USCIRF की रिपोर्ट में RSS और RAW पर हमला: भारत की संप्रभुता पर आक्रमण
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USCIRF की रिपोर्ट में RSS और RAW पर हमला: भारत की संप्रभुता पर आक्रमण

USCIRF रिपोर्ट में भारत की संप्रभुता, RSS और RAW पर विधिक हमला। हाइब्रिड वॉरफेयर, दोहरे मापदंड और भारत की प्रतिक्रिया का गहन विश्लेषण। राष्ट्र की एकता की रक्षा जरूरी।

Written byडॉ विश्वास चौहानडॉ विश्वास चौहान — edited by कुलदीप सिंह
Mar 17, 2026, 11:32 am IST
in भारत, विश्लेषण
USCIRF RSS REPORT

प्रतीकात्मक तस्वीर

21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य अब पारंपरिक भौगोलिक युद्धों से आगे बढ़कर हाइब्रिड वॉरफेयर, सूचना-युद्ध और ‘लॉफेयर’ (Lawfare) के जटिल आयामों में परिवर्तित हो चुका है। वर्तमान युग में राष्ट्रों की संप्रभुता और उनकी लोकतांत्रिक वैधता को प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण के स्थान पर विधिक आख्यानों, प्रायोजित मानवाधिकार रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय संस्थागत दबावों के माध्यम से खंडित करने का कुत्सित प्रयास किया जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में, यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) द्वारा 4 मार्च 2026 को जारी वार्षिक रिपोर्ट को केवल धार्मिक स्वतंत्रता का आकलन मानना एक गंभीर विश्लेषणात्मक त्रुटि होगी। यह दस्तावेज भारत को लगातार सातवें वर्ष ‘विशेष चिंता वाले देश’ (CPC) की श्रेणी में रखने की सिफारिश मात्र नहीं है, बल्कि यह भारत के वैचारिक आधार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), और उसकी सामरिक ढाल, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW), पर प्रत्यक्ष विधिक हमले का एक संगठित ‘अस्त्र’ है।

USCIRF का विधिक ढांचा: अधिकार बनाम संस्थागत अतिक्रमण

USCIRF की स्थापना इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट (IRFA), 1998 के अंतर्गत एक सलाहकारी निकाय के रूप में की गई थी। विधिक दृष्टि से यह केवल अमेरिकी विदेश नीति को परामर्श देने वाली एक ‘सलाहकार संस्था’ है, जिसके निष्कर्ष न तो अंतरराष्ट्रीय विधि के तहत बाध्यकारी हैं और न ही इसे किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का वैधानिक दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद, यह आयोग भारत जैसे संप्रभु लोकतंत्र की आंतरिक विधायी नीतियों, सुरक्षा तंत्र और सांस्कृतिक संस्थाओं पर जिस प्रकार की टिप्पणियां करता है, वह स्पष्ट रूप से ‘Ultra Vires’ (अधिकारतीत) है। किसी राष्ट्र की आंतरिक नीतियों का मूल्यांकन करना इस आयोग के वैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक हस्तक्षेपकारी इकाई के रूप में स्थापित करता है।

USCIRF की संरचना: हितों का टकराव और वैचारिक पूर्वाग्रह

किसी भी विधिक या अर्ध-विधिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता उसके निर्माताओं की निष्पक्षता पर टिकी होती है। किंतु USCIRF की वर्तमान संरचना ‘Conflict of Interest’ और ‘Nemo Judex in Causa Sua’ (कोई भी अपने मामले में स्वयं न्यायाधीश नहीं हो सकता) के सिद्धांत का खुला उल्लंघन करती है। आयोग के अध्यक्ष स्टीफन श्नेक, उपाध्यक्ष डॉ. आसिफ महमूद, जिनकी पृष्ठभूमि पाकिस्तान से जुड़ी रही है, और डेविड करी जैसे सदस्यों का वैचारिक झुकाव जगजाहिर है। जब रिपोर्ट तैयार करने वाले लोग स्वयं विशिष्ट धार्मिक लॉबिंग ग्रुप्स या संकीर्ण भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रभावित हों, तो वहां वस्तुनिष्ठता का स्थान वैचारिक पूर्वाग्रह ले लेता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ ‘न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए’ के सिद्धांत की हत्या की गई है।

USCIRF की रिपोर्ट्स का क्रोनोलॉजिकल अध्ययन

मैने जब USCIRF के भारत संबंधी आख्यानों का कालक्रमिक अध्ययन किया जाए, तो पता चला कि इन रिपोर्ट्स में एक सोची-समझी ‘विधिक आक्रामकता’ की प्रवृत्ति दिखाई देती है। 1998 से 2013 तक यह आयोग मुख्यतः बड़ी सांप्रदायिक घटनाओं, जैसे गुजरात 2002, तक सीमित था। किंतु 2014 के बाद इसने भारत के विधायी निर्णयों, जैसे अनुच्छेद 370 का निरसन, CAA, वक्फ संशोधन विधेयक और धर्मांतरण विरोधी कानूनों, को निशाना बनाना शुरू किया। 2026 की यह रिपोर्ट इस आक्रमण का चरम बिंदु है। रिपोर्ट में पहली बार RSS को “Hindu supremacist paramilitary group” और R&AW को “transnational repression” (देश के बाहर दमन) का उपकरण बताया गया है। साथ ही हथियार निर्यात नियंत्रण एक्ट के तहत भारत को हथियारों की बिक्री रोकने और सुरक्षा सहायता को धार्मिक स्वतंत्रता की शर्तों से जोड़ने की सिफारिश की गई है। यह केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि भारत की सामरिक स्वायत्तता को पंगु बनाने का एक कूटनीतिक षड्यंत्र है।

RSS की विधिक स्थिति: न्यायिक मान्यता बनाम विदेशी भ्रम

USCIRF द्वारा RSS को “paramilitary” या “supremacist” की संज्ञा देना ऐतिहासिक तथ्यों और भारतीय न्यायपालिका की घोर अवहेलना है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(c) के अंतर्गत संघ बनाने की स्वतंत्रता के तहत RSS एक वैध सांस्कृतिक संगठन है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Ramesh Yeshwant Prabhoo v. Prabhakar Kunte (1996) के ऐतिहासिक निर्णय में ‘हिन्दुत्व’ को एक ‘जीवन पद्धति’ (Way of Life) के रूप में परिभाषित किया है। सांस्कृतिक पहचान को धार्मिक कट्टरता के साथ समरूप करना एक प्रकार का ‘Judicial Mischaracterisation’ है। रिपोर्ट में RSS पर लगाए गए आरोप बिना किसी विधिक साक्ष्य के हैं और केवल “responsibility and tolerance” जैसे अस्पष्ट शब्दों का उपयोग करके एक पूरे संगठन को अपराधी घोषित करने का प्रयास किया गया है।

भारत की R&AW और अंतरराष्ट्रीय विधि: संप्रभुता का प्रश्न

R&AW जैसी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी पर “Transnational Repression” के आरोप लगाना संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(7) और ‘Customary International Law’ (प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि) का खुला उल्लंघन है, जो किसी भी राष्ट्र के आंतरिक सुरक्षा मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है। रिपोर्ट में Transnational Repression Reporting Act of 2024 पारित करने की मांग भारत की वैध खुफिया गतिविधियों को लक्षित करती है। ये आरोप मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों और उन NGO के इनपुट पर आधारित हैं जिनका अपना एजेंडा संदिग्ध है। विधिक दृष्टिकोण से, बिना किसी ठोस न्यायिक प्रक्रिया या साक्ष्य के किसी संप्रभु राष्ट्र के खुफिया तंत्र पर ‘Targeted Sanctions’ की मांग करना अंतरराष्ट्रीय अराजकता को आमंत्रण देना है।

तुलनात्मक विधिक विश्लेषण: दोहरे मापदंडों का पाखंड

यहाँ ‘लॉफेयर’ का एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। USCIRF भारत के UAPA, FCRA और धर्मांतरण विरोधी कानूनों की आलोचना करता है, जबकि अमेरिका का अपना विधिक ढांचा, जैसे Patriot Act, FARA (Foreign Agents Registration Act) और Arms Export Control Act, कहीं अधिक सख्त और व्यापक है। जो मानक अमेरिका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ‘वैध’ मानता है, वही मानक भारत पर लागू होने पर ‘दमनकारी’ करार दिए जाते हैं। यह स्पष्ट रूप से ‘Double Standards’ का मामला है, जहाँ अंतरराष्ट्रीय विधि का उपयोग केवल विकासशील राष्ट्रों को नियंत्रित करने के लिए किया जा रहा है।

ICCPR और वैध प्रतिबंधों का अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत

भारत International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR) का हस्ताक्षरकर्ता है। यद्यपि इसके अनुच्छेद 18, 19 और 21 धार्मिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं, किंतु साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और नैतिकता के आधार पर लगाए गए ‘उचित प्रतिबंध’ पूर्णतः वैध हैं। भारत के सभी विवादित कानून इसी अंतरराष्ट्रीय विधिक फ्रेमवर्क के भीतर हैं। अतः इन्हें अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन बताना विधिक दृष्टि से असंगत और भ्रामक है।

इंटनेशनल लॉबिंग नेटवर्क और ‘नैरेटिव इंजीनियरिंग’

USCIRF की रिपोर्ट कोई स्वतंत्र शोध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘Narrative Engineering’ का परिणाम है। इसमें IAMC (Indian American Muslim Council) और Hindus for Human Rights जैसे संगठनों का प्रभाव स्पष्ट है, जो ‘Foreign Influence Operations’ के माध्यम से अमेरिकी नीति-निर्माण तंत्र को प्रभावित करते हैं। सुरक्षा विश्लेषकों, जैसे The Disinfo Lab, के अनुसार यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जहाँ चयनात्मक घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है ताकि भारत की एक ‘असहिष्णु राष्ट्र’ की छवि निर्मित की जा सके।

भारतीय विपक्ष और संवैधानिक कर्तव्य: एक आईना

इस संपूर्ण प्रकरण में भारतीय विपक्ष की प्रतिक्रिया अत्यंत राष्ट्रघाती और अदूरदर्शी रही है। वोट-बैंक की संकुचित राजनीति के लिए विदेशी रिपोर्टों को बिना किसी विधिक परीक्षण के ‘राजनीतिक हथियार’ बनाना राष्ट्रीय हितों के साथ विश्वासघात है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(क) के अनुसार प्रत्येक नागरिक, विशेषकर जन-प्रतिनिधियों, का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे। जब विपक्ष इन रिपोर्टों का उपयोग अपनी ही सुरक्षा एजेंसियों, रॉ, और सांस्कृतिक संगठनों, आरएसएस, को लांछित करने के लिए करता है, तो वह अनजाने में उन विदेशी ताकतों का औजार बन जाता है जो भारत को ‘कठघरे’ में खड़ा देखना चाहती हैं।

भारत सरकार (MEA) का आधिकारिक प्रत्युत्तर (16 मार्च 2026)

विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को पूर्णतः “motivated and biased characterisation” और “distorted picture” करार दिया है। भारत ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि USCIRF को भारत को उपदेश देने के बजाय अमेरिका में बढ़ते नस्लीय तनाव और हिंदू मंदिरों पर हो रहे हमलों पर ध्यान देना चाहिए। यह कड़ा रुख भारत की ‘विधिक संप्रभुता’ की रक्षा के संकल्प को दर्शाता है।

निष्कर्ष: हम कह सकते है कि आज भारत की विधिक संप्रभुता की रक्षा का आह्वान किया जाना चाहिए क्योंकि USCIRF की 2026 की रिपोर्ट निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं, बल्कि एक वैचारिक-राजनीतिक दस्तावेज है जो भारत की सांस्कृतिक पहचान, विधिक संरचना और सामरिक स्वायत्तता को चुनौती देता है। भारत के एक नागरिक के रूप में हमें यह समझना होगा कि भारत की एकता किसी विदेशी कमीशन के ‘सर्टिफिकेट’ की मोहताज नहीं है। हमें अपनी संस्थाओं, न्यायपालिका, सुरक्षा तंत्र और सांस्कृतिक संगठनों पर विश्वास रखते हुए वैश्विक मंच पर एक सक्रिय और सशक्त विधिक-कूटनीति (Legal Diplomacy) अपनानी होगी।

हमें QUAD, Global South और अन्य सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक ‘मानवाधिकार विमर्श’ खड़ा करना होगा जो औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त हो। भारत की संप्रभुता की रक्षा केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि सूचना और विधि के इस युद्ध के मैदान में भी उतनी ही अनिवार्य है।

“राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय, इदं न मम।”

Topics: धार्मिक स्वतंत्रता भारतहाइब्रिड वॉरफेयर भारतUSCIRF 2026 रिपोर्टभारत CPC सिफारिशRSS Hindu supremacistRAW transnational repression
डॉ विश्वास चौहान
डॉ विश्वास चौहान
संयोजक जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र , मध्यप्रदेश ( प्राध्यापक विधि , शासकीय स्टेट लॉ कॉलेज भोपाल, मध्य प्रदेश ) [Read more]
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