जेतलपुर धाम, खेड़ा (गुजरात)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सनातन धर्म को लेकर कहा कि धर्म तो चिरंतन और शाश्वत है। धर्म की रक्षा धर्म पालन (आचरण) से हमें ही करनी है और धर्म का काम है – जोड़ना और उन्नत करना है।
उन्होंने ये बातें जेतलपुर धाम स्थित श्री स्वामीनारायण मंदिर में ‘श्री रेवती बलदेव जी हरिकृष्ण महाराज द्विशताब्दी पाटोत्सव’ में सहभागी होकर दर्शन और पूजा-अर्चना के बाद अपने संबोधन में कही। सरसंघचालक जी ने कहा कि आज मुझे बहुत आनंद हो रहा है। हमने तो अपना काम करते-करते 100 वर्ष पूर्ण किए हैं, परंतु आज यही काम करते-करते जिनके 200 वर्ष पूर्ण हुए हैं, एक सीनियर से मिलकर एक जूनियर को जैसे लगता है, वैसा आज मेरा मन है। काम तो एक ही है – सनातन धर्म की रक्षा। धर्म तो चिरंतन और शाश्वत है; भगवान की इच्छा से सृष्टि बनी और सृष्टि के जो नियम हैं, वही धर्म है। उन्होंने कहा कि हमारे अपने आचरण में जो धर्म है, हमें वही करना है। धर्म का पालन करने का अर्थ क्या है? धर्म जोड़ने का काम करता है, इसलिए हमें अपना जीवन भी जोड़ने वाला बनाना पड़ेगा।
संघ में नित्य उपासना है ‘शाखा’
संघ में नित्य उपासना ‘शाखा’ है। यहाँ उपासना का अर्थ सनातन वैदिक परंपरा की पूजा है। हमारे यहाँ ‘शिक्षापत्री’ है, जिसमें यह बताया गया है कि सर्वसामान्य व्यक्ति को आचरण कैसे करना चाहिए। महत्व आचरण का ही होता है, केवल बोलने का नहीं। धर्म की रक्षा धर्म पालन (आचरण) से हमें ही करनी है और धर्म का काम है – जोड़ना और उन्नत करना।
उन्होंने कहा कि भगवान द्वारा बनाई गई सृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु का कुछ न कुछ प्रयोजन है, ऐसा भाव रखकर सभी के साथ आत्मीयता का भाव रखना ही सामाजिक समरसता कहलाता है। जब सब कुछ भगवान द्वारा बनाया गया है, तो ऊंच-नीच कहाँ से आई? यह भेद कहाँ से आया? व्यवस्था भेद-भाव के लिए नहीं होती। जिस व्यवस्था में भेद आ जाता है, वह धर्म और समाज का अहित करती है।
संपूर्ण विश्व को भारत ही दिशा दिखाएगा
आज की परिस्थिति में संपूर्ण विश्व को दिशा दिखाने का काम भारत के पास ही आने वाला है। अध्यात्म के आधार पर चलने वाले कार्य, वास्तव में मानवता और सृष्टि को साथ रखकर परमेष्ठी (परमेश्वर) की ओर आगे बढ़ने के लिए तैयार करने वाले कार्य हैं। इस अवसर पर मोहन भागवत जी ने डिफेंस प्रदर्शनी (रक्षा प्रदर्शनी) का उद्घाटन भी किया।

















