पुराणकार कहते हैं कि जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, प्रकाश-तत्त्वों में सूर्य, नदियों में गंगा प्रमुख हैं वैसे ही व्रतों में सर्वश्रेष्ठ व्रत एकादशी-व्रत को माना गया है। इस तिथि को जो कुछ जप-तप, दान-धर्म व भजन-पूजन किया जाता है, वह सब भगवान श्रीहरि के पूजित होने के कारण पूर्णता को प्राप्त होता है। एकादशी व्रत करने वाले पर सृष्टि के पालक श्री हरि विष्णु की असीम कृपा बरसती है। ज्योतिष विज्ञानी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार साल भर की 24 एकादशियों में होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के बीच पड़ने वाली पापमोचनी एकादशी वर्ष की आखिरी एकादशी मानी जाती है।
पापमोचिनी एकादशी व्रत
वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी तिथि का शुभारम्भ 14 मार्च शनिवार को सुबह 8 बजकर 10 मिनट से होगा और यह तिथि 15 मार्च 2026 को सुबह 9 बजकर 16 मिनट तक रहेगी। चूंकि ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार सनातन परंपरा में व्रत रखने के लिए उदया तिथि को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। इस नियम के अनुसार पापमोचनी एकादशी का व्रत 15 मार्च रविवार को रखा जाएगा।
पापमोचनी एकादशी का महात्म्य और कथा
पर्व के तत्वदर्शन पर विचार करें तो नाम से ही इसका उद्देश्य स्पष्ट है। सभी प्रकार के पापों का शमन करने के कारण ही यह तिथि ‘पापमोचनी एकादशी’ कहलाती है। यह व्रत करने वाले भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सभी पाप ताप सहज ही नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पर्व का महात्म्य बताने वाला एक अत्यंत प्रेरणादायी प्रसंग श्रीमदभागवत महापुराण में वर्णित है। योगेश्वर श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठर के मध्य के वार्तालाप के इस इस प्रसंग के अनुसार सतयुग में एक बार राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से जाने अनजाने हुए पाप कर्मों से मुक्त होने का उपाय पूछा तो लोमश ऋषि ने उन्हें मेधावी ऋषि की कथा सुनते हुए पापमोचनी एकादशी व्रत पर्व की महत्ता बतायी थी।
मेधावी ऋषि और मंजुघोषा अप्सरा की कथा
कथानक के अनुसार एक समय च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में तपस्या में लीन थे। एक दिन मंजुघोषा नामक एक अप्सरा की दृष्टि उन ऋषि पर पड़ी तो वह उन पर मोहित हो गयी और उसने अपनी काम चेष्ठाओं से मेधावी ऋषि को अपने वश में कर लिया। उस अप्सरा के रूप सौन्दर्य के वशीभूत हो ऋषिवर अपना जप तप सब भूल गये। लम्बे समय तक दोनों साथ में रमण करते रहे। एक दिन अप्सरा ने जब उनसे वापस स्वर्गलोक लौटने की बात कही तो ऋषि की चेतना जगी और उनको अपनी भूल का अहसास हुआ कि किस तरह एक अप्सरा के कारण वह अपने साधना पथ से भटक गये। भारी क्रोध में भरकर उन्होंने उस अप्सरा को पिशाचिनी बन जाने का शाप दे दिया। ऋषि के शाप से भयभीत मंजुघोषा उनके चरणों में गिरकर अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगी। तब तक ऋषि को भी बोध हो चुका था कि अपराधी अकेली मंजुघोषा ही नहीं है वरन वे भी हैं। उन्होंने उस अप्सरा को पिशाच योनि से मुक्त होने के लिए चैत्र कृष्णपक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने का उपाय बताया। इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो अप्सरा मंजुघोषा सुन्दर रूप प्राप्त स्वर्ग को प्रस्थान कर गयी। उधर मेधावी ऋषि; जिन्होंने भोग में निमग्न रहने के कारण अपना तेज नष्ट कर दिया था, उन्होंने भी इस व्रत के प्रभाव से अपना तप बल पुनः अर्जित कर लिया।
पापमोचनी एकादशी व्रत का शास्त्रीय विधान
व्रत पर्व के शास्त्रीय विधान के अनुसार पापमोचनी एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष व्रत का संकल्प लिया जाता है। भगवान को पंचामृत से स्नान और पीले फूलों की माला चढ़ायी जाती है फिर हल्दी या चंदन का तिलक लगाकर तुलसी,पंचामृत, श्रीफल और केले का भोग लगाकर श्रीहरि की आरती-स्तुति की जाती है। इस दिन ‘’ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।‘’ तथा ‘’श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी तथा हे नाथ नारायण वासुदेव’’ मंत्रों का जाप अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।











