भारतीय नारी की आंतरिक शक्ति का उत्सव
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भारतीय नारी की आंतरिक शक्ति का उत्सव

भारतीय विद्वत परिषद, राष्ट्र सेविका समिति और शरण्या के संयुक्त प्रयास से यह दो दिवसीय आयोजन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हो रहा है। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की बहुआयामी क्षमता को भारतीय दृष्टिकोण से रेखांकित करना और उनके विकास को राष्ट्र के समग्र उत्थान से जोड़ना है।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Mahak Singh
Mar 6, 2026, 06:27 pm IST
inभारत

07 और  08 मार्च 2026 को दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘भारती – नारी से नारायणी’ नामक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। यह सम्मेलन महिला विचारकों का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच है, जहाँ महिलाओं को परिवार की मुख्य इकाई से आगे बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने वाली इकाई के रूप में देखा जाएगा।

भारतीय दृष्टिकोण में नारी की पूरक और राष्ट्रनिर्माणकारी भूमिका

भारतीय विद्वत परिषद, राष्ट्र सेविका समिति और शरण्या के संयुक्त प्रयास से यह दो दिवसीय आयोजन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हो रहा है। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की बहुआयामी क्षमता को भारतीय दृष्टिकोण से रेखांकित करना और उनके विकास को राष्ट्र के समग्र उत्थान से जोड़ना है। यह सम्मेलन पश्चिमी फेमिनिज्म की अवधारणा से अलग है। पश्चिमी नारीवाद में पुरुष और महिला के बीच संघर्ष या विरोध की बात अक्सर सामने आती है, जबकि भारतीय परंपरा में नारी और पुरुष को समान, पूरक और सहयोगी माना जाता है। दोनों एक ही प्रकाश की दो ज्योतियाँ हैं, जो एक-दूसरे के बिना पूर्ण नहीं हो सकतीं। राष्ट्र सेविका समिति इसी सोच पर आधारित है। इसकी स्थापना 1936 में विजयादशमी के दिन वर्धा में लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) द्वारा की गई थी।

सेवा, संस्कार और आत्मनिर्भरता की दिशा में कार्य

समिति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दर्शन से प्रेरित है, लेकिन यह स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। इसका ध्येयसूत्र है-‘स्त्री राष्ट्र की आधारशिला है’। पिछले 90 वर्षों में समिति ने हजारों शाखाओं के माध्यम से महिलाओं के चरित्र निर्माण, नेतृत्व विकास, सामाजिक जिम्मेदारी और भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर काम किया है। वर्तमान में देश भर में 2700 से अधिक शाखाएँ कार्यरत हैं और 55,000 से ज्यादा स्वयंसेविकाएँ जुड़ी हुई हैं। समिति का कार्यक्षेत्र महिलाओं के उत्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राष्ट्र के सकारात्मक विकास पर केंद्रित है।शरण्या, राष्ट्र सेविका समिति का एक हिस्सा है, जिसकी स्थापना 2016 में हुई। यह वंचित वर्गों की महिलाओं और बच्चों को शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक जागरण प्रदान करने पर ध्यान देती है। इसके प्रयासों से हजारों महिलाएँ आर्थिक रूप से मजबूत हुई हैं और कई बच्चों को बेहतर शिक्षा के अवसर मिले हैं।

दूसरी ओर, भारतीय विद्वत परिषद 2009 से सक्रिय है। यह भारतीय शास्त्रों के अध्ययन, शोध और आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का कार्य करती है। परिषद में देश-विदेश के 2500 से अधिक विद्वान, शोधकर्ता और शिक्षक जुड़े हैं। यह परंपरागत ज्ञान और समकालीन मुद्दों के बीच सेतु का काम करती है। इन तीनों संस्थाओं का सहयोग इस सम्मेलन को प्रामाणिक और व्यापक बनाता है।

सम्मेलन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु समापन सत्र की मुख्य अतिथि रहेंगी, जबकि उद्घाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता करेंगी। इनकी उपस्थिति आयोजन को राष्ट्रीय महत्व प्रदान करती है। विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी महिलाएँ इसमें भाग लेंगी, जैसे शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, रक्षा, चिकित्सा, उद्योग, उद्यमिता, न्यायपालिका, अध्यात्म, खेल, मीडिया और साहित्य। विशेष सत्रों में महिला सांसदों का पैनल होगा, जहाँ वे महिला संबंधित नीतियों पर विचार करेंगी। महिला कुलपतियों (वाइस चांसलरों) का अलग सत्र शिक्षा क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका पर केंद्रित रहेगा। साथ ही, साध्वी संगम में महिला संत योग, धर्म और अध्यात्म पर चर्चा करेंगी। सम्मेलन की आठ मुख्य थीम्स हैं, जो भारतीय नारी की आंतरिक यात्रा को दर्शाती हैं-

  • विद्या: ज्ञान शक्ति का आधार है। उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, लड़कियों की स्कूल ड्रॉपआउट दर कम करने, विशेष पाठ्यक्रम विकसित करने और सेल्फ-डिफेंस को अनिवार्य बनाने पर गहन चर्चा होगी। शिक्षा के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाना प्रमुख लक्ष्य है।
  • शक्ति: आत्म-बोध और आत्म-निर्भरता पर जोर। वित्तीय साक्षरता, स्किल डेवलपमेंट, आर्थिक स्वावलंबन और नैतिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ने के तरीके साझा किए जाएंगे।
  • मुक्ति: सामाजिक रूढ़ियों और घरेलू हिंसा से मुक्ति। महिलाओं को सम्मानपूर्ण और स्वतंत्र जीवन जीने के अवसर प्रदान करने के उपायों पर विचार होगा।
  • चेतना: कार्यक्षेत्र में समान भागीदारी। नीति-निर्माण, निर्णय लेने और नेतृत्व में महिलाओं की बराबर भूमिका सुनिश्चित करने के सुझाव दिए जाएंगे।
  • प्रकृति: महिलाओं की शारीरिक और मानसिक प्रकृति का सम्मान। कार्यस्थलों पर पीरियड लीव, मातृत्व अवकाश, शिशु देखभाल सुविधाएँ और मेनोपॉज जैसी स्थितियों के लिए सहायक व्यवस्था पर चर्चा होगी, ताकि काम और परिवार दोनों संभाले जा सकें।
  • संस्कृति: मजबूत जड़ें। परिवार और समाज में भारतीय संस्कारों को संरक्षित रखते हुए आधुनिकता को अपनाने का संतुलन।
  • सिद्धि: सफल महिलाओं की वास्तविक कहानियाँ और उपलब्धियाँ साझा करना, जो दूसरों को प्रेरित करें।
  • कृति: विचारों को ठोस कार्य-योजना में बदलना। सकारात्मक परिवर्तन लाने के व्यावहारिक कदम। देश भर में पहले से चलाए गए अभियानों और स्थानीय स्तर पर एकत्र सुझावों को मुख्य सम्मेलन में शामिल किया जाएगा। विभिन्न परिचर्चाओं से निकले सुझाव भारत सरकार के संबंधित विभागों को भेजे जाएंगे, ताकि नीतिगत स्तर पर उनका क्रियान्वयन संभव हो सके।

यह सम्मेलन ‘मौन शक्ति से रणनीतिक शक्ति’ की यात्रा का प्रतीक है। महिलाएँ सदियों से परिवार को संभालती आई हैं, परंपराओं को जीवित रखती हैं और समाज को मजबूती प्रदान करती हैं। अब उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्य धुरी बनाने का समय है। वैश्विक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को आवश्यक माना जाता है, और भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ इसे और सशक्त बना सकता है।

महिला नेतृत्व और नीति संवाद की दिशा में पहल

सम्मेलन का दृष्टिकोण एक समावेशी मंच तैयार करना है, जहाँ महिलाएँ जुड़ें, सहयोग करें और समाधान सुझाएँ। इससे आत्मनिर्भर और विकसित भारत का लक्ष्य मजबूत होगा। अपेक्षित परिणामों में शामिल हैं: सरकार को बहु-आयामी नीति सुझाव, ‘भारती’ को स्थायी संवाद मंच बनाना, महिला नेतृत्व का राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार करना और भविष्य में ऐसे सम्मेलनों को वार्षिक रूप से आयोजित करने की रूपरेखा।

राष्ट्र सेविका समिति का लंबा अनुभव, सेवा-केंद्रित कार्य और भारतीय मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण इस आयोजन की विश्वसनीयता बढ़ाता है। विभिन्न पृष्ठभूमि, आयु और प्रदेशों की महिलाओं के एक साथ आने से सामूहिक ज्ञान और अनुभव से उपयोगी सुझाव निकलेंगे। ‘नारी से नारायणी’ सम्मेलन महिलाओं के विकास और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका को मजबूत करने का एक व्यवहारिक प्रयास है। यह भारतीय मूल्यों के अनुरूप, सकारात्मक और संतुलित दृष्टिकोण से आगे बढ़ने का मंच बनेगा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत होगा। दिल्ली का विज्ञान भवन इन दो दिनों में विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।

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आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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