परमाडीह गांव : सब्जी से पूरे हो रहे सपने
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होम भारत

परमाडीह गांव : सब्जी से पूरे हो रहे सपने

परमाडीह गांव के युवाओं ने रोजी-रोटी के लिए पलायन करने के बजाय सब्जी पैदा करने का निर्णय लिया और आज वहां के कई लोग लाखों रुपए कमा रहे हैं। गांव में यह परिवर्तन एकल अभियान के कारण हुआ है

Written byरितेश कश्यपरितेश कश्यप
Mar 16, 2026, 12:37 pm IST
in भारत, विश्लेषण, झारखण्‍ड
गांव में सब्जी की खेती का एक दृश्य

गांव में सब्जी की खेती का एक दृश्य

भारत के गांवों की चर्चा होते ही अक्सर एक तस्वीर सामने आती है-रोज़गार की कमी, युवाओं का शहरों की ओर पलायन और धीरे-धीरे खाली होते घर। लेकिन झारखंड के गिरिडीह जिले में बसा एक छोटा-सा गांव परमाडीह इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित करता है। लगभग 100 परिवारों का यह गांव तीन तरफ से नदियों से घिरा हुआ है और एक छोटी पहाड़ी पर बसा है। खास बात यह है कि यहां का एक भी नवयुवक नौकरी की तलाश में शहर नहीं गया। गांव के लोगों ने अपनी मिट्टी, अपनी मेहनत और अपनी परंपराओं पर भरोसा रखा, और उसी भरोसे ने उनकी जिंदगी बदल दी।

करीब 10-12 वर्ष पहले तक परमाडीह एक साधारण और पिछड़ा गांव माना जाता था। गांव तक जाने के लिए पक्की सड़क नहीं थी, बारिश के दिनों में नदी पार करना भी मुश्किल हो जाता था। बिजली नहीं थी, ज्यादातर घर कच्चे थे और बच्चों की पढ़ाई की सुविधाएं भी बहुत सीमित थीं। बदलाव की शुरुआत तब हुई जब एकल अभियान द्वारा संचालित गिरिडीह स्थित एकल ग्रामोत्थान संसाधन केंद्र के कुछ कार्यकर्ताओं एवं अधिकारियों का गांव में आना-जाना शुरू हुआ।

किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया गया और धीरे-धीरे लोगों ने रासायनिक खाद छोड़कर गोबर, गोमूत्र और पारंपरिक तरीके से खेती करना शुरू किया। शुरू में यह प्रयोग छोटा था, लेकिन कुछ ही वर्षों में इसका असर पूरे गांव में दिखाई देने लगा। आज परमाडीह पूरी तरह जैविक खेती करने वाला गांव बन चुका है। यहां धान, गेहूं, दालें और कई तरह की सब्जियां जैविक तरीके से उगाई जाती हैं।

सबसे बड़ा बदलाव सब्जी उत्पादन से आया। गांव के किसान सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों से ताजी सब्जियां तोड़ते हैं और मोटरसाइकिल से आसपास के जिलों के बाजारों में बेचने जाते हैं। अब परमाडीह की सब्जियां अपनी गुणवत्ता और स्वाद के कारण पहचान बना चुकी हैं। इसका नतीजा यह हुआ कि आज गांव का लगभग हर परिवार साल में लाखों रुपए की कमाई कर रहा है। कई परिवारों की आय तो 15–20 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है।

आर्थिक प्रगति के साथ-साथ गांव में सामाजिक बदलाव भी हुआ। युवाओं ने ‘सरस्वती नवयुवक संघ’ बनाकर पूरे गांव में नशाबंदी लागू कर दी है। यदि कोई नशा करता है तो उस पर आर्थिक दंड लगाया जाता है। गांव की लड़कियों के लिए सिलाई प्रशिक्षण केंद्र भी शुरू किया गया है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं। बांस शिल्प और लोहार जैसे पारंपरिक काम भी यहां आज तक जीवित हैं, जिससे कई परिवारों को रोजगार मिलता है।

परमाडीह की कहानी हमें प्रेरणा देती है कि अगर सभी गांव अपने संसाधनों पर भरोसा करें और मिल-जुलकर काम करें, तो उन्हें शहरों की ओर पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह छोटा सा गांव आज पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन चुका है कि आत्मनिर्भरता और सामूहिक प्रयास से गांव भी समृद्ध और खुशहाल बन सकते हैं।

एकल अभियान के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. ललन कुमार शर्मा कहते हैं, आज भारत की कृषि संस्कृति तेजी से बदल रही है। पशुओं से दूर होते गांव, मशीनों और रासायनिक खाद पर बढ़ती निर्भरता तथा बेरोजगारी के कारण युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक बड़ी समस्या बन गया है। ऐसे समय में झारखंड का परमाडीह गांव एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आया है।

Topics: सब्जी उत्पादनआर्थिक रीढ़पलायन मुक्त गांवपारंपरिक खादझारखंडगुरु हमारे गांवजैविक खेतीएकल अभियानपाञ्चजन्य विशेषआत्मनिर्भर गांवपरमाडीह गांवगिरिडीह
रितेश कश्यप
रितेश कश्यप
डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय। राजनीति, सामाजिक और सम-सामायिक मुद्दों पर पैनी नजर। कर्मभूमि झारखंड।   [Read more]
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