मिरगपुर गांव : पावन परंपराओं का पालना
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मिरगपुर गांव : पावन परंपराओं का पालना

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले का मिरगपुर गांव अपनी अनोखी परंपरा के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। 700 वर्षों से यहां के लोग न शराब पीते हैं, न मांसाहार करते हैं और न ही प्याज-लहसुन का सेवन करते हैं।

Written byआदित्य भारद्वाजआदित्य भारद्वाज
Mar 18, 2026, 10:42 am IST
inविश्लेषण, उत्तर प्रदेश
गांव में स्थित बाबा फकीरा दास की प्रतिमा

गांव में स्थित बाबा फकीरा दास की प्रतिमा

भारत के गांव अपनी परंपराओं और जीवन मूल्यों के कारण अलग पहचान रखते हैं। कहीं गांव अपनी खेती के लिए प्रसिद्ध हैं तो कहीं अपने सख्त सामाजिक नियमों के लिए। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित मिरगपुर गांव भी ऐसी ही एक अनोखी पहचान रखता है। इस गांव के बारे में जानकर लोग अक्सर हैरान रह जाते हैं। यहां के निवासी पिछले कई सौ वर्षों से न तो शराब का सेवन करते हैं और न ही मांस-मछली खाते हैं। इतना ही नहीं, गांव में प्याज और लहसुन का उपयोग भी नहीं किया जाता। अपनी इसी अनूठी परंपरा के कारण मिरगपुर का नाम एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया जा चुका है।

सहारनपुर जिले में बसे मिरगपुर गांव की आबादी करीब 10 हजार के आसपास है। इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद यहां नशा और मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित है। गांव में कोई भी व्यक्ति शराब नहीं पीता और न ही कोई नॉनवेज भोजन करता है। इसके साथ ही यहां के लोग प्याज और लहसुन का सेवन भी नहीं करते। गांव में बीड़ी, सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों का इस्तेमाल भी पूरी तरह वर्जित है।

मिरगपुर की इसी अनोखी परंपरा के कारण यहां कुल 26 प्रकार की चीजों के सेवन पर रोक है, जिनमें लहसुन, प्याज, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, शराब और मांसाहार जैसी चीजें शामिल हैं। इस विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था की वजह से पहले इस गांव का नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ और बाद में एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी इसे स्थान मिला। जिला प्रशासन ने भी मिरगपुर को नशामुक्त गांव के रूप में मान्यता दी हुई है। स्थानीय लोगों के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत सैकड़ों वर्ष पहले हुई थी। बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी के आसपास राजस्थान के चुरु से एक संत, बाबा फकीरदास, इस क्षेत्र में आए थे। उन्होंने यहां तपस्या की और गांव के लोगों को मांस-मदिरा तथा नशे से दूर रहने का संदेश दिया। गांव के पूर्वजों ने उनसे यह वचन लिया कि वे इन चीजों का सेवन नहीं करेंगे। उसी समय से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती चली आ रही है।

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि लगभग 700 वर्ष पहले बाबा फकीरा दास ने मिरगपुर को अपना निवास स्थान बनाया था। उन्होंने गांव के लोगों को संयमित और सात्विक जीवन अपनाने की शिक्षा दी। इसी के तहत नशे, मांसाहार और प्याज-लहसुन से दूरी बनाए रखने की परंपरा शुरू हुई, जिसका पालन आज भी गांव के लोग पूरी निष्ठा से करते हैं। बाबा फकीरा दास महाराज मंदिर के महंत मनोहर दास बताते हैं कि कुछ लोगों ने इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। इसी कारण गांव के लोग आज भी इन नियमों का सख्ती से पालन करते हैं। गांव में नशे पर पूरी तरह प्रतिबंध है। उनके अनुसार लगभग 1700 ईस्वी के आसपास बाबा फकीरा दास यहां आए थे और तभी से गांव में यह नियम लागू है। आज तक यह परंपरा यहां पर कायम है। नशा जागरूकता के संदर्भ में यह गांव युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। अपनी इसी विशेषता के कारण मिरगपुर को एक आदर्श गांव माना जाता है और वर्ष 2022-23 में इसे एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान भी मिला। मिरगपुर जैसे गांव समाज के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं।

Topics: पावन परंपराएंआध्यात्मिक प्रणेताबाबा फकीरा दाससात्विक शिक्षाबाबा फकीरा दास मंदिरगुरु-शिष्य परंपरामांसाहार निषेधशराब बंदीतंबाकू मुक्तपाञ्चजन्य विशेषआध्यात्मिक अनुशासनआदर्श ग्रामसामुदायिक एकतामिरगपुर गांवपीढ़ी-दर-पीढ़ी पालनशामुक्त गांवगुरु हमारे गांव
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