युद्ध रिपोर्टिंग में मीडिया की नैतिकता
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युद्ध रिपोर्टिंग में मीडिया की नैतिकता

पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम में पर्यटकों की नृशंस चुनिंदा हत्या और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे समाचार चैनलों ने काफी अटकल भरी रिपोर्टिंग की।

Written byलेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)लेफ्टिनेंट जनरल एम के दास,पीवीएसएम, बार टू एसएम, वीएसएम ( सेवानिवृत)
Mar 11, 2026, 03:56 pm IST
in विश्लेषण
युद्ध रिपोर्टिंग

युद्ध रिपोर्टिंग

भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) को मार्च में चार सप्ताह या अगली सूचना तक सभी टीवी समाचार चैनलों के लिए टेलीविजन रेटिंग पॉइंट्स (टीआरपी) को निलंबित करने का निर्देश दिया है। हालांकि यह निर्दिष्ट नहीं है, लेकिन 28 फरवरी को शुरू हुए अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष पर अवांछित सनसनीखेज कवरेज की चिंताओं को देखते हुए अस्थायी निलंबन लागू किया गया है।

हाल के एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हास्य में कहा गया है कि अमेरिका और इजरायल दोनों ने भारतीय टीवी न्यूज चैनलों से युद्ध रिपोर्टिंग करते हुए संयम बरतने का आग्रह किया है।

मीडिया नैतिकता पर गंभीर सवाल

यह अस्थायी निलंबन भारत में युद्ध रिपोर्टिंग के दौरान मीडिया नैतिकता के बारे में गंभीर प्रश्न उठाता है। पिछले साल 22 अप्रैल को पहलगाम में पर्यटकों की नृशंस चुनिंदा हत्या और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमारे समाचार चैनलों ने काफी अटकल भरी रिपोर्टिंग की। पिछले साल 7-10 मई तक ऑपरेशन सिंदूर के दौरान, भारतीय मीडिया ने एक प्रकार की लाइव रिपोर्टिंग और अतिरंजित दावों की कोशिश की। सरकार ने दैनिक मीडिया ब्रीफिंग के माध्यम से ऑपरेशन सिंदूर के आवश्यक विवरणों को सूचित किया और यहां तक कि भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के डीजीएमओ द्वारा एक औपचारिक मीडिया ब्रीफिंग तक भी हुई। फिर भी, कई समाचार चैनलों ने बढ़ा चढ़ा कर अपनी रिपोर्टिंग जारी रखी।

मीडिया रिपोर्टिंग तटस्थ होनी चाहिए

यह एक तथ्य है कि ‘सूचना युद्ध’ आधुनिक युद्धों और संघर्षों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। सूचना क्षेत्र को आकार देना एक सतत प्रक्रिया है और मीडिया प्लेटफॉर्म जनता की राय को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब भारत से दूर अन्य पक्ष और राष्ट्र युद्ध और संघर्ष में शामिल होते हैं, तो मीडिया रिपोर्टिंग सटीक, वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष होनी चाहिए। हमारी मीडिया रिपोर्टिंग तटस्थ होनी चाहिए और केवल सत्यापित समाचारों को कवर करना चाहिए। युद्ध के कोहरे (Fog of War) में यह मुश्किल हो सकता है लेकिन मीडिया को प्रचार और दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। इस तरह की सनसनीखेज और पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग विदेशी संबंधों और राष्ट्रहित पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।

दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा बन जाती है मीडिया

यह भी समझना होगा कि युद्ध रिपोर्टिंग पत्रकारिता का एक विशेष रूप है। युद्ध संवाददाताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे जनता को संघर्ष का प्रत्यक्ष विवरण प्रस्तुत करें और कठोर वास्तविकताएं समझाएं । भारत से जुड़े युद्धों और तीसरे पक्ष से जुड़े संघर्षों की तुलना में जिम्मेदारियां और नैतिकता अलग-अलग होती हैं। उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन युद्ध और ऑपरेशन सिंदूर के बीच मीडिया रिपोर्टिंग का नजरिया अलग होना चाहिए,लेकिन नैतिक पत्रकारिता की मूल बातों का पालन करते हुए । टीवी समाचार चैनल टीआरपी की दौड़ में अक्सर आगे बढ़ जाते हैं और सनसनीखेज समाचारों को कवर करते हैं । ऐसा करते हुए बिना जानकारी के वह दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा बन जाते हैं।

डीसीसी प्रशिक्षण जरूरी

भारत में, रक्षा मंत्रालय (MoD) वार्षिक तीन सप्ताह का रक्षा संवाददाता पाठ्यक्रम (Defence Correspondents Course,DCC) आयोजित करता है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का उद्देश्य भारतीय पत्रकारों को सैन्य मामलों, आपदाओं, युद्धों और संघर्षों को कवर करने में प्रशिक्षित करना होता है। अपने सैन्य करियर के दौरान, मुझे DCC के सीमावर्ती क्षेत्रों के दौरे, वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा ब्रीफिंग और पत्रकारों का संचालन करने का अवसर मिला। डीसीसी सेना, नौसेना और वायु सेना के तीनों अंगों के बारे में जानकारी देता है और युद्ध संचालन के मामलों पर रिपोर्ट करने के लिए पत्रकारों के एक चुनिंदा पूल को सशक्त बनाता है। दुर्भाग्य से, अधिकांश समाचार चैनलों के रिपोर्टर डीसीसी में शामिल नहीं हुए हैं।

टीआरपी में अंतर करने की आवश्यकता

निजी टीवी समाचार चैनल एक व्यावसायिक इकाई हैं और उन्हें प्रॉफ़िट के लिए विज्ञापन से होने वाले राजस्व की आवश्यकता होती है। लेकिन टीआरपी के लिए अस्वास्थ्यकर दौड़, जो बीएआरसी द्वारा साप्ताहिक आधार पर दी जाती है, अनावश्यक स्पर्धा पैदा करती है। भारत में टीआरपी की पद्धति में सुधार के लिए सरकार द्वारा अतीत में प्रयास किए गए हैं। साथ ही मनोरंजन और समाचार चैनलों के टीआरपी के बीच अंतर करने की आवश्यकता है। समाचार चैनलों की एक सामाजिक और राष्ट्रहित देखने की जिम्मेदारी भी होती है। समाचार चैनल उन घटनाओं पर जरूरत से ज्यादा कवरेज नहीं दे सकते जो अधिक दर्शकों की संख्या हासिल करते हैं। युद्धों और संघर्षों के दौरान, चल रहे अभियानों के संचालन के लिए संवेदनशीलता महत्वपूर्ण होती है।

26/11 आतंकी हमले के दौरान मीडिया का रवैया

मुंबई में 2008 के 26/11 के आतंकी हमलों के दौरान, भारतीय टीवी समाचार चैनलों ने अनजाने में सुरक्षा बलों के चल रहे आतंकवाद विरोधी अभियानों को नुकसान पहुंचाया। लाइव रिपोर्टिंग ने वस्तुतः पाकिस्तान में आतंकियों के आकाओं को आतंकवादियों को उनके अगले कदम के बारे में मार्गदर्शन करने का काम किया। अधिक टीआरपी की इच्छा ने पत्रकारों को बहुत संवेदनशील जानकारी लीक करने के लिए प्रेरित किया, जिसने अंततः आतंकवादियों की सहायता की। पत्रकारों और संपादकों की ओर से इस तरह के खराब निर्णय चल रहे अभियानों के लिए खतरनाक हो सकते हैं, चाहे वह आतंकवाद विरोधी अभियान हो या पारंपरिक युद्ध।

संबंधित पक्ष देते हैं क्लिप

अमेरिका- इजरायल – ईरान युद्ध के दौरान ज्यादातर खबरें पश्चिमी मीडिया के सूत्रों से आ रही हैं। अल जज़ीरा जैसे कुछ समाचार चैनल हैं जो ईरान और अन्य मध्य पूर्व देशों के परिप्रेक्ष्य को कवर करते हैं। चूंकि बहुत कम भारतीय पत्रकार युद्ध क्षेत्रों से रिपोर्टिंग को भौतिक रूप से कवर कर रहे हैं, इसलिए अधिकांश समाचार और क्लिपिंग संबंधित पक्षों द्वारा प्रदान की जा रही हैं। ऐसे में भारत में मीडिया, विशेष रूप से समाचार चैनलों को सावधानी और संयम बरतना होगा। स्व-नियमन की भावना से, टीवी समाचार चैनल राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए युद्ध रिपोर्टिंग की सच्ची भावना के साथ चल रहे संघर्ष को बखूबी कवर कर सकते हैं।

 

Topics: Indian MediaNational securityPahalgam Terror AttackUS–Israel–Iran conflictMedia EthicsTRP SuspensionBARCWar ReportingMumbaiAttacks
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