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आतंकवाद क्यों खत्म नहीं होता? जानिए चीन-पाकिस्तान और भू-राजनीति की बड़ी सच्चाई

वैश्विक आतंकवाद केवल कट्टरता का परिणाम नहीं बल्कि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष और रणनीतिक हितों से जुड़ा जटिल मुद्दा है। China, Pakistan, United States और Russia के बीच बदलते शक्ति संतुलन के बीच आतंकवाद के नेटवर्क क्यों खत्म नहीं हो पाते—इसका विश्लेषण।

Written byसुबोध मिश्रासुबोध मिश्रा — edited by Shivam Dixit
Mar 9, 2026, 08:00 pm IST
in भारत, विश्लेषण

आधुनिक आतंकवाद को अक्सर केवल विचारधारा या कट्टरता के संदर्भ में समझाया जाता है। लेकिन यह व्याख्या अधूरी है। आतंकवादी नेटवर्क इसलिए टिके रहते हैं क्योंकि भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष और रणनीतिक हित ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें उग्रवाद पनप सकता है।

पिछले दो दशकों में अमेरिका और उसके सहयोगियों ने मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया में आतंकवादी संगठनों को समाप्त करने के लिए भारी संसाधन लगाए। आईएसआईएस, अल-कायदा और अन्य नेटवर्क के खिलाफ अनेक सैन्य अभियान चलाए गए। फिर भी आतंकवाद का व्यापक ढाँचा समाप्त नहीं हुआ।

इसका कारण व्यापक भू-राजनीतिक परिस्थिति है।

अस्थिरता का रणनीतिक उपयोग

आज के बहुध्रुवीय विश्व में कई बार अस्थिरता स्वयं एक रणनीतिक उपकरण बन जाती है। लंबे संघर्ष प्रतिद्वंद्वी देशों के संसाधनों को बाँधते हैं और उन्हें निरंतर सुरक्षा चुनौतियों में उलझाए रखते हैं।

इतिहास यह भी दिखाता है कि उग्रवादी नेटवर्क अक्सर उन क्षेत्रों में पैदा होते हैं जहाँ महाशक्तियों के हित टकराते हैं। एक बार स्थापित होने के बाद ये नेटवर्क समय के साथ बदलते रूप में फिर उभर आते हैं।

चीन की रणनीतिक सोच

चीन का उदय इस समीकरण को और जटिल बनाता है। बीजिंग और वाशिंगटन के बीच प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार या तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रभाव और शक्ति संतुलन तक फैली हुई है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि लंबे क्षेत्रीय संघर्ष प्रतिद्वंद्वी देशों को व्यस्त रखते हैं और उनकी वैश्विक रणनीतिक क्षमता को सीमित करते हैं। इसलिए आतंकवाद, विद्रोह और क्षेत्रीय अस्थिरता को व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ में समझना आवश्यक है।

चीन-पाकिस्तान साझेदारी

दक्षिण एशिया में चीन-पाकिस्तान संबंध एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कारक हैं। पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस देश है और उसकी भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और रक्षा सहयोग के माध्यम से दोनों देशों के संबंध गहरे हुए हैं।

पाकिस्तान लंबे समय से क्षेत्रीय सुरक्षा बहस का केंद्र भी रहा है। अफगान युद्ध और शीत युद्ध के दौर में बने कई नेटवर्क इसी क्षेत्रीय वातावरण में विकसित हुए। हालांकि पाकिस्तान स्वयं भी आतंकवाद से भारी नुकसान झेल चुका है।

अफगानिस्तान से मिला सबक

अफगानिस्तान का अनुभव इस जटिलता को स्पष्ट करता है। सोवियत कब्जे के समय कई लड़ाकों को संगठित किया गया और पाकिस्तान इस संघर्ष का प्रमुख लॉजिस्टिक केंद्र बना। सोवियत वापसी के बाद देश लंबे समय तक अस्थिरता में डूबा रहा।

2021 में अमेरिका की वापसी के बाद अफगान सरकार का तेजी से पतन यह दिखाता है कि केवल सैन्य शक्ति से जटिल राजनीतिक वास्तविकताओं को बदला नहीं जा सकता।

बदलता वैश्विक संतुलन

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और चीन के बीच बढ़ती निकटता भी वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रही है। यदि यह साझेदारी और मजबूत होती है तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भी जटिल हो सकती है।

कठोर सच्चाई

अंततः आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं जीता जा सकता। जब तक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, कमजोर राज्य और वैचारिक उग्रवाद एक साथ मौजूद रहेंगे, तब तक आतंकवादी नेटवर्क किसी न किसी रूप में फिर उभरते रहेंगे।

स्थायी समाधान के लिए व्यापक राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण आवश्यक है—अन्यथा दुनिया बार-बार उसी संघर्ष का सामना करती रहेगी, बस उसका स्थान और नाम बदलते रहेंगे।

Topics: ChinaGlobal TerrorismTerrorism AnalysisInternational SecurityPakistanafghanistanrussiageopoliticsUnited Statesstrategic affairs
सुबोध मिश्रा
सुबोध मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार (हिंदुस्तान टाइम्स और पीटीआई ) [Read more]
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