लापोड़िया गांव : जल, जंगल और जीवों का संरक्षण
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लापोड़िया गांव : जल, जंगल और जीवों का संरक्षण

लापोड़िया गांव जल संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन का एक सफल मॉडल बन चुका है। इस छोटे से गांव ने यह साबित कर दिया है कि यदि समाज संगठित होकर प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले, तो सूखे और संकटग्रस्त क्षेत्रों में भी जीवन और हरियाली लौटाई जा सकती है

Written byडॉ. ईश्वर बैरागीडॉ. ईश्वर बैरागी
Mar 17, 2026, 10:58 pm IST
in विश्लेषण, पर्यावरण, राजस्थान
लापोड़िया में लौटी हरियाली

लापोड़िया में लौटी हरियाली

राजस्थान के शुष्क इलाकों में बसे अधिकांश गांव पानी की कमी, बंजर भूमि और पलायन जैसी समस्याओं से जूझते रहे हैं, लेकिन जयपुर जिले का लापोड़िया गांव इन चुनौतियों के बीच उम्मीद की मिसाल बनकर उभरा है। जल संरक्षण, देशी गायों के संरक्षण और जैव विविधता के प्रति सामाजिक संवेदनशीलता के कारण यह गांव देश के अन्य गांवों से अलग पहचान बना चुका है। जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव कभी पानी के गंभीर संकट और सूखे से जूझता था।

गांव की तस्वीर बदलने की शुरुआत तब हुई, जब यहां के युवा लक्ष्मण सिंह ने जल संकट को दूर करने का संकल्प लिया। उस समय वे जयपुर में पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन गांव की स्थिति देखकर उन्होंने गांव लौटकर काम करने का निर्णय लिया। उन्होंने सबसे पहले पुराने तालाबों और जल संरचनाओं की मरम्मत का अभियान शुरू किया और ग्रामीणों को श्रमदान के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में कुछ ही लोग साथ आए, लेकिन धीरे-धीरे पूरा गांव इस प्रयास से जुड़ गया।सामूहिक श्रम से गांव का तालाब ठीक किया गया और बारिश के बाद कुंओं में फिर से पानी लौट आया। इस सफलता ने ग्रामीणों का आत्मविश्वास बढ़ाया। इसके बाद गांव में जल संरक्षण को स्थायी रूप देने के लिए कई नई जल संरचनाएं विकसित की गईं। ‘अन्न सागर’ तालाब को सिंचाई के लिए, ‘फूल सागर’ को भूजल संरक्षण के लिए और ‘देव सागर’ को पर्यावरण तथा सामुदायिक उपयोग के लिए विकसित किया गया। इन प्रयासों से गांव में वर्षा का पानी रुकने लगा और भूजल स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

लापोड़िया की पहचान यहां विकसित ‘चौका प्रणाली’ से भी जुड़ी है। यह वर्षा जल संरक्षण की पारंपरिक तकनीक है, जिसमें जमीन की ढलान के अनुसार चौकोर आकार के छोटे-छोटे हिस्से बनाकर मिट्टी की मेड़ें तैयार की जाती हैं। वर्षा का पानी इन चौकों में रुककर धीरे-धीरे जमीन में समा जाता है, जिससे भूजल स्तर बढ़ता है। इस प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि सूखे चारागाहों में फिर से घास और वनस्पतियां उगने लगीं। इससे पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बढ़ी और गांव की पारिस्थितिकी में सुधार हुआ।

लापोड़िया में पशुपालन को भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनाया गया। गांव में विशेष रूप से देशी नस्ल की गायों के संरक्षण पर जोर दिया गया। इसके लिए गिर नस्ल के नंदी लाकर देशी गायों का संवर्धन किया गया, जिससे दूध उत्पादन बढ़ा और ग्रामीणों को आय का अतिरिक्त स्रोत मिला। इससे पशुधन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली।

इस पूरे परिवर्तन की सबसे बड़ी विशेषता गांव की सामुदायिक भागीदारी रही। पद्मश्री लक्ष्मण सिंह कहते हैं, ”ग्रामीण विकास का रास्ता प्रकृति के संरक्षण से होकर गुजरता है। यदि गांव के लोग अपने जल स्रोतों, चारागाहों और वनस्पतियों की रक्षा करें तो पानी, चारा और आजीविका से जुड़ी कई समस्याएं स्वतः हल हो सकती हैं। इसी सोच के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को एक सामुदायिक आंदोलन का रूप दिया।’

 

Topics: तकनीकी शब्दआत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाचौका प्रणालीनंदी संवर्धनभूजल पुनर्भरणगुरु हमारे गांवजल संरचनाएंअन्न सागर (सिंचाई)फूल सागर (भूजल)जैव विविधतादेव सागर (पर्यावरण)पाञ्चजन्य विशेषपारंपरिक तालाबचरागाह विकासपद्मश्री लक्ष्मण सिंहदेशी गो-वंश संरक्षणश्रमदानजल संकट से मुक्ति
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