मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध के चलते ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर रखा है, जिससे दुनियाभर में तेल और गैस की किल्लत शुरू हो गई है। अमेरिका चाहकर भी होर्मुज को ईरान से मुक्त नहीं करवा पा रहा है। ऐसे में उन्होंने चीन समेत अपने सहयोगी देशों से युद्धपोत भेजकर मदद करने को कहा था, जिसे अब यूरोपीय देशों ने उनकी मदद की मांग को ठुकरा दिया है।
मदद भी चाहिए और झुकना भी नहीं
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पुराने अंदाज में अपने सहयोगी देशों को आदेशात्मक अंदाज में कहा है कि वे जहाज भेजकर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तेल के जहाजों की सुरक्षा करें और इसे फिर से खोलें। उनका कहना था कि जो देश इस जलडमरूमध्य से फायदा उठाते हैं, उन्हें मदद करनी चाहिए। लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने नाटो को धमकी भी दे दी कि अगर सदस्य देशों ने मदद नहीं की या नकारात्मक जवाब दिया तो नाटो का भविष्य “बहुत बुरा” होगा। उन्होंने ब्रिटेन से नाराजगी जताई लेकिन उम्मीद जताई कि वो शामिल होगा। उन्होंने करीब 7 देशों से बात की है।
यूरोप ने दिखा दिया ठेंगा
हालांकि, ट्रंप की मांग और धमकियों को नजरअंदाज करते हुए जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों ने साफ कहा है कि वे युद्धपोत नहीं भेजेंगे। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि कोई संयुक्त फैसला नहीं है और ईरान पर बमबारी सही रास्ता नहीं। उनका कहना था कि ईरानी शासन खत्म होना चाहिए लेकिन पिछले अनुभवों से सबक लेना होगा। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरीस पिस्टोरियस ने पूछा कि यूरोपीय फ्रिगेट्स की क्या जरूरत, ये हमारा युद्ध नहीं है, अमेरिकी नौसेना अकेले संभाल ले।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि ब्रिटेन बड़े युद्ध में नहीं खिंचेगा, लेकिन तेल बाजार स्थिर करने के लिए कई सहयोगियों के साथ योजना बनाने पर काम कर रहे हैं। जैसा कि पहले से ही अपेक्षित था, स्टार्मर ट्रंप की बात मानने से इनकार नहीं किया लेकिन सतर्क हैं। वहीं इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने कूटनीति पर जोर दिया और कहा कि कोई नौसैनिक मिशन क्षेत्र में नहीं बढ़ाया जाएगा। उन्होंने ईयू के लाल सागर मिशन को होर्मुज़ तक बढ़ाने पर संदेह जताया था।
वहीं फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी जहाज भेजने की कोई योजना नहीं बताई। ईयू के विदेश मंत्री ने बैठक में लाल सागर मिशन को होर्मुज तक बढ़ाने से इनकार कर दिया। ईयू की विदेश नीति प्रमुख काया कलास ने कहा कि मिशन मजबूत करने की इच्छा है लेकिन बहुमत बदलने की कोई रुचि नहीं।
















