिष्ट को तोड़ने में सक्षम होते हैं, किंतु अत्यधिक प्रदूषण इसकी क्षमता को भी समाप्त कर सकता है।” (2008, पृष्ठ 134)। ऐसे में निश्चित तौर पर डॉ. बी.डी. त्रिपाठी का यह अध्ययन एवं शोधपूर्ण कथन इस बात की ओर संकेत करता है कि गंगा की आत्मशुद्धि क्षमता असीमित नहीं है। यदि लगातार प्रदूषण बढ़ता रहा, तो यह विशेषता भी समाप्त हो सकती है।
सामाजिक प्रतिक्रिया और मतभेद
इस पूरे विवाद का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि मुस्लिम समाज के जिम्मेदार लोगों ने भी इस कृत्य की आलोचना की है। वाराणसी के अंजुमन इंतजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव एसएम यासीन ने इसे इस्लाम के विरुद्ध बताया है। दूसरी ओर घटना के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। कुछ लोगों ने इसे सामान्य घटना बताते हुए सवाल उठाए कि इसमें अपराध क्या है?
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत का सवाल है कि आखिर इन मुस्लिम लोगों ने कौन-सा कानून तोड़ा है? इनका पाप क्या है? किंतु उन्हें भी ये समझना होगा कि कानून सिर्फ कार्य को नहीं, उसके प्रभाव को भी देखता है। धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना, सार्वजनिक जल स्रोत को प्रदूषित करना और सामाजिक तनाव उत्पन्न करना, वस्तुत: ये सभी गंभीर मुद्दे हैं। समस्या यहां गंगा नदी में मांस खाने से है। गंगा नदी को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र नदी है, जिसकी आराधना देवी के रूप में होती है। यह पाप नाशिनी और मोक्ष प्रदाता है।
अस्थि विसर्जन बनाम भोजन अवशेष
कुछ लोगों ने इस घटना के समर्थन में यह तर्क दिया कि जब गंगा में अस्थियां विसर्जित की जाती हैं, तो हड्डियां फेंकने में क्या अंतर है। यह तर्क कितना सतही है, वह उस सोचनेवाले की बुद्धि से पता चलता है, वस्तुत: धार्मिक और सांस्कृतिक समझ की कमी को भी यह दर्शाता है।
गरुड़ पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि अस्थि विसर्जन एक संस्कारित प्रक्रिया है, जो विधि-विधान और मंत्रों के साथ संपन्न की जाती है, ताकि आत्मा को मोक्ष प्राप्त हो (गरुड़ पुराण, अध्याय 7, पृष्ठ 89)। इसके विपरीत भोजन के अवशेष फेंकना सीधे गंगा में प्रदूषण फैलाना और पैदा करना है, जिसका कोई धार्मिक औचित्य नहीं है।
सहिष्णुता और जिम्मेदारी
यह सच है कि भारत की पहचान उसकी सहिष्णुता है। यहां विभिन्न पंथों और परंपराओं का सहअस्तित्व है। किंतु सहिष्णुता का अर्थ यह नहीं कि आस्था का अपमान सह लिया जाए। मुसलमानों की इस इफ्तार पार्टी के समर्थन में जो बोल रहे हैं उन्हें समझना होगा कि अधिकार और जिम्मेदारी दोनों साथ-साथ चलते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का प्रयोग करता है, तो उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि उसका व्यवहार किसी अन्य की गहरी आस्था को आहत न करे।
आत्ममंथन का अवसर
अंततः यह घटना हमें आत्ममंथन का अवसर देती है। सभी ये समझें कि गंगा भारतीय सभ्यता की जीवनरेखा है। इसकी पवित्रता सिर्फ धार्मिक मान्यता तक सीमित न होकर वैज्ञानिक सच्चाई भी है। इसलिए ही “राम तेरी गंगा मैली…” की पंक्ति आज फिर गूंजती है, जिसमें वर्तमान समाज के प्रति गंगा की शिकायत भी है और उसकी चेतावनी भी कि यदि हमने अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों का सम्मान नहीं किया, तो हम सिर्फ इतिहास में ही उन्हें खोजते रह जाएंगे।
वस्तुत: हम यह समझें कि गंगा को स्वच्छ रखना हर नागरिक का कर्तव्य है। आस्था, विज्ञान और संवेदनशीलता, इन तीनों के संतुलन से ही गंगा की पवित्रता बनी रह सकती है। बात यहां हिन्दू-मुस्लमान या अन्य किसी मत-पंथ की नहीं है, गंगा की पवित्रता की है, जिसे बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।














