पाकिस्तान में पत्रकार और मानवाधिकार दम्पत्ति जैनब मज़ारी और हदी अली को क्यों सुनाई गई सजा?
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पाकिस्तान में पत्रकार और मानवाधिकार दम्पत्ति जैनब मज़ारी और हदी अली को क्यों सुनाई गई सजा?

इस्लामाबाद कोर्ट ने इमान ज़ैनब मज़ारी और हादी अली को PECA के तहत 17 साल कैद की सजा दी। सेना आलोचना और बलोच अधिकारों की मांग पर दमन। UN विशेषज्ञों ने 'चिलिंग इफेक्ट' की चेतावनी दी, मगर अंतरराष्ट्रीय 'मानवाधिकार गैंग' चुप।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Mar 12, 2026, 10:55 am IST
in विश्व, विश्लेषण
Human rights Activists Zainab Mazari

इतने मामले इन दिनों पाकिस्तान और अफगानिस्तान एवं कई अन्य देशों को लेकर सुर्खियों में हैं, मगर इन्हीं सुर्खियों में एक खबर लगभग दब ही गई। यह खबर महत्वपूर्ण थी। यह इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे पाकिस्तान में चल रहे हालातों का तो पता चलता ही है, बल्कि यह भी पता चलता है कि जो पाकिस्तान भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर हर जगह शिकायत करता रहता है, वह अपने ही नागरिकों के लिए किस सीमा तक निर्दयी है।

मानवाधिकारों के लिए उठाई थी आवाज

पाकिस्तान में जनवरी में मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले वकील दम्पत्ति को साइबर आतंकवाद, आतंकवाद का महिमामंडन, और झूठी जानकारी का प्रसार करने के आरोप में 17 वर्ष की सजा सुनाई गई। वकील जैनब मज़ारी पाकिस्तान की पूर्व मंत्री शीरीन मज़ारी की बेटी हैं। इन्हें सेना के खिलाफ एक्स पर पोस्ट लिखने के आरोप में यह सजा सुनाई गई। दरअसल, उन्होंने महरंग बलोच के लिए जनता से समर्थन की अपील की थी, और महरंग बलोच पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी कानून के अंतर्गत सूचीबद्ध व्यक्ति हैं। मज़ारी ने गिरफ्तार बलोच नेताओं के लिए न्याय की मांग करने के लिए एक प्रदर्शन की अपील की थी। उन पर यह भी आरोप हैं कि उन्होनें पाकिस्तान को “आतंकी राज्य” कहा था।

यह और भी चिंता करने वाली बात है कि अमेरिका सहित अन्य देशों में छोटी-छोटी बातों पर मानवाधिकार उल्लंघन का हल्ला मचाने वाले वर्ग ने भारत में तो कुछ ही नहीं बोला। जनवरी से लेकर मार्च तक का समय आ गया है, परंतु एक बार भी किसी भी अभिव्यक्ति की आजादी की गैंग के सदस्य का कोई भी पोस्ट जैनब मज़ारी और उनके शौहर की गिरफ़्तारी को लेकर नहीं आया है। और भारत में भी जैनब मज़ारी और उनके शौहर की गिरफ़्तारी को लेकर कोई भी विमर्श नहीं बना। विमर्श बनना चाहिए था कि पाकिस्तान में इस सीमा तक असहिष्णुता है कि वह मुद्दे उठाने पर अपने ही लोगों को 17 साल तक की कैद सुना सकती है।

कौन हैं मजारी

मज़ारी एक मानवाधिकार की आवाज उठाने वाली वकील हैं, जो पाकिस्तान में उन सभी लोगों की आवाज बनती हैं, जिनके मानवाधिकारों को पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा रौंदा जा रहा है। और वह अपहरण और एक्स्ट्रा जूडिशल हत्याओं के खिलाफ भी लड़ती हैं। इसके साथ ही उनके शौहर अली भी कुछ ऐसा ही काम करते हैं। वे उन लोगों की आवाज बनते हैं, जिन्हें बेअदबी के झूठे आरोपों में फँसाया जाता है। इसके साथ ही वे यौन हिंसा, बलात्कार और अपहरण जैसे अपराधों से पीड़ित लोगों की आवाज बनते हैं।

इसे भी पढ़ें: ईरान के जिस स्कूल में 175 लोग मारे गए, उस पर हमला अमेरिका ने ही किया था; ट्रंप का दावा झूठा निकला

हालांकि, इन दोनों के खिलाफ काफी समय से कार्यवाही का प्रयास था, परंतु वह सफल नहीं हो पा रहा था, परंतु जनवरी में यह प्रयास सफल रहा और उन्हें Prevention of Electronic Crimes Act (PECA) के अंतर्गत गिरफ्तार करके सजा सुनाई गई।

पाकिस्तानी पत्रकार इस कानून के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं

पाकिस्तान के तमाम पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकरता इस कानून के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनका आरोप है कि साइबर अपराधों की आड़ में उन सभी के खिलाफ यह कानून लागू किया जा रहा है, जो सरकार की आलोचना सोशल मीडिया पर करते हैं। यह कानून जनता को प्रताड़ित करने का एक बहुत बड़ा हथियार बन गया है और यह अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने का एक माध्यम बन गया है।

इसके साथ ही वर्ष 2025 में इसमें संशोधन करके सरकार को यह अधिकार दे दिया गया था कि वह सोशल मीडिया को भी निगमित कर सकती है।

यूएन ने भी इस गिरफ़्तारी पर चिंता जताई थी

इस गिरफ़्तारी पर भारत में हालांकि लोगों के लब सिले रहे थे। वे आजाद नहीं थे, मगर जब अगस्त 2025 में इनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा आरंभ हुआ था और जनवरी 2026 में जब इन्हें सजा सुनाई गई थी, तब यूएन विशेषज्ञों ने इस मामले पर चिंता व्यक्त की थी और अपनी वेबसाइट पर यह लिखा था कि अन्य लोगों की तरफ वकीलों कि भी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार है। उन्होनें लिखा था कि “अन्य व्यक्तियों की तरह, वकीलों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इस अधिकार के प्रयोग को कभी भी आपराधिक आचरण—विशेषकर आतंकवाद—के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।”

इसके बाद विशेषज्ञों ने लिखा था कि “ऐसा करने से पूरे पाकिस्तान में वकीलों और मानवाधिकार रक्षकों के काम को कमज़ोर करने और उसे अपराधी घोषित करने का जोखिम पैदा होता है, और इसका देश के नागरिक समाज पर एक ‘चिलिंग इफ़ेक्ट’ (भय पैदा करने वाला प्रभाव) पड़ता है।”

सोशल मीडिया पर भी विरोध परंतु भारत में चुप्पी

इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर भी विरोध चला और अभी तक चल रहा है। हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर भी यह मामला उठाया गया। परंतु हैरानी की बात यही है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी की बात करने वाला गैंग एकदम चुप है। वैसे कथित आजादी गैंग किसी भी पत्रकार और लेखक की आजादी की बात करने में सबसे आगे रहता है, वह सीमाओं से परे आजादी की बात करता है। परंतु फिर भी यह भी बात सच है कि वह बलूचिस्तान में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन की बात नहीं करता है, और पाकिस्तान में जबरन निकाह की बात नहीं करता है और जो लोग इनके लिए लड़ रहे हैं, उन्हें सजा मिलने पर सोशल मीडिया में भी नहीं लिखता है।

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